“मनुष्य के लिए मांसाहार करना अनुचित एवं हानिकर है”

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ओ३म्

मनुष्य की उत्पत्ति अपनी आत्मा तथा परमात्मा सहित इस सृष्टि को जानने तथा सद्कर्म करने के लिये हुई है। क्या हम अपनी आत्मा, ईश्वर और इस सृष्टि को यथार्थरूप में जानते हैं? इसका उत्तर हमें यह मिलता है कि हम व संसार के प्रायः सभी लोग जिनमें सभी मतों के लोग व अनुयायी भी सम्मिलित है, इस कसौटी को पूरा नहीं करते। इसके अनेक कारण हैं जिनमें प्रमुख कारण अज्ञानता है। अज्ञानता के साथ ही उनके अपने अपने अज्ञानतायुक्त संस्कार भी मनुष्य को अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य पर बढ़ने में बाधक होते हैं। परमात्मा ने मनुष्यों सहित सभी प्राणियों को उनकी आत्मा के पूर्वजन्मों के शुभ व अशुभ कर्मों के आधार पर उन्हें भोग व न्याय प्रदान करने के लिये भिन्न भिन्न योनियों में जन्म दिया है। जीवात्माओं के पूर्वजन्मों के जो कर्म हैं, उनका सभी प्राणियों को भोग करना होता है। यदि हम किसी प्राणी को बीच में ही मार देते हैं, उसका कारण भले ही मांस खाना हो, तो यह परमात्मा के न्याय व कार्यों में बाधा पहुंचाना होता है जिस कारण हम परमात्मा व उन प्राणियों के अपराधी व दोषी होते हैं और इसका दण्ड हमें ईश्वरीय न्याय व्यवस्था से मिलता है क्योंकि हमारे देश की व्यवस्था में पशु हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं है। हमारे देश व विश्व में अहिंसा का प्रचार किया जाता है परन्तु दूसरी ओर अहिंसा की धज्जियां पशुओं की हत्या करके और उनका मांस खाकर शिक्षित व अशिक्षित सभी लोग उड़ाते हैं।

मनुष्य मननशील प्राणी होने के कारण ही मनुष्य कहलाते हैं। मनन का अर्थ किसी विषय का ज्ञानपूर्वक चिन्तन व विवेचन करना होता है। मनन के द्वारा हम करणीय व अकरणीय कार्यों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। कर्तव्य व अकर्तव्यों का बोध भी हमें मनन करने से होता है। मांसाहार पर जब विचार करते हैं तो यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं दिखाई देता। परमात्मा ने मनुष्य के भक्षण के लिये अनेक प्रकार के स्वादिष्ट, पौष्टिक एवं हितकारी पदार्थ बनाये हैं। भोजन के लिये नाना प्रकार के अन्न बनाये हैं, फल बनाये हैं, दुग्ध और अनेक स्वादिष्ट एवं पौष्टिक पदार्थ हमें परमात्मा की सृष्टि से सुलभ होते हैं। रोगी होने पर प्रायः सभी रोगों की ओषधियां भी वनों व खेतों से उपलब्ध होती हैं। जो मनुष्य मांसाहार करते हैं उन्हें पहले हिंसक बनना पड़ता है। यह मनुष्य के लिये किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। मांस खाने वाले लोग उक्ति दे सकते हैं कि वह पशुओं को काटते नहीं हैं अपितु पशु वध करने वाले कसाई वा कातिल तो दूसरे लोग होते हैं। मनन करने से हमें यह ज्ञात होता है कि मुख्य अपराधी वह होता है जिसके लिये अपराध किया जाता है व जो अपराध कराता है। मांसाहार में कसाई अपने लिये नहीं अपितु मांसाहार करने वाले लोगों के लिये ही मांस काटता है व निर्धन व अशिक्षित रसोईया अपना पेट भरने के लिये उसे अपने स्वामी की आज्ञा से पकाता है। विधान में हत्या का मुख्य अपराधी मारने वाला उतना नहीं होता जितना हत्या कराने वाला अधिक होता है। अतः इस विधान से मांसाहारी मनुष्य ही पशुओं की हत्या का वास्तविक अपराधी सिद्ध होता है। मांसाहारी व पशु हत्या करने वाले कसाई भले ही हमारी व्यवस्था के अनुसार अपराधी न माने जायें, परन्तु हमारे विधान तो हमारे अल्पज्ञ व अनेक विषयों में अल्पज्ञानी लोगों के बनाये हुए हैं। ईश्वर ने पशु हत्या की किसी को अनुमति नहीं दी है। मांसाहारी मनुष्यों को चाहिये कि वह अपना पक्ष सिद्ध करने के लिये परमात्मा का विधान या उसकी अनुमति दिखायें। वह ऐसा नहीं कर सकते, अतः वह स्वयं को निर्दोष सिद्ध नहीं कर सकते। हम वैदिक धर्मियों के सभी कर्तव्य वेद की आज्ञाओं के अनुकूल होते हैं। वेद ईश्वर का ज्ञान है जो उसने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों को दिया था। वेदों से ही मनुष्य को अपने कर्तव्य व अकर्तव्यों का बोध होता है। सृष्टि के आरम्भ से हमारे देश के सभी विद्वान, मनीषी, ऋषि व योगी वेद को ईश्वरीय विधान मानते रहे हैं तथा उसी के अनुसार आचरण भी करते आये हैं। वेदों में निषिद्ध कर्मों को करना वह पाप समझते रहे हैं। यह तर्क व युक्ति से भी सत्य सिद्ध होता है।

