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भारतीय संस्कृति

विश्व को क्या-क्या दिया ‘विश्वगुरू’ भारत ने

एस. सी. जैन

अब हम देखें कि मनू द्वारा तैयार की गयी स्मृति और अंग्रेजों द्वारा तैयार की गयी स्मृति में जमीन आसमान का अंतर है। अंग्रेज द्वारा हमारे ग्रंथों व साहित्य में से कुछ वाक्य को निकाल कर रिकॉर्ड कर दिया जाता है कि भारत वासी गाय का मांस खाते हैं। यह सब बाहर के लोगों द्वारा छेड़ा गया यह पक्ष है जो कि बिल्कुल गलत है। ज्ञान हमारे यहां सबसे ज्यादा रहा है क्योंकि भारत जो नाम है वह एक रूप में ही ज्ञान का हिस्सा है। ‘भ’  यानी ज्ञान होता है और ‘रत’ यानी लगा हुआ होता है। अत: भारत ज्ञान में लगा हुआ देश है। यह आज हम भारतीयों के लिए बहुत बड़ी चुनौती का काम है, शोध का काम है कि जो हमारे मूल शास्त्र, ग्रंथ रहे हैं और जो मूल ज्ञान की बातें रही हैं उनकी पुर्नखोज करके देश के सामने प्रस्तुत किया जाए ताकि ये जो मिलावट वाला हिस्सा है यह दूर हो सके और हमको शुद्घ ज्ञान मिल सके। हमारे महर्षि भारद्वाज का यह कहना था कि जो वस्तुएं खेत में जितनी देर में पकती हैं वह बनाने में भी उतनी ही देर में पकेगी। हजारों साल बाद यूरोप के वैज्ञानिक अब उस बात को स्वीकार रहे हैं कि दाल जब देरी से पकेगी तभी पेष्टीकता देगी। जब धीमी-धीमी आंच पर पके हमने वो भी तो जल्दी-जल्दी कुकर में दाल को दस मिनट में पकाकर खाना शुरू किया है और ये जोड़े का दर्द फोकट में लिया है, डायबिटीज ले ली है। अत: हमें खाने में पौष्टिकता नही मिल रही है क्योंकि हम महर्षि भारद्वाज के सूत्र का पालन नही कर रहे हैं वो कहते हैं खाना बनाते समय पवन का स्पर्श व सूर्य का प्रकाश जरूरी है।

हमारे महर्षियों का ग्रंथ, शास्त्र और भगवत गीता है जिनमें एक अध्याय होता है। जापान में इस बात पर सबसे ज्यादा रिसर्च करी है। आप हैरान हो जाएंगे जापानियों ने इस पर चालीस सालों तक हजारों करोड़ों रूपये खर्च करके इस एक सूत्र पर खोज की है कि सुबह उठकर पानी पीना हमारे ऋषि फोकट में बता गये। सवेरे उठकर पानी पीओ और हम पीते रहे हमें फायदे भी होते रहे हैं। सुबह-सुबह पानी पीने के दो लाभ होते हैं। पहला लाभ है रात भर जो मुंह में लार जमा हुई है वो पेट में जाकर एलकेलाईन उत्पन्न करती है। लार क्षारीय होती है। सुबह पेट में लार जानी ही चाहिए ताकि अम्ल को वोन्यूट्रालाइज कर दिया जाए। जिनके पेट में अम्ल शांत है उनके रक्त में अम्ल नही बढ़ेगा तो दूर-दूर तक बीमारियां होने की संभावना ही नही होगी। दूसरा लाभ यह है कि सुबह पानी पीने से बड़ी आंत की सफाई हो जाती है। जो व्यक्ति टायलेट में ज्यादा समय लगाते हैं वो अक्सर बीमार होते हैं तथा इसके विपरीत वो व्यक्ति स्वस्थ होते हैं जो ज्यादा पानी पीने से संडास से कम समय में ही बाहर निकल जाते हैं।

