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इतिहास के पन्नों से

कितनों ने धर्म बदला इसकी जानकारी रखें

[ पिछड़ी जातियों को धार्मिक संरक्षण विधेयक पर लोकसभा में 4 मार्च 1960 को बहस का समाहार ]

स्त्रोत :- पंडित प्रकाशवीर जी के संसदीय भाषण
संकलनकर्ता :- डॉ. सत्यवीर त्यागी
प्रस्तुतकर्ता – अमित सिवाहा

सुश्री मणिबेन पटेल ( आनन्द ) : मैं मिनिस्टर साहब से जानना चाहती हूँ कि हमें आजादी मिलने से पहले यहाँ कितने मिशनरी थे और आज कितने हैं ?
Shri Datar : This question has been answered a number of times .
श्री प्रकाशवीर शास्त्री : उपाध्यक्ष जी , इस सदन में इस बिल पर पहले भी एक बार चर्चा हो चुकी है । सौभाग्य था कि – :
उपाध्यक्ष महोदय : बहुत संक्षेप में होना चाहिए ।
श्री प्रकाशवीर शास्त्री : संक्षेप में ही निवेदन करूँगा ।

            जितने शान्तिपूर्ण वातावरण में और जिस सद्भावना के साथ उस दिन इस बिल के सम्बन्ध में विचार किया गया था , आज वह वातावरण इस बिल को उपस्थित करते समय नहीं रह सका और एक विशेष प्रकार की अभद्र घटना इस सदन में घटी । उसका विशेष रूप से उल्लेख मैं इसलिए भी करता हूँ कि उसका मेरे विधेयक से सम्बन्ध है । हमारे एक मित्र ने इस बिल की भावना को न समझते हुए एक धार्मिक ग्रन्थ के पन्ने फाड़कर एक अपमान का वातावरण उपस्थित कर दिया है । मैं चाहता हूँ कि भविष्य के लिए आप कोई ऐसा नियम बनाएँ या कोई इस प्रकार की परम्परा निर्धारित करें कि इस सदन में इस प्रकार की घटना न घट सके ।

Shri B.K. Gaikwad : Government should ban such books .
श्री प्रकाशवीर शास्त्री : दूसरी बात जो मैं इस सम्बन्ध में निवेदन करना चाहता हूँ वह यह है कि हमारे उप – गृहमन्त्री महोदय ने कहा है कि यह बिल संविधान की धारा 25 भाग ‘ 1 ‘ का विरोध करता है । संविधान की उस धारा को मैं पढ़कर सुनाता हूँ और माननीय मन्त्री महोदय से निवेदन करूँगा कि वह इस सम्बन्ध में थोड़ा और गम्भीरता से सोचें । संविधान की धारा 25 ( 1 ) इस प्रकार है : ”
सार्वजनिक व्यवस्था , सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के दूसरे उपबन्धों के अधीन रहते हुए , सब व्यक्तियों को अन्तःकरण की स्वतन्त्रता का तथा धर्म के अबाध रूप से मानने , आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार होगा । ”
तो मैं कहना चाहता हूँ कि सार्वजनिक व्यवस्था और सदाचार की यह माँग है कि किसी भी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन धार्मिक भावनाओं से भिन्न कारणों से न हो , और यही बात इस विधेयक के अन्दर है । जैसा कि हमारे उप – गृहमन्त्री महोदय ने कहा कि हमारे धर्म की यह विशेषता है कि सहिष्णुता की मात्रा उसमें आरम्भ से रही है । अगर इस विषय में कहीं भी किसी भी तरह से न्यूनता की भावना होती तो बहुत सम्भव है कि इस विधेयक की धाराएँ और कड़ी होतीं । मैंने यह स्पष्ट ही शुरू में लिखा है कि धार्मिक भावनाओं या आध्यात्मिक कारणों से प्रेरित होकर यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहे तो उसके मार्ग में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए । रुकावट उसके लिए होनी चाहिए जब इससे भिन्न स्थिति में धर्म परिवर्तन कराया जाए । आज देश में कुछ अवांछनीय उपाय अपनाए जा रहे हैं , जबरदस्ती और लोभ से में और लालच से जो लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है उस पर गवर्नमेंट को अवश्य कोई प्रतिबन्ध लगाना चाहिए ।

