संस्कारों की दौलत ही सच्चा धन

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योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’

आजकल समाज में संस्कारों की कमी देखकर कभी-कभी मन उद्वेलित हो उठता है। समाचारपत्रों में ऐसे समाचार देखकर कि कोई वृद्धा मां या वृद्ध पिता विदेश में या किसी बड़े शहर में नौकरी करने गए अपने पुत्र को देखने को तरसते रहते हैं और एकाकी रहते हुए जब मर जाते हैं, तो भी पुत्र अंतिम संस्कार के लिए नहीं आ पाते तो मन व्यथित हो उठता है। तब मन में एक ही सवाल कौंधता है कि यह दौलत किस काम की जो मां-बाप को अपनी औलाद से दूर कर दे?

लोकजीवन में बार-बार सुनी हुई एक कहावत मन में अनायास ही गूंज उठती है—पूत सपूत तो क्यों धन संचै, पूत कपूत तो क्या धन संचै अर्थात‍् अगर किसी का पुत्र कपूत हो तो उसके लिए धन एकत्र करना बेकार ही है, क्योंकि वह तो मुफ्त मिले धन को उड़ा ही देगा। और अगर पुत्र सपूत है तो उसके लिए धन एकत्र करना व्यर्थ है क्योंकि वह तो स्वयं ही अपने संस्कारों के बल पर इतना धन कमा लेगा कि किसी और के धन की उसे जरूरत ही नहीं होगी।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि माता-पिता अपने बच्चों को इंजीनियर और डॉक्टर बनाकर विदेशों में धन कमाने तो भेज देते हैं और फिर अकेले वृद्धावस्था में उन्हें देखने तक को तरस जाते हैं। समाज में वृद्धाश्रम आखिर क्यों हैं? क्या हमारी संयुक्त परिवार-प्रथा से मिले संस्कारों से हमारा जीवन सुख से भरापूरा नहीं रहता था? एकल परिवार हमारे अवसाद का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं, यह आज का ऐसा भीषण सच है, जिसने समाजशास्त्रियों को बेचैन कर दिया है।

लगभग दस साल की उम्र का अख़बार बेचने वाला एक बालक एक मकान का गेट बजा रहा था, तभी मालकिन ने बाहर आकर पूछा, ‘क्या बात है?’ बालक बोला, ,आंटी जी, क्या मैं आपका गार्डेन साफ कर दूं?, तो मालकिन ने उसे मना कर दिया। बालक ने हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में उस महिला से कहा, ‘प्लीज आंटी जी, करा लीजिये न, मैं बहुत अच्छे से साफ करूंगा।’ द्रवित होकर मालकिन ने पूछा, ‘क्या लेगा? तो बालक बोला कि पैसा नहीं देना आंटी जी, मुझे तो आप खाना दे देना।’ मालकिन बोली, ‘लेकिन अच्छे से काम करना है।’ औरत ने सोचा कि शायद लड़का भूखा है तो मैं पहले इसे खाना दे देती हूं।

उसने लड़के से कहा कि बेटे पहले खाना खा ले, फिर काम कर लेना। लड़के ने उत्तर दिया, ‘नहीं, नहीं, आंटी जी, पहले आपका काम कर लूं, फिर आप मुझे खाना दे देना।’ एक घंटे बाद लड़के ने मालकिन को बुलाकर कहा, ‘आंटी जी, देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई है कि नहीं।’ मालकिन खुश होकर बोली, ‘अरे वाह! तूने तो बहुत ही बढ़िया सफाई की है, सारे गमले भी करीने से जमा दिए हैं। यहां बैठ, मैं तेरे लिए खाना लाती हूं।’ जैसे ही मालकिन ने उसे खाना लाकर दिया, तुरंत बालक अपने जेब से एक पन्नी का लिफाफा निकाल कर उसमें खाना रखने लगा। यह देखकर मालकिन बोली कि तूने भूखे ही सारा काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठ कर खा ले। यह सुनकर बालक ने कहा, ‘नहीं, नहीं आंटी जी, मेरी बीमार मां घर पर है। सरकारी अस्पताल से उसके लिए दवा तो मिल गयी है, पर डॉ. साहब ने कहा है कि यह दवा खाली पेट नहीं खानी है। मैं मां के लिए खाना घर ले जाऊंगा और मां को खिलाकर दवाई भी दे दूंगा।’

लड़के की यह बात सुनकर मालकिन रो पड़ी और अपने हाथों से उस मासूम को, उसकी दूसरी मां बनकर खुद खाना खिलाया और फिर उसकी मां के लिए भी रोटियां बनाई और लड़के के साथ उसके घर जाकर उसकी मां को रोटियां खिलाकर आयी। भावुक होकर लड़के की मां से उसने कहा, ‘बहन, आप तो बहुत अमीर हो। जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है, वो तो हम अपने बच्चों को दे ही नहीं पाते हैं! आज तुम्हारे बेटे ने मुझे अहसास कराया है कि मां-बाप का सम्मान कैसे किया जाता है? बहन, मेरे पास चांदी-सोना तो बहुत है, लेकिन तुम्हारे जैसा ऐसा बेटा नहीं है।’ क्या हमने खुद अपने जीवन को सिर्फ और सिर्फ धन-दौलत की चमक का गुलाम नहीं बना लिया है? किसी के घर कार आ जाए तो हम उसे बधाइयां देते हैं, लेकिन जब संस्कार मिट रहे हों, तो हमें बिल्कुल चिन्ता या दुःख नहीं होता? महाकवि जयशंकर प्रसाद की ‘श्रद्धा’ ने ‘मनु’ को यही तो कहा था :-

अपने में भर सब कुछ कैसे,

व्यक्ति विकास करेगा?

यह एकांत स्वार्थ है भीषण,

अपना नाश करेगा।

क्या अपने लिए जीना ही जीना होता है? प्रश्न सभी को चौंकाता है, लेकिन हम दौलत की अंधी दौड़ में इस प्रश्न का उत्तर कभी खोजने की कोशिश ही नहीं करते। आज इतना तो संकल्प ले ही लें कि अपने बच्चों को हम संस्कारों की दौलत जरूर देंगे, ताकि कारों की दौड़ में वे अपने माता-पिता और बड़ों को भूल न जाएं।

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