इस तरह का एक नियम और है कि पानी बैठकर पीना चाहिए कभी भी खड़े होकर पानी नही पीना चाहिए। कभी हमने माना ही नही कि इन छोटे छोटे सूत्रों में कितनी गहरी बात है। अन्य देशों ने हजारों करोड़ों रूपये खर्च करके इस नतीजे पर पहुंचे हैं। इस बात से हमें गर्व की अनुभूति होती है। चिकित्सा का दुनिया में ज्ञान का भंडार सबसे पहले हमने ही दिया। एलोपैथी चिकित्सा ने दर्द से धीरे-धीरे लडऩे का इलाज बताया है। उदाहरण के तौर पर अमेरिका में सबसे पहला राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन था। अमेरिका अंग्रेजों का गुलाम था और 1776 में उनको आजादी मिली और वह पहला राष्ट्रपति बना। एक बार वह बीमार हो गया। अमेरिका और यूरोप ठंडे देश है इसलिए यहां बीमारियां ज्यादा होती हैं।

सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा में यहां मिलता नही है। इसलिए वायरल इंफेक्शन सबसे ज्यादा इन्हीं देशों में होता है। एंटीवायरल जितनी भी दवाईयां हैं ये सब अमेरिका और यूरोप ने ही खोजी हैं। बैक्टीरियल इंफेक्शन भी सबसे ज्यादा यहां ही होता है क्योंकि यहां धूप नही पड़ती है। ऐटीबैक्टीरियल दवाईयां भी इन्हीं देशों ने सबसे ज्यादा बनाई हैं। जिन देशों में एलोपथी सबसे पहले आई और दुनिया में फैली तो उस देश अमेरिका के राष्ट्रपति को बुखार हो गया। सारे चिकित्सक और दुनिया भर के चिकित्सक विचार करे कि इनका बुखार कैसे खत्म किया जाए। चिकित्सक इसमें विफल रहे और उसको बुखार बढ़ता ही गया और अंत में सभी एलोपैथी के बड़े-बड़े डॉक्टरों ने मिलकर यह फैसला किया कि जार्ज वाशिंगटन के शरीर में जो खराब रक्त घुस गया है उसको निकाला जाए तभी बुखार ठीक होगा। अनेक महानुभावों ने वाशिंगटन के हाथ पैर बांध दिये। इन महान डॉक्टरों ने इनकी दोनों हाथों कीनशे काट दीं कहा कि शराब खून घुस गया है। इसके साथ अच्छा खून भी रात भर निकलता रहा और सवेरे जार्ज वाशिंगटन मर गया। यह 1776 में एलोपेथी चिकित्सा की कहानी है। उस समय भारत में बड़े से बड़ा बुखार ठीक करने के लिए नीम की गिलोय का काडा पिलाकर लोगों को ठीक किया जाता था ये तो एक ही है ऐसे सैकड़ों चीजें आयुर्वेद में बुखार तोडऩे के लिए भारत के पास है। उस समय अमेरिका में बुखार ठीक करने के लिए नशे काटी जाती थी और खून निकाला जाता था। यह अंतर है आयुर्वेद और एलोपेथी में। ऐलोपेथी के पास दर्द को कम करने एवं खत्म करने के लिए यही एक चीज है। तो हम एक बड़ी चिकित्सा पद्घति को फैलाने वाले प्रशासक रहे है और सारी दुनिया ने हमसे सीखा है।

यूनानी पद्घति एक विकसित चिकित्सा पद्घति है। दुर्भाग्य से हम उसे मुसलमानों से जुड़ा हुआ मानते हैं जबकि मुसलमानों से कुछ भी लेना देना नही है। वो यूनान में विकसित हुई है इसलिए उसका नाम यूनानी पड़ गया। यूनान के शोधक व रिसर्चक ईमानदारी से कहते हैं कि हमने तो सब आयुर्वेद से सीखा है, संस्कृत में से सीखा है चरक में से सीखा है, भावप्रकाश निगटू में से सीखा है। जो औषधि बनाने के तरीके है वो बिल्कुल वही है जो आयुर्वेद में है। थोड़ा अंतर यही है कि यूनान की आबो हवा, जलवायु परिस्थिति के हिसाब से भारत के सूत्रों में थोड़ा फेरबदल किया है।