      माननीय मन्त्री महोदय ने कहा है कि हमारे देश में ईसाई धर्म का प्रचार अब नहीं , बहुत पहले से चला आ रहा है । लेकिन जिस तरह से अभी सुश्री मणिबेन ने संकेत किया उसी प्रकार से मैं भी एक संकेत देना चाहता हूँ कि हमारे देश में ईसाई मत का प्रचार चला अवश्य आ रहा है , परन्तु देखना यह है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले यहाँ ईसाई प्रचारकों की कितनी संख्या थी और आज कितनी है । स्वतन्त्र होने के पश्चात् देश का एक बहुत बड़ा भाग दूसरे देश के रूप में परिणत हो गया , फिर भी ईसाई मिशनरियों की संख्या दुगुनी , तिगुनी और चौगुनी होती चली जा रही है , राशियाँ बढ़ती चली जा रही हैं और अरबों रुपया इस देश में धर्म प्रचार के नाम पर बाहर से आ रहा है । इससे स्पष्ट है कि इसके पीछे अराष्ट्रीय संकेत भी छिपा हुआ है । उपाध्यक्ष जी , मैं अपने उप - गृहमन्त्री महोदय की जानकारी के लिए एक विशेष बात कहना चाहता हूँ । मेरे हाथ में यह एक पुस्तक है- क्रिश्चियन मास मूवमेंट इन इंडिया यह सन् 1934 में अमेरिका में मिस्टर विकेट द्वारा लिखी गई थी । उसमें हिन्दुस्तान के हर वातावरण का , हर प्रान्त का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि कहाँ - कहाँ हमने कैसे - कैसे कार्य करना है । लेकिन अभी हाल की घटना मैं आपको बताना चाहता हूँ कि अमेरिका में फरवरी 1953 में एक ब्राडकास्टिंग कम्पनी ने ब्राडकास्ट किया जिसका शीर्षक है- दि होरी हिन्दू रिलीजन मस्ट गो- अर्थात् बूढ़ा हिन्दू धर्म समाप्त होना चाहिए । मैं पूछना चाहता हूँ कि जो इस प्रकार का ब्राडकास्टिंग हो रहा है उसके पीछे भावना क्या है ? इसी सिलसिले में एक मिस्टर फ्रैंक बिली ग्राहम कुछ दिन पहले भारत में इन चीज़ों का जायजा देने के लिए आए थे । इसी प्रकार से पोर्टलैंड की एक कम्पनी है जिन्होंने कहा है कि अगर दुनिया को कम्युनिस्ट होने से बचाना है तो हमें एक अरब लोगों को ईसाई बनाना पड़ेगा । मैं आपके द्वारा अमेरिका देश के शासकों तक अपना यह सन्देश भेजना चाहता हूँ कि आप कृपा करके उनको कहिए कि जहाँ तक सेवाओं का सम्बन्ध है अस्पतालों के द्वारा , स्कूलों के द्वारा , वह हमारे देश में आकर करें , हम उनका स्वागत करेंगे और एक वाणी से नहीं हज़ार वाणी से स्वागत करेंगे । लेकिन , जैसा कि गांधी जी ने कहा था , यह इस तरह है कि जैसे मछली पकड़नेवाला काँटे के ऊपर आटा लगाकर तालाब में डालता है उसके ऊपर आटा है लेकिन अन्दर काँटा लगा हुआ है जो मछली को मारने के लिए है । इसलिए अगर उनकी सेवाएँ हमारा धर्म छीनने के लिए हों तो यह आपत्तिजनक कार्यवाही है और इसी आधार पर स्वतन्त्र होने के पश्चात् जो उनके प्रति रोष हमारे देश में फैल रहा है उसको हम उस देश के शासकों तक पहुँचाएँ और उनसे कहें कि हमारे दिलों में उनके प्रति जो श्रद्धा की भावना है वह हिल रही है । 

