भारतीय धर्म और संस्कृति के बारे में महात्मा गांधी के कैसे विचार थे ?

गांधी के विचार क्या थे ?

१- हवन मे घी जलाए, यह तो हिंसा हुई।(हरिजन सेवक २०मई १९५० काका कालेकर संस्मरण।

२-महाभारत के कृष्ण कभी भूमंडल पर नही हुए। (तेज ५ अक्टूबर १९२५)

३-दयानन्द ने सूक्ष्म मूर्ति पूजा चलाई है क्योंकि उन्होनें वेद को ईश्वरीय ज्ञान कहा है। वेद अक्षर है और सब सत्य विद्याओ का होना वेद मे बताया है।(यंग इंडिया २८ मई १९२४)

४ मैने ‘सत्यार्थप्रकाश’ से अधिक निराशाजनक और कोई पुस्तक नहीं पढी। दयानन्द ने संसार भर के एक अत्यंत विशाल व उदार धर्म को संकुचित बना दिया।आर्यसमाजी स्त्रियो को भगाकर लाने का प्रयास करते है। (यंग इंडिया २८ मई१९२४)

५-दूध को हम किसी भी तरह शाकाहार मे नहीं गिन सकते। सच मे तो यह मांसाहार का ही रूप है। अण्डा सामान्यतः मांसाहार मे गिने जाते है मगर वह मांस नही।अण्डा शाकाहार होता है। (आरोग्य की कुंजी पृष्ठ ११ नवजीवन प्रकाश मन्दिर अहमदाबाद )

६-हिन्दुस्तान मे गौ हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता। इसका मतलब तो जो लोग हिंदू नहीं है उनके साथ जबरदस्ती करना होगा। (प्रार्थना सभा २५ जोलाई १९४७)

७-भगत सिंह ने हिंसा व पाप पूर्ण कार्य किया है, उसे इसका दंड अवश्य मिलना चाहिए। (गांधी साहित्य )

८-अब्दुल रसीद (स्वामी श्रद्धानन्द का हत्यारा ) मेरा भाई है । पुस्तक – ‘हिस्ट्री आफ काग्रेस’, लेखक- पट्टाभि सीतारमैया
ऐसे अनेक वक़्तव्य है जो गांधी की संकीर्ण मानसिकता व साम्प्रदायिक विचारधारा को बताते हैं।

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