यदि मांसाहार पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये तो इससे देश की अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है। गाय, बकरी व भेड़ आदि की संख्या अधिक होने से दुग्ध व खाद आदि की जो अतिरिक्त मात्रा मिलेगी उससे देश में यह पदार्थ शुद्ध रूप में तथा सस्ते प्राप्त होंगे। इससे नाना रोगों पर भी प्रभाव पड़ेगा और देश के नागरिकों के स्वास्थ्य में सुधार होगा। सभी प्रकार के रोगों में कमी आयेगी और देशवासी स्वस्थ एवं बलवान तथा बुद्धिमान होगे। भेड़ से हमें अधिक मात्रा में ऊन मिलेगा जिससे हमें सर्दियों के गर्म वस्त्र सस्ते दामों में मिलेंगे और इससे लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार भी मिलेगा। देश पर गोहत्या और पशु हत्या का जो कलंक लगा हुआ है, जिससे देश में अनेक आपदायें समय-समय पर आती हैं, वह भी दूर होगा। ऐसे अनेक लाभ मांसाहार व पशु वध पर प्रतिबन्ध लगाकर किये जा सकते हैं। हमें यह सुनकर अत्यन्त पीड़ा होती है कि भारत गोमांस का निर्यात भी करता है। यह बहुत बड़ा कलंक है। जो लोग गोहत्या का विरोध नहीं करते वह सब भी गोहत्या के पाप के भागी हैं। गोरक्षा के लाभों को जानने के लिये सभी को ऋषि दयानन्द की पुस्तक ‘‘गोकरूणानिधि” अवश्य पढ़नी चाहिये।

