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राजहठ-बालहठ में फंसी संसद

संसद का मानसून सत्र आरोप-प्रत्यारोपों की भेंट चढ़ गया। विपक्ष ने ललित गेट के जरिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को घेरा संसद का मानसून सत्र आरोप-प्रत्यारोपों की भेंट चढ़ गया। विपक्ष ने ललित गेट के जरिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को घेरा। वहीं व्यापमं घोटाले पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान पर हल्ला बोला। तो भाजपा ने अपने तर्को के माध्यम से भ्रष्टाचार और नैतिकता की विवेचना प्रस्तुत की। पर हासिल कुछ न हुआ। न तो कांग्रेस की पीएम से सफाई और सुषमा के इस्तीफे की मांग पूरी हुई, न ही सरकार अपने महत्वपूर्ण बिल पास करा पाई। दोनों की हठ मानसून सत्र को ले डूबी और हारी तो सिर्फ जनता। संसद सिर्फ जुबानी अखाड़ा बनकर रह गई और मुद्दे दफन हो गए। आखिर कैसे टूटेगा ये गतिरोध या फिर जारी रहेगा हंगामा, इसी पर आज का स्पॉटलाइट…

एन. के. सिंह बीईए के जनरल सेक्रेटरी

राजनीति-शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार अद्र्ध-शिक्षित, नीम-तार्किक और मूल रूप से प्राथमिक संबंधों पर आधारित समाज में भावनात्मक मुद्दे संवैधानिक व्यवस्था द्वारा प्रदत्त वैज्ञानिक, तार्किक और नैतिक मुद्दों पर अक्सर इतने भारी पड़ जाते हैं कि अचानक हमें भारत बदलता दिखाई देने लगता है। नेहरू नए भारत के निर्माता बने, जेपी में संपूर्ण क्रांति दिखी तो अन्ना हजारे में भ्रष्टाचार मुक्त भारत। नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर आना व तत्काल जन-स्वीकार्यता हासिल करना इस भाव की तस्दीक है। लेकिन चूंकि इस तरह की जन-स्वीकार्यता में ठहराव नहीं होता इसलिए सक्षम नेता या तो नए-नए भावनात्मक मुद्दे पैदा करता है और उन्हें बेचता रहता है या सपनों को साकार करने के लिए तत्पर रहता है। चूंकि सपने साकार करना दुरूह व कालभक्षी (टाइम-कनज्यूमिंग) होता है लिहाजा, अधिकांश नेता पहले वाले विकल्प का सहारा लेते हैं। 56 इंच छाती से देशवासियों का सामूहिक (भाजपा के शब्दों में राष्ट्रीय) पौरूष जागता है। हम सपना देखते हैं पाकिस्तान को इस छाती में दबाकर चूर-चूर करने का। न खाएंगे, न खाने देंगे के जुमले से हम फिर खुश होते हैं। इस जुमले से चार बातें स्वयं सिद्ध होती हैं – पहला, मैं नहीं खाता; दूसरा, हमारे बीच भी खाने वाले हैं; तीसरा, वे खाना चाहेंगे; और चौथा, मैं उन्हें खाने नहीं दूंगा। जनता खुश होती है यह सोचकर कि पीएम के बगल में बैठे और लोग यह सब कुछ करेंगे और मोदी उन्हें पकड़ लेंगे।

