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‘सार सतसई’ पुस्तक डॉ शंकर लाल गुप्ता द्वारा लिखी गई है, जो कि एक बहुत ही संवेदनशील कवि के रूप में विख्यात हैं।
इस पुस्तक में डॉ शंकर लाल गुप्त जी के द्वारा दोहों के रूप में अपने मन की बात को अभिव्यक्ति दी गई है। उन्होंने बहुत ही बेहतरीन ढंग से विभिन्न विषयों को लेकर दोहों की रचना की है। जिनमें उनके भीतर की प्रतिभा स्पष्ट दिखाई देती है। साथ ही वह पूरी संवेदनशीलता दिखाते हुए कवि धर्म का निर्वाह करते हुए भी दिखाई देते हैं। क्योंकि उन्होंने गुरु वंदना, जिज्ञासा, सृष्टि, परमात्मा, आत्मा, माया, जीव, जगत, निराकार, साकार ,भक्ति सागर गीता सार, धर्म, धर्म -धंधा, धर्म – ढोंगी आदि ऐसे गंभीर विषयों को लेकर अपनी लेखनी चलाई है जिसमें प्रत्येक पाठक को कुछ सोचने, विचारने का अवसर मिलेगा। वास्तव में मेरा मानना है कि कवि वही होता है जो संवेदनशीलता दिखाते हुए देश – धर्म और राष्ट्र के लिए समर्पित होकर कुछ लिखे, बोले और करे। इस अपेक्षा पर डॉ शंकर लाल गुप्त जी पूर्णतया खरे उतरते हैं।
   10 नवंबर 1946 को राजस्थान के जिला जयपुर के गांव रायसर, तहसील जमवारामगढ़ में जन्मे डॉ शंकर लाल गुप्ता जी के द्वारा इससे पूर्व भी कई पुस्तकें प्रकाशित कराई जा चुकी हैं। उन पुस्तकों की भी पाठकों ने खुले दिल से सराहना की है। कवि डॉ शंकर लाल गुप्त जी की संवेदनशीलता, गंभीरता व सृजनशीलता को प्रकट करते हुए इन दोहों पर विचार करके हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि उनके द्वारा पूरी पुस्तक में किस प्रकार के वैचारिक गाम्भीर्य का परिचय दिया गया होगा ?
अपनी कविता ‘जिज्ञासा’ में वह कहते हैं कि :-
वस्तु विनाशी भोग की औरत दौलत मान। जो इन की चाहत करे मूर्ख वै इंसान।।

अपनी कविता ‘पाहन पूजा’ में वह निराकार परमेश्वर की उपासना की ओर लोगों को आकृष्ट करते हुए लिखते हैं :–
निराकार नीरस समझ मानव करें विचार। ध्यान साधना कै तयां क्यों तो हो आधार।।
इसी कविता में आगे कहते हैं कि :-
चोटी जनेऊ सुमरनी तिलक ललाट लगाय। पाहन पूजक पुजारी भक्तां नै भरमाय।।
कवि ने जहां समाज सुधार पर इस प्रकार प्रहार किया है, वहीं वह राजनीति को भी नहीं बख्शते हैं। ‘लोकतंत्र’ नामक अपनी कविता में वह लिखते हैं :–

भाई भतीजावाद सूं टिकट पावै जनाब। वोटर चांदी कूटता चलती खूब शराब ।।
हिस्ट्रीशीटर भुजबली दौलत को भंडार।
दावेदारी टिकट की जाति बनै आधार।।

उपरोक्त पुस्तक ‘साहित्यागार’ धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर, 302003 द्वारा प्रकाशित की गई है। वहीं से उपरोक्त पुस्तक को प्राप्त किया जा सकता है । पुस्तक प्राप्ति के लिए 0141- 2310785 व 4022382 पर संपर्क किया जा सकता है।
पुस्तक की कुल पृष्ठ संख्या 108 और  मूल्य ₹ 200 है ।

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

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