वेदों में पशुओं को अकारण कष्ट न देने का उल्लेख किया गया है। वेद के किसी मन्त्र या शब्द में मांसाहार का विधान न होने से मांसाहार उचित नहीं है। परमात्मा ने जो पशु आदि बनाये हैं उसमें शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार के पशु हैं। शाकाहारी पशुओं में गाय, बकरी, भेड़, घोड़ा, हाथी, हिरण आदि पशु आते हैं। यह शाकाहारी पशु जीवन भर मांस का सेवन नहीं करते भले ही भूखे क्यों न मर जायें। परमात्मा ने इनको स्वाभाविक ज्ञान के रूप में क्या खाना है और क्या नहीं खाना है, इसका ज्ञान इनकी आत्माओं में दिया हुआ है। दूसरी ओर परमात्मा ने कुछ मांसाहारी पशु भी बनायें हैं। इनके दांत व पैर के पंजे शाकाहारी पशुओं से भिन्न होते हैं। इनको अपने भोजन का ज्ञान है। यह उन्हीं पशुओं को मारकर खाते हैं जो वनों में इन्हें सुलभ होते व शाकाहारी होते हैं। आश्चर्य है कि मनुष्य मननशील व विवेकशील होकर भी शाकाहारी पशुओं का अनुकरण न कर अधिकांशतः मांसहारी पशुओं का अन्धानुकरण कर रहा है। ऐसा करने से हमारी दृष्टि में वह मनुष्य होने का अधिकार व कर्तव्य खो रहा है। मनुष्य मनुष्य तभी तक रहता है जब तक की वह सृष्टिक्रम व ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करता है। यही कारण था कि सृष्टि के आदि काल से महाभारत काल तक हमारे पूर्वज व ऋषि, जो परम विद्वान होते थे, मांसाहार का सेवन नहीं करते थे। हमें भी अपने उन विद्वान व ज्ञानी पूर्वजों का ही अनुकरण करते हुए पूर्ण शाकाहारी बनना है जिससे हम स्वस्थ रहें, हमारी आयु लम्बी हो और हम दुःखों व रोगों का शिकार न होंवे। मांसाहार करने से मनुष्य को परजन्म में मनुष्य का जन्म नहीं मिलता जो कि श्रेष्ठतम प्राणी योनि है। मांसाहारी मनुष्य तम व रजो गुण वाला होता है जिन्हें पशु, पक्षियों व कीट पतंगों का निकृष्ट जन्म मिलता है। पढ़े लिखे अज्ञानी बन्धुओं को यह बात समझ में नहीं आती परन्तु यह सर्वांश में सत्य है। इसे जानने व समझने के लिये हमें वेद व सत्यार्थप्रकाश आदि वैदिक साहित्य का अध्ययन करना होगा व ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभावों को भी जानना होगा। ऐसा करने पर ही हम भक्ष्य व अभक्ष्य पदार्थों के भेद को समझ पायेगे और शाकाहारी भोजन से हम अपने जीवन को रोग व दुःखों से दूर रखकर दीर्घायु होकर साधना करते हुए अपने परजन्म का सुधार कर सकते हैं। जीवन का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष है, वह भी केवल वेद मार्ग पर चलकर ही प्राप्त हो सकता है। मोक्ष प्राप्ति व मृत्यु से पार जाने का वेदमार्ग से इतर अन्य कोई मार्ग व उपाय नहीं है।

परमात्मा ने हमारे शरीर को बनाया है। हमारे शरीर का पाचन तन्त्र शाकाहारी पशुओं से मिलता जुलता है तथा दांतों की बनावट भी उनके ही समान है। मांसाहारी पशुओं का पांचन तन्त्र व दांतों की बनावट भिन्न होती है। इसी से सृष्टिकर्ता का मनुष्य को शाकाहारी प्राणी बनाना सिद्ध हो जाता है। हम जिन पदार्थों को खाते हैं उनसे पे्रम नहीं करते। मांसाहारी परिवारों के छोटे बच्चे गाय, बकरी आदि के बच्चों से प्रेम करते हैं व दोनों आपस में प्रसन्न होकर खेलते हैं। क्या यह उचित है कि जिस प्राणी व उसके बच्चे को हम व हमारे बच्चे प्रेम करते हैं, हमने भी बचपन में किया है, उसको हम अकारण अपने जिह्वा के स्वाद् के लिये मार कर उसके मांस का सेवन करें? यदि ऐसा करते हैं तो यह मानवीयता नहीं अपितु अमानवीयता है और गहरी असंवेदनशीलता है। गाय आदि पशुओं से हमें दुग्ध व गोमूत्र तथा अपने खेतों के लिये गोबर से बनी सर्वोत्तम खाद मिलती है। इन पशुओं का यह उपयेाग कोई कम नहीं है। बकरी का दुग्ध भी बच्चों व बड़ों के लिये अत्यन्त गुणकारी होता है। बच्चों व बड़ों के अनेक रोग बकरी के दुग्धपान से दूर होते हैं व बच्चों की बुद्धि तीव्र करने में भी इसकी बहुत महत्ता है। गाय का बछड़ा हमारे खेतों की जुताई करने के काम आता है और अन्न उत्पन्न करने तथा बैल गाड़ी में उसका योगदान महत्वपूर्ण है। गाय व बैल प्रदुषण नहीं करते जबकि ट्रैक्टर से खेती से वायु प्रदुषण होता है। हाथी व घोड़े भी मनुष्य के अनेक कार्यों में प्रयुक्त होते हैं। पुराने समय में हमारे राजा घोड़े व हाथी पर बैठ कर ही युद्ध करते व शत्रुओं का दमन करते थे। हाथी आज भी वनों में बड़े-बड़े वृक्षों को उठाने व एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने का काम करते हैं जिन्हें मनुष्य नहीं कर सकते।