     अब अपने वक्तव्य का उपसंहार करते हुए मैं दो - तीन सुझाव आपके सामने रखना चाहता हूँ । मेरा एक सुझाव यह है- मैंने अनुसूचित जातियों और आदिमवासी जातियों के कमिश्नर की रिपोर्ट को पढ़ा है , उसमें उन्होंने एक - डेढ़ लाइन एक स्थान पर बड़ी सावधानी के साथ लिखा है कि जंगलों में और पिछड़े क्षेत्रों में कुछ लोगों ने धर्म परिवर्तन किया है , ईसाई हुए हैं , लेकिन इससे उनके जीवन में कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है । 

    मैं चाहता हूँ कि हमारे गृहमन्त्री महोदय इन कमिश्नर महोदय को स्पष्ट आदेश दें कि आगे आदिम जातियों और अनुसूचित जातियों की जो रिपोर्ट लिखें उसके अन्दर ये तमाम चीजें अंकित की जानी चाहिएँ कि कितने लोगों ने इस वर्ष में धर्म परिवर्तन किया । जब वह इन क्षेत्रों में जाकर कार्य कर रहे हैं तो इस प्रकार की रिपोर्ट भी भारत सरकार के पास आनी चाहिए , और इस नीति की जानकारी होनी चाहिए कि इन लोगों का बलात् धर्म परिवर्तन किया गया है या उन्होंने धार्मिक भावनाओं से प्रेरित होकर धर्म परिवर्तन किया है । मैं तो यही चाहता था कि आप इस बिल को स्वीकार करें , क्योंकि जिस दिन यह बिल पहली बार प्रस्तुत हुआ उसके पश्चात् मेरे पास केरल से और आन्ध्र प्रान्त से बहुत से पत्र आए हैं जो इस समय मेरे पास हैं और जिनको समयाभाव से मैं इस समय उपस्थित नहीं कर सकता । अगर आप इस बिल को टालेंगे और जो भावना इसके अन्दर निहित है उसका स्वागत नहीं करेंगे तो मेरा यह निश्चित विश्वास है कि आगे चलकर इससे भयानक स्थिति आनेवाली है और उस भयानक स्थिति का सारा दायित्व सरकार पर होगा , देश की जनता के ऊपर नहीं होगा । अगर उस भयानक स्थिति से देश को बचाना है , कि जिस प्रकार छोटे - छोटे कारण बढ़ते गए और देश का विभाजन एक दूसरे देश के रूप में हुआ , यदि उस विभाजन को बचाना है तो उसके लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि आपको इस बिल की धाराओं का स्वागत करना चाहिए और इस बिल को स्वीकार करना चाहिए । 

     अगर आपको इस बिल को स्वीकार करने में इसलिए संकोच और आपत्ति है कि यह एक गैर - सरकारी सदस्य की ओर से आया है तो मैं चाहता हूँ कि आप अपनी ओर से एन्क्वायरी कराएँ , और उस एन्क्वायरी कराने के बाद उचित संशोधन के साथ सरकार की ओर से इस बिल को आना चाहिए । लेकिन मेरा यह निश्चित विश्वास है कि इस प्रकार का बिल और यह सिद्धान्त इस सदन में अवश्य स्वीकृत होना चाहिए , जिससे देश की जनता को सन्तोष हो सके । इन शब्दों के साथ मैं बलवती भाषा में प्रस्तुत करता हूँ कि इस बिल को पारित किया जाए ।

Mr. Deputy Speaker : There is one amendment by Shri Siddiah that the Bill be circulated for the purpose of eliciting opinion thereon .
Shri Siddiah ( Mysore , Reserved Sch . Castes ) : I am not pressing it .
Mr. Deputy Speaker Has the hon . Member leave of the House to withdraw his amendment ? ( The amendment was , by leave , withdrawn . )

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