जीरो टॉलरेंस का वादा निभाएं

जाहिर है जब इतने वादों और इतने सपनों की (और वह भी इतने बड़े और वैविध्यपूर्ण देश में) बुनियाद पर जन-स्वीकार्यता की इमारत खड़ी होगी तो उसे ढहाना भी मुश्किल नहीं होगा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय व्यापारी? ललित मोदी से संबंध और उस संबंध के तहत करूणाजनित मदद करना पीएम के वायदे से निकले दो स्वयं- सिद्ध तर्क वाक्यों पर जनता का ध्यान आकर्षित करता है। पहला यह कि यह खाने का मामला तो नहीं है और दूसरा क्या वो खाना चाहते हैं। और तब जन-मानस में तत्काल चौथा तर्क-वाक्य न खाने देंगे कौंधने लगता है। फिर जनता अपने मन में सवाल करती है अगर वर्तमान या भूत-काल में खा लिया गया है तो फिर न खाने देंगे तो गलत साबित हुआ? लिहाजा जनता को प्रधानमंत्री से एक्शन की अपेक्षा थी जीरो टॉलरेंस के वायदे के मुताबिक, जड़ चुप्पी की नहीं। न्याय शास्त्र के हिसाब से नैतिकता का पतन एक सीढ़ी हो या हजार बहुत अंतर नहीं पड़ता। अर्थात अगर आप मंत्री हैं और नैतिक भी हैं तो आप के पति देश के कानून से बचने के लिए लंदन में बैठे ललित मोदी के केस नहीं लड़ेंगे और आप की बेटी के लिए सवा सौ करोड़ की टीम इंडिया में बहुत से मुवक्किल मिल जाएंगे। दूसरा करूणा-जनित मदद की भी कीमत चुकानी होती है। अगर करूणा उभरी तो मंत्रिमंडल में स्पष्ट रूप से यह मुद्दा लाया जा सकता था कि ललित मोदी की पत्नी को कैंसर है, पति का ?से में अस्पताल रहना मानवीय मूल्यों के अनुरूप होगा, लेकिन मेरी बेटी और पति ललित मोदी के पे रोल पर हैं लिहाजा मैं नैतिकता के आधार पर इस बैठक से बाहर जाती हूं, आप फैसला करें।

बाकी सजदा करने वाले

जब मोदी ने न खाने देंगे कहा तो देश खुश हुआ पर साथी सशंकित। ?से में टीम नहीं बन पाती अगर बनी भी तो किसी एक या दो लोगों की जैसे किसी अमित शाह और किसी अरूण जेटली की। बाकी सजदा करने वाले होंगे। लिहाजा संसद में इतने बहुमत के बावजूद क्राइसिस मैनेजमेंट या फ्लोर कोऑर्डिनेशन नहीं दिखेगा। अगर कोई अन्य बोला भी वह मोदी के गुणगान से ऊपर नहीं बढ़ पाता। यही वजह है कि टीवी चैनलों के डिस्कशन में भाजपा के कुछ युवा प्रवक्ता अहंकार और बद्जुबानी की प्रतिमूर्ति बन जाते हैं।

कांग्रेस की दोहरी मुसीबत

कांग्रेस की मुसीबत दोहरी है। राहुल गांधी के पास गंभीर समझ व तथ्यों की कमी है, जबकि मल्लिकार्जुन खडग़े के पास प्रवाहपूर्ण भाषा का अभाव है। लिहाजा, संसद में आरोप-प्रत्यारोप का स्तर मोदी में गट्स नहीं और … की मौसी के पास कितना पैसा है तक गिरा। भाजपा की एक साध्वी सांसद को विरोध करने वाले सांसदों के बारे में पत्रकारों से बोलीं संसद में भी एक दो आतंकवादी हैं। भाजपा के कुछ नेता मोदी को डिफेंड करने में अति उत्साह दिखाने लगे हैं। हालांकि, मोदी को ?से भौंडे डिफेन्स से नफा नहीं नुकसान हो रहा है। उसी तरह राहुल का आरोप, मोदी में गट्स (साहस) नहीं हैं बचकाना लगता है। मोदी में मात्र गट्स हीं तो है और यही जनता का मोह-भंग कर रहा है।

मुद्दों को तो सही समझें

कौन सा मुद्दा जन-भावनाओं को उद्वेलित करता है और कौन 48 घंटे में उबाऊ हो जाता है, इस बात की समझ राजनीति में जरूरी है। दूसरा, इन मुद्दों को कैसे उठाया जाए व किस माध्यम का इस्तेमाल करें इस बात की समझ भी होनी चाहिए। तीसरा, समाज का शिक्षा स्तर व तार्किक जनचेतना ये सुनिश्चित करती है कि कौन सा मुद्दा किस खंड और काल विशेष में कितना प्रभावित करता है। चौथा, यदि मुद्दों में चौंकाने वाला तत्व यानी स्टनिंग वैल्यू नहीं होकर घिसे-पिटे तथ्य पर ही आधारित हैं तो ये जन-मानस में नहीं बैठ पाएगा। यदि कुछ बिल, खासकर जीएसटी के बारे में आम धारणा है कि इससे सुधार व विकास होगा। जब जनता को यह पता चलता है कि ये बिल विपक्षी हठधर्मिता से पारित नहीं हो रहे हैं तो विपक्ष को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, यह बताने में कि उसका मुद्दा विकास से भारी है। कांग्रेस यह नहीं कर पाई। नतीजतन कहीं यह संदेश भी गया कि कांग्रेस विकास विरोधी है।