बाकी सब वही है तो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चिकित्सा पद्घति यूनानी आयुर्वेद में से निकली है। सबसे मूल चिकित्सा आयुर्वेद ही है। यहां सर्जरी के जो मूल नियम हम इस्तेमाल कर रहे हैं वो महर्षि बागवट के अष्टांग हृदय और अष्टाम संग्राम के है। प्लास्टिक सर्जरी आज की सर्जरी की आधुनिकतम विद्या है। इसका आविष्कार भारत में ही हुआ।

1850 से 1860 में सर्जरी क्या होती है यह अंग्रेज जानते भी नही थे। हैदर अली दक्षिणी भारत का एक बढ़ा शासक था। जिससे अंग्रेज कभी जीत नही पाये। कर्नल कूट नाम का एक अंग्रेजी शासक था, जिसका हैदर अली के साथ युद्घ हुआ। जिसमें कर्नल कूट हार गया और हैदर अली ने उसे मारा नही बल्कि उसकी नाक काट दी। हैदर अली ने उससे कहा कि तुम इंग्लैंड जाओ और बताना कि हिंदुस्तान में नाक कटाकर आया हूं। कर्नल कूट जब हिंदुस्तान के एक गांव में जाता है तो उसे उसका एक मित्र मिलता है और वह पूंछता है कि तुम्हारी नाक को क्या हुआ। कर्नल कूट कहता है कि चोट लग गयी। तब उसके मित्र वहां के वैद्य उसकी नाक का आप्रेशन 1.30 घंटे तक करता है तथा उसकी नाक सर्जरी  के माध्यम से लगा देता है।

एक दिन इंगलैंड पार्लियामेंट में कर्नल कूट जब भाषण दे रहा था तो उसने उपरोक्त कहानी बताई। जिससे अंग्रेजों का एक गु्रप भारत आया तब उस वेद से सर्जरी के बारे में पूछा तो पता चला कि हिंदुस्तान में गुरूकुलों में सर्जरी सिखाई जाती है। तब उन्होंने गुरूकुल में प्रवेश ले लिया और सर्जरी की विद्या ली। वे इंग्लैंड जाकर सर्जरी का स्कूल खोला और अंग्रेजों को सिखाया व सर्जरी का ज्ञान दुनिया में फैलाया। इस ज्ञान को पूरे विश्व में फेेलाने के लिए भारत अभियान से अच्छा कोई और अभियान नही होगा।

1710 के साल में एक अंग्रेज भारत आया। उसका नाम डा. उलीवर था। भारत के कलकत्ता में आया यहां घूमा फिर बंगाल घूमा और घूमते हुए इसने एक डायरी लिखी है। वह कहता है कि भारत में आकर मैंने चेचक जैसी महामारी को कितनी आसानी से भारतवासी ठीक कर लेते हैं। यह महामारी सत्रहवीं शताब्दी में फेेली थी। अफ्रीका में इस बीमारी से लाखों लोग मारे गये थे। इस दौरान उसने देखा कि भारतवासी चेचक की बीमारी से लडऩे के लिए टीका लगाते थे। वह कहता है कि ऐसा मैंने पहली बार देखा है जबकि डॉ उलीवर का इंगलैंड में बहुत नाम है वहां के लोग उसे बहुत इज्जत देते हैं। जब वह यहां आया तो उसने देखा कि भारत मं चेचक की बीमारी दुनिया में सबसे कम है। क्योंकि यहां हर भारतवासी ने चेचक का टीका लगवा रखा है। वहन् अपने साथ इंगलैंड से और डा. को लेकर आता है और बताता है कि कैसे घर-घर में चेचक का टीका लगाया जाता है। एक छोटी सी सुई उसको मामूली सा चुभोते हैं उसमें ही तीन दिन के अंदर उनिमिटी होती है। उनके शरीर का जो पस होता है वो हम निकाल लेते हैं और सुई की नोक के बराबर किसी के शरीर में प्रवेश करा देते और फिर उसका शरीर उनिमिटी धारण कर लेता है। भारत में चेचक का टीका लगभग 150 हजार साल से लग रहा है। आज सारी दुनिया यह मानती है कि चेचक के टीके का जो आविष्कारक था वह ओलिवर था, ओलिवर ने ही भारत में आकर ही यह सीखा है।

क्रमश:

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