ऋग्वेद पारायण यज्ञ, भजन एवं सत्संग का आयोजन- ‘मनुष्य को सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर की उपासना करनी चाहियेः शैलेशमुनि सत्यार्थी

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ओ३म्’


वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी प्रत्येक वर्ष सितम्बर महीने में अपने निवास पर वेद पारायण यज्ञ का आयोजन करते हैं। इस वर्ष उन्होंने 8 सितम्बर से 11 सितम्बर 2021 तक ऋग्वेद पारायण यज्ञ का आयोजन किया है। वार्तालाप में उन्होंने हमें बताया कि वह ऋग्वेद के सात मण्डलों के मन्त्रों से स्वयं ही प्रातः सायं दैनिक यज्ञ में पारायण यज्ञ की आहुतियां दे चुके हैं। शेष मन्त्रों से इस चार दिवसीय पारायण यज्ञ में आहुतियां दी जा रही है। शर्मा जी अपने निवास पर प्रतिदिन प्रातः व सायं दैनिक अग्निहोत्र करते हैं। वह अपनी कालोनी के निवासियों को भी यज्ञ करने के लिए प्रेरित करते हैं। शर्मा जी आर्यसमाज, राजपुर-किशनपुर देहरादून का भी संचालन करते व इस समाज के अधिकारियों को आर्यसमाज के कार्यक्रमों के संचालन में सहयोग करते हैं। वैदिक साधन आश्रम में जब जब वेद पारायण यज्ञ होते हैं तो आप उसके यजमान बनते हैं। अपनी आय का एक अच्छा भाग आश्रम व अन्य आर्य संस्थाओं को दान आदि में व्यय करते हैं। देहरादून नगर के आप अग्रगण्य लोकप्रिय आर्य नेता हैं। हमें आपके कार्यों को निकट से देखने का अवसर मिलता है। देहरादून में आपका यश चहुंओर अनुभव किया जाता है।

आज ऋग्वेद पारायण यज्ञ का दूसरा दिन था। यह यज्ञ आर्य विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी, आर्य वानप्रस्थ आश्रम, हरिद्वार के ब्रह्मत्व में चल रहा है। यह में सगीतमय वेद कथा को आर्य भजनोपदेशक श्री नरेश दत्त आर्य जी व उनके पुत्र श्री नरेन्द्र दत्त आर्य जी कर रहे हैं। यज्ञ में वेद मन्त्रों का पाठ द्रोणस्थली आर्ष कन्या गुरुकुल महाविद्यालय, देहरादून की छात्रायें कर रही हैं। प्रतिदिन प्रातः 8.00 बजे से 11.00 बजे तक तथा अपरान्ह 3.00 बजे से सायं 6.00 बजे तक यज्ञ, भजन एवं प्रवचन आयोजित हो रहे हैं। आज हम सायं 5.15 बजे आयोजन में पहुंचे। इस समय यज्ञ व भजन समाप्त हो गये थे। आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी का व्याख्यान हो रहा था। आचार्य जी ने अपने व्याख्यान में सूर्य व उसकी उषा की चर्चा की तथा दोनों का रूपक के अनुसार पति पत्नी संबंध सूचित किया। उन्होंने कहा प्रतिदिन प्रातः सूर्योदय से पूर्व उषा प्रकट होती है। सूर्योदय से पूर्व आकाश में लालिमा छा जाती है। यह दृश्य अत्यन्त मनोहर होता है। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा भी सूर्य की तरह पुरुषार्थ करते हैं और हमें भी इनसे पुरुषार्थ की प्रेरणा लेनी चाहिये। मनुष्य पुरुषार्थ करे तथा उसे पुरुषार्थ से जो भी द्रव्य व धन आदि प्राप्त हो, उससे सन्तुष्ट होना चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि उषा सूर्य से कहती है कि सूर्योदय से पूर्व तुम्हारा वर्ण लाल रंग का होता है। यह लालिमा उषा द्वारा सूर्य को दी गई होती है। उषा सूर्य को कहती है कि सायं सूर्यास्त के समय भी तुम अपने इसी लाल रंग में अस्त होना। आचार्य जी ने कहा कि सूर्य पृथिवी पर पड़े हुए दूषित जल को वाष्प बना कर उसे बादलों को सौंप देता है। आचार्य सत्यार्थी जी ने कहा कि सूर्याेदय से पूर्व तथा सूर्यास्त के बाद भी सूर्य लाल होता है।

आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने कहा वैदिक परम्परा के अनुसार जिस परिवार व समाज में स्त्रियों का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं। ऋषि दयानन्द के कथनानुसार पति के लिए अपनी पत्नी तथा पत्नी के लिए अपना पति देवता होता है। उन्होंने कहा कि जहां पति पत्नी में उत्तम व्यवहार होता है वहां सुख व आनन्द का वास होता है। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द ने यह भी कहा कि यदि सुख की इच्छा है तो गृहस्वामी को अपनी गृहिणी को प्रसन्न व सन्तुष्ट रखना चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि पति को अपनी पत्नी का आभूषण, वस्त्र तथा भोजन आदि से सम्मान करना चाहिये। उन्होंने कहा कि स्त्रियों की मुख्यतः इन्हीं तीन बातों में प्रीति होती है। आचार्य जी ने श्रोताओं को यह भी स्मरण कराया कि ऋषि के शब्दों के अनुसार घर की स्त्रियों का सभी पुरुषों को सम्मान करना चाहिये।

आचार्य जी ने घर की स्त्रियों के घर के कामों में त्यागपूर्ण व्यवहार पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इसी कारण स्त्रियों के नाम के साथ देवी शब्द का प्रयोग किया जाता है। आचार्य जी ने कहा कि हम पुरुषों को देवता बनकर जीना चाहिये। आचार्य जी ने श्रोताओं को अपने मित्रों का बल बनने की प्रेरणा की। उन्होंने श्रोताओं को कहा कि मन्दिरों व मूर्तियों पर धन व्यय मत करो। उन्होंने बताया कि यवन लुटेरे हमारे मन्दिर के स्वर्ण वा धन को लूट कर ले गये थे। आचार्य जी ने अपने कमजोर मित्रों व पड़ोसियों की आर्थिक मदद करने का भी परामर्श दिया। आचार्य जी ने श्रोताओं को बताया कि मूर्तियां जड़ हैं। जो मनुष्य मूर्तियों की पूजा करेगा उसकी बुद्धि भी जड़ हो जायेगी। मनुष्य को सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान तथा सर्वज्ञ ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करनी चाहिये। आचार्य जी ने उदाहरण देकर इजराइल देश के लोगों के शौर्य एवं वीरता की प्रशंसा की। आचार्य जी ने अपने सम्बोधन में हिन्दुओं के पतन के कारण भी बताये और इसके उदाहरण भी दिये। उन्होंने समाज से सभी प्रकार के अन्धविश्वासों को दूर करने का आह्वान किया। आचार्य जी ने कहा कि हमें मूर्तियों की पूजा करना छोड़कर अपने घर के माता-पिता व बड़ों की देवताओं के समान श्रद्धापूर्वक सेवा व पूजा करनी चाहिये। उन्होंने कहा कि जहां भाई भाई परस्पर मिलकर प्रेमपूर्वक रहते हैं वहां रामायण की रचना होती है। आचार्य जी ने श्रोताओं को अपने परिवार के सभी सदस्यों को जोड़कर संगठित रहने की प्रेरणा की। उन्होंने कहा कि पात्रों को दान दें। यह दान आपको परलोक व पुनर्जन्म में सुख प्रदान करेगा। इसी के साथ आचार्य जी ने अपनी वाणी को विराम दिया।

आचार्य जी के उपदेश के बाद द्रोणस्थली आर्ष कन्या गुरुकुल महाविद्यालय की कन्याओं ने सामूहिक सन्ध्या कराई। इसी के बाद आज का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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