भारतीय राष्ट्रवाद के मिथक और यथार्थ

सत्य प्रकाश चौधरी

अभी जब हमने एक और स्वतंत्रता दिवस मनाया है, मैं भारतीय राष्ट्रवाद के तीन पहलुओं पर एक नजर डालना चाहूंगा। पहला है भारतीय नक्शे का मानवीकृत रूप, जैसा कि हमें बताया-पढ़ाया गया है। यह भारत माता की तसवीर है जो नक्शे की लकीरों से बनी है और राष्ट्र को साड़ी पहने एक स्त्री के रूप में दिखाया गया है।

जम्मू-कश्मीर राज्य इस तसवीर का सिर है, दक्षिण में स्थित प्रायद्वीप का सबसे संकरा हिस्सा उसके पांव और एडिय़ां हैं, तो उसकी साड़ी का लहराता पल्लू पूर्वोत्तर राज्यों को निरूपित करता है। मैं ठीक इसी तरह के 40 साल पहले के नक्शों को भी भलीभांति याद कर सकता हूं, तो ऐसा इसलिए कि ये लंबे समय से हमारे इर्द-गिर्द मौजूद रहे हैं और लोकमानस में इनकी अनुगूंज बरकरार है।

इस खूबी का स्वाभाविक नतीजा है कि नक्शे की लकीरों में कोई भी बदलाव उस शख्स के लिए स्वीकार्य नहीं है, जिसने इसे लंबे समय से मानव रूप में और कुछ अर्थो में कहें तो जीवित रूप में देखा है। भारत का नक्शा कुछ लकीरों और भूस्थलीय संरचनाओं का एक समुच्चय भर नहीं है। और किसी भी सरकार के लिए इसमें किसी तरह के बदलाव की बात करना कठिन हो जाता है।

चीन के साथ हमारे सीमा विवाद, और यह तथ्य कि कश्मीर का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में पड़ता है, को जाहिर करने की इजाजत हमारे आधिकारिक नक्शे कतई नहीं देते। बाहरी दुनिया समय-समय पर जो नक्शे जारी करती है, उसे ठीक करने-कराने में भारत सरकार काफी वक्त और मेहनत लगाती है। सरकार उन पर आधिकारिक मुहर लगा कर उनके आपत्तिजनक होने की ओर ध्यान दिलाती है।

लेकिन, तब भी हमारे देश के ऐसे ‘आपत्तिजनक’ नक्शे बहुत आम हैं और अगर कोई गलती से भी कहीं किसी रूप में उनका इस्तेमाल कर लेता है तो मीडिया अक्सर इसकी रिपोर्टिग गुस्से के साथ करता है। अधिकतर भारतीयों के लिए भारत माता की तसवीर का नाममात्र भी विरूपण आपत्तिजनक है। उसे अक्षत ही रखा जाना चाहिए।

दूसरा पहलू जिसे समझा जाना है, वह इस नक्शे का इतिहास है। 1947 में भारत को जो विरासत में मिला वह एक औपनिवेशिक राज्य था, जो बहुत आक्रामक ढंग से विस्तारवादी था। वह उन इलाकों में भी घुसा जहां तक मुगल भी नहीं पहुंच पाये थे, खास कर पूर्वोत्तर में। मुगलों या उनके वारिसों के अधीन न होने का मतलब है कि ये इलाके बिल्कुल नयी और मौलिक संधियों के जरिये हासिल किये गये।

जिसे हम एक चिरस्थायी और एकसूत्रबद्ध राष्ट्र समझते हैं, उसके कई हिस्सों को ब्रिटिश भारतीय सेना ने लड़ कर जीता था। भारतीयों को इस पहलू के बारे में नहीं पढ़ाया जाता, और यही वजह है कि उन इलाकों में चल रहे विद्रोहों के प्रति इतना शत्रुतापूर्ण रवैया दिखाई पड़ता है।