घोड़े की सवारी प्राचीन काल में की जाती थी तथा वर्तमान समय में भी लोग करते हैं। हमारी किशोरावस्था में कारें व स्कूटर आदि बहुत कम होते थे और बहुत मुश्किल से सड़कों पर यत्र-तत्र दिखाई देते थे। ऐसे समय में हम घोड़ा गाड़ी का ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने में प्रयोग करते थे। हमने गांवों में अपने परिवारों की बारातें बैलगाड़ी में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हुए देखी हैं व स्वयं भी उससे लाभान्वित हुए हैं। घोड़ा शक्ति का प्रतीक है। यह बहुत तेज दौड़ता है। शक्ति की ईकाई को हार्स पावन नाम भारतीयों ने नहीं अपितु विदेशियों ने दिया है। घोड़ा घास व दाना खाकर भी तेज गति से दौड़ता है। महाराणा प्राप्त ने अनेक युद्ध लड़े और अकबर जैसे शासक से कभी पराजित नहीं हुए। यदि मानसिंह जैसे लोग हिन्दू जाति से गद्दारी न करते तो अकबर का दिल्ली में शासनारूढ़ रहना संदिग्ध था। महाराणा प्रताप व उनका घोड़ा शाकाहारी थे और उन्होंने अकबर जैसे दुष्ट शासक को युद्ध में विजयी नहीं होने दिया। जो आत्मबल व साहस शाकाहारी मनुष्यों व पशुओं में होता है वह मांसाहारी मनुष्यों व पशुओं में नहीं देखा जाता। शाकाहारी भोजन का विकल्प मांसाहार कभी नहीं हो सकता। शाकाहारी पदार्थों में परमात्मा ने जो स्वाद व आनन्द का रस भरा है वह किसी पशु के मांस में नहीं है। मांस को हमेशा पका कर ही खाते हैं। कच्चा मांस खाना मनुष्य के बस की बात नहीं है। इससे भी सिद्ध होता है मांसाहार मनुष्य का भोजन नहीं है। मांसाहार एक कुसंस्कार है और हर स्थिति में त्याज्य है। मांसाहार का संस्कार इतना हानिकारक है कि भारत में अतीत में सूखा पड़ने और अन्न उपलब्ध न होने के कारण कई दिनों भूखी रहने पर एक माता ने अपने ही घर के बच्चे को मार कर खा लिया था। यह घटना हमने वर्षों पूर्व श्री ओम्प्रकाश त्यागी जी प्रसिद्ध आर्यनेता एवं सांसद के देहरादून के आर्यसमाज में दिए एक व्याख्यान में सुनी थी। शाकाहार के पक्ष और मांसाहार के विरोध में बहुत कुछ कहा जा सकता है। अनेक विद्वानों ने मांसाहार के विरोध एवं शाकाहार के पक्ष में अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी हैं। ऐसी ही एक पुस्तक आर्यसमाज के विद्वान नेता रहे पं0 प्रकाशवीर शास्त्री लिखित ‘गो-हत्या राष्ट्र-हत्या’ है। हमें स्वाध्यायशील होना चाहिये। ऐसा होने पर ही हम अपना ज्ञान बढ़ाकर अपने जीवन को सन्मार्गगामी बना सकते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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