नियमों का पालन !! शास्त्री जी की महानता !!* ——————————–

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आज का प्रेरक प्रसङ्ग


जन्म दिवस 🎂विशेष :-
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (02.10.1869 – 30.01.1948)

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (02.10.1904 – 11.01.1966)

महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में प्रत्येक कार्य का समय नियत था और नियम कायदों का सख्ती से पालन होता था। आश्रम के प्रत्येक कर्मचारी और वहां रहने वाले सभी लोगों को नियमानुसार ही कार्य करने की हिदायत दी जाती थी। साबरमती आश्रम का एक नियम यह था कि वहां भोजनकाल में दो बार घंटी बजायी जाती थी उस घंटी की आवाज़ सुनकर आश्रम में रहने वाले सभी लोगों को भोजन करने आ जाना होता था। जो लोग दूसरी बार घंटी बजने पर भी भोजन के लिये नहीं पहुंचते उन्हें दूसरी पंक्ति लगने तक प्रतीक्षा करनी पडती थी। एक दिन की बात है कि भोजन की घंटी दो बार बज गयी और गांधी जी समय से उपस्थित नहीं हो सके।

वास्तव में वे कुछ आवश्यक लेखन कार्य कर रहे थे जिसे बीच में छोडना संभव नहीं था इसलिये वे लेखन समाप्त करने के बाद जब भोजनालय आये तब तक भोेजन बंद हो गया था। कार्यकर्तागण महात्मा जी का भोजन निकालकर उनकी कुटिया में ले जाने की तैयारी कर रहे थे। महात्मा गांधी जी अत्यंत सहजता से भोजनालय के बाहर लगी लाइन में खडे हो गये। तभी किसी ने उनसे कहा-

बापू आप लाइन में क्यों लगे हैै। आपके लिये कोई नियम नहीं है। आप अपनी कुटिया में चलें, वहीं भोजन आ जायेगा आप उसे ग्रहण कीजिये। तब गांधीजी बोले नहीं नियम सभी के लिये एक जैसा होना चाहिये। जो नियम का पालन न करे, उसे दंड भी भोगना चाहिये….और महात्मा जी ने भोेजनालय में अगली पंक्ति लगने तक प्रतीक्षा की और भोजनशाला में ही भोजन ग्रहण किया।https://t.me/Shikshavibhag

भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी सादगी व महानता की प्रतिमूर्ति थे। उनके जीवन के अनेक प्रसंग हम सबके लिए प्रेरणादायक हैं। उनकी महानता से संबंधित एक प्रसंग प्रस्तुत है….

बात तब की है, जब शास्त्रीजी इस देश के प्रधानमंत्री के पद को सुशोभित कर रहे थे। एक दिन वे एक कपड़े की मिल देखने के लिए गए। उनके साथ मिल का मालिक, उच्च अधिकारी व अन्य विशिष्ट लोग भी थे। मिल देखने के बाद शास्त्रीजी मिल के गोदाम में पहुंचे तो उन्होंने साड़ियां दिखलाने को कहा। मिल मालिक व अधिकारियों ने एक से एक खूबसूरत साड़ियां उनके सामने फैला दीं। शास्त्रीजी ने साड़ियां देखकर कहा- ‘साड़ियां तो बहुत अच्छी हैं, क्या मूल्य है इनका?’ ‘जी, यह साड़ी 800 रुपए की है और यह वाली साड़ी 1 हजार रुपए की है।’ मिल मालिक ने बताया।

‘ये बहुत अधिक दाम की हैं। मुझे कम मूल्य की साड़ियां दिखलाइए,’ शास्त्रीजी ने कहा। यहां स्मरणीय है कि यह घटना 1965 की है, तब 1 हजार रुपए की कीमत बहुत अधिक थी। ‘जी, यह देखिए। यह साड़ी 500 रुपए की है और यह 400 रुपए की’ मिल मालिक ने दूसरी साड़ियां दिखलाते हुए कहा। ‘अरे भाई, यह भी बहुत कीमती हैं। मुझ जैसे गरीब के लिए कम मूल्य की साड़ियां दिखलाइए, जिन्हें मैं खरीद सकूं।’ शास्त्रीजी बोले। ‘वाह सरकार, आप तो हमारे प्रधानमंत्री हैं, गरीब कैसे? हम तो आपको ये साड़ियां भेंट कर रहे हैं।’ मिल मालिक कहने लगा।

‘नहीं भाई, मैं भेंट में नहीं लूंगा’, शास्त्रीजी स्पष्ट बोले। ‘क्यों साहब? हमें यह अधिकार है कि हम अपने प्रधानमंत्री को भेंट दें’, मिल मालिक अधिकार जताता हुआ कहने लगा। ‘हां, मैं प्रधानमंत्री हूं’, शास्त्रीजी ने बड़ी शांति से जवाब दिया- ‘पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि जो चीजें मैं खरीद नहीं सकता, वह भेंट में लेकर अपनी पत्नी को पहनाऊं। भाई, मैं प्रधानमंत्री हूं पर हूं तो गरीब ही। आप मुझे सस्ते दाम की साड़ियां ही दिखलाएं। मैं तो अपनी हैसियत की साड़ियां ही खरीदना चाहता हूं।’ मिल मालिक की सारी अनुनय-विनय बेकार गई। देश के प्रधानमंत्री ने कम मूल्य की साड़ियां ही दाम देकर अपने परिवार के लिए खरीदीं। ऐसे महान थे शास्त्रीजी, लालच जिन्हें छू तक नहीं सका था।

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