आज हमारे देश में कुछ लोगों को यह तथ्य हैरत में डाल सकता है कि नगा लोगों के आंदोलन के प्रति महात्मा गांधी का रवैया बेदर्द नहीं था। फिर भी, आज भारतीयों में भारत के ही एक हिस्से, जिसे औपनिवेशिक युग में उसी की तरह अधीन बनाया गया और जो सबसे बेरहम कानूनों के साये तले है, के लिए शायद ही कोई हमदर्दी है। इन कानूनों के तहत सेना दंड और कार्यवाही से मिले अभयदान के साथ काम करती है, लेकिन भारत के व्यापक बहुमत की नजर में सेना जो करती है वह ठीक है, क्योंकि भारतीय जनमानस में यह बात बैठी हुई है कि सेना हमारे राष्ट्रवाद की सरपरस्त है।

हमारे राष्ट्रवाद का तीसरा पहलू सेना की यह राष्ट्रवादी फितरत है, जो कि एक मिथक है। भारतीय सेना एक भाड़े की सेना थी, जो अगस्त 1947 की आधी रात को, रातोंरात राष्ट्रीय सेना बन गयी। पाकिस्तान भी इसी प्रक्रिया से गुजरा। 14 अगस्त की ब्रिटिश भारतीय सेना (जिसकी बलूच रेजीमेंट के पंजाबियों ने और गोरखा रेजीमेंट के नेपालियों ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे सिखों, हिंदुओं और मुसलमानों पर गोलियां बरसायी थीं) और 15 अगस्त को अस्तित्व में आयी आजाद भारत की सेना में बाल बराबर भी फर्क नहीं था।  ‘भारतीय सेना’ के पास एक लंबी और, मेरी समझ से, गर्व करने लायक सैन्य वीरता की विरासत है। लेकिन इसका जो इतिहास है वह उजागर करता है कि इसका बुनियादी चरित्र मूल रूप से पैसे के लिए लडऩेवाली सेना का रहा है।

ईसा-पूर्व चौथी सदी में, यूनानी इतिहासकार ऐरियन ने सिकंदर महान के सैन्य अभियानों के बारे में जनरल टॉलमी (जिन्होंने आगे चल कर यूनानी-मिस्री वंश के फैरो राज की स्थापना की, जो क्लियोपैट्रा के साथ खत्म हुआ) द्वारा लिखे गये इतिहास को आधार बना कर लिखा है। मकदूनियाई सेना के अभियान का सबसे मुश्किल हिस्सा पंजाब में ग्रामीणों द्वारा भाड़े पर लिये गये सैनिकों से निपटना था।

इससे एक सदी पहले हेरोडटस ने लिखा था कि प्लॉटीउ की लड़ाई में, फारस की तरफ से भाड़े के भारतीय सैनिकों की एक रेजीमेंट मैदान में थी। हेरोडटस ने इस टुकड़ी की पोशाक और हथियारों के बारे में पूरा ब्योरा दिया है। यह पहले से ज्ञात तथ्य है कि मुगल काल में, जाट से लेकर मराठा और सिख तक, भारतीय उसके लिए लडऩे को हाजिर थे जिसने सबसे ज्यादा कीमत दी। भारत पर ‘विदेशी’ जीत की द्योतक लड़ाइयों, जैसे प्लासी और हल्दीघाटी, में विजेता पक्ष की ओर से लडऩेवाले अधिकतर भारतीय ही थे। लेकिन, यह सब हमारे उस विश्वास के साथ फिट नहीं बैठता कि सेना ‘राष्ट्रवादी’ है। यह सब चीजें हमें स्कूलों में पढ़ायी नहीं जाती हैं और जो लोग हमारा सच्च इतिहास जानते-सीखते हैं, उनका दो विपरीत आख्यानों से साबका पड़ता है जिनके बीच उन्हें तालमेल बिठाना पड़ता है।

मेरी राय में, हमारी संस्कृति और इसकी संवेदनशीलता की प्रकृति को देखते हुए इन तीनों पहलुओं में जल्द कोई बदलाव दिखनेवाला नहीं है। लेकिन इस तरह की चीजें एक स्तंभकार उस छोटे से समूह के लिए तो लिख ही सकता है, जो जानने-समझने का इच्छुक है।

Comment:

betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
casibom
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet giriş
betpark
betpark
betgaranti
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
harbiwin giriş
harbiwin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
Hitbet giriş
xbahis
xbahis
vaycasino
vaycasino
bettilt giriş
bettilt giriş
Hitbet giriş
millibahis
millibahis
betnano giriş
bahisfair giriş
betnano giriş
bahisfair giriş