भ्रष्टाचार परिमाणात्मक

कांग्रेस के रणनीतिकार इस बात में फर्क नहीं कर पाए कि कू्रड (स्थूल) भ्रष्टाचार और नैतिकता के प्रश्न में अंतर होता है। लिहाजा 2-जी, कोल या बोफोर्स घोटाला उसी पायदान पर नहीं रखे जा सकते जिस पर नैतिक आचरण के मुद्दे। इसका कारण यह है कि पहले किस्म के भ्रष्टाचार आम जनता को भी तुरंत समझ आ जाते है, क्योंकि उनको परिमाणात्मक तराजू पर देखा जा सकता है।

कसौटी पर रहेंगे मोदी

भाजपा व पीएम मोदी भ्रष्टाचार के हालिया आरोपों पर खूंटा वहीं गड़ेगा के भाव में रहे। ललित मोदी कैसे क्रिकेट की दुनिया पर छाए। कैसे एक समय राजस्थान की सत्ता में नंबर -2 रहे। किस तरह यूपीए -2 सरकार 4 साल तक मात्र टैक्स केस बता उसे शिकंजे में कसने से बचाती रही और कैसे भाजपा नेता, केंद्रीय मंत्री, सीएम करूणा उंडेलते रहे? व्यापमं घोटाले से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि खराब हो या न हो, मोदी का चौथा वादा न खाने देंगे शंका पैदा करने लगा है। लिहाजा, जनता के मन में मुद्दा यह नहीं रहा कि वे भी खाते हैं या वो खाएंगे बल्कि क्या खाने देंगे। खैर, अभी तक पहले तर्क वाक्य की विश्वसनीयता पर आंच नहीं आई है। मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी कायम है। उन्हें बार-बार इस कसौटी पर कसा जाएगा। आने वाले सत्र भी उनके लिए आसान नहीं होंगे।

01 बिल पास

केवल दिल्ली हाईकोर्ट (संशोधन) बिल पास हो सका। इसे राज्यसभा पूर्व के सत्र में पारित कर चुकी थी। लोकसभा ने मानसून सत्र में पास किया। कुल मिलाकर लोकसभा में 4 बिल पास हुए जबकि राज्य सभा में एक भी बिल पास नहीं हो सका।

कॉरपोरेट भी चिंतित

संसद के मानसून सत्र में गतिरोध को खत्म करने का कॉरपोरेट जगत ने भी आह्वान किया। लगभग 15 हजार कॉरपोरेट हस्तियों ने चेंज. ओराजी पर ऑनलाइन पिटिशन पोस्ट की। सभी का कहना था कि संसद सुचारू ढंग से काम करे। हर मुद्दे पर स्वस्थ बहस हो। गतिरोध की स्थिति स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कतई ठीक नहीं है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में संभवत: पहली बार है जब कॉरपोरेट ने ये पहल की। ये प्रमुख पिटिशन पर हस्ताक्षर करने वालों में राहुल बजाज, क्रिस गोपालाकृष्णन, पवन मुंजाल, अदी गोदरेज, किरण शॉ मजूमदार, अनु आगा समेत कई डॉक्टर, चिंतक और पूर्व राजनयिक। लोकतंत्र संविधान का सबसे कीमती उपहार है। हमारी संस्थाएं इस आदर्शवाद का बुनियादी ढांचा हैं। अच्छी से अच्छी विरासत के संरक्षण के लिए उसकी लगातार देखरेख करते रहने की जरूरत है। लोकतंत्र की हमारी संस्थाएं दबाव में हैं। संसद चर्चा के बजाय युद्ध का मैदान बन गई है। अब समय आ गया है कि जनता और उसके दल गंभीर चिंतन करें।

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