बिखरे मोती : ब्रह्मानन्द में लीन जो,दूर रहें सन्ताप

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ब्रह्मानन्द में लीन जो,दूर रहें सन्ताप

ब्रह्मानन्द में लीन जो,
दूर रहें सन्ताप।
सर्दी को हर लेते है,
ज्यों सूरज का ताप॥1487॥

व्याख्या:- जिस प्रकार सूर्य की तेज धूप सर्दी को हर लेती है,ठीक इसी प्रकार ब्रह्मानन्द में लीन रहने वाले साधक के सारे सन्ताप स्वतः दूर हो जाते हैं।इस संदर्भ में तैत्तीरोपनिषद् ( ब्रह्मानन्द वल्ली) का ऋषि कहता है -” वाणी जहाँ से लौट जाती है, मन जिसे प्राप्त नहीं कर सकता, उस आनंद-रूप ब्रह्म को जान लेता है, वह कभी भयभीत नहीं होता, उसे सन्ताप नहीं होता। किसी को यह सन्ताप होता कि मैंने ठीक नहीं किया, किसी को यह सन्ताप होता है कि मैंने पाप किया। ये सन्ताप उसे नहीं होते, जो ब्रह्मानन्द में लीन हो जाता है।” अतः मनुष्य को ब्रह्मानन्द में लीन रहने का स्वभाव बनाना चाहिए।
एक सहारा ओ३म् है,
बाकी तो भ्रमजाल।
मनुआ रम उस ब्रह्म में,
वही करेगा निहाल॥1488॥

व्याख्या:- यद्यपि मानवीय समाज में संबंधों का ताना-बाना है किन्तु एक अवस्था ऐसी आती है जब व्यष्टि को समष्टि में केवल मात्र एक सहारा परमपिता परमात्मा ही दिखाई देता है, बाकी संसार मिथ्या दृष्टिगोचर होता है। इसलिए हे मन! तू उस ब्रह्म में रम। वही तेरा कल्याण करेगा, उद्धार करेगा।कठोपनिषद् का ऋषि इस संदर्भ में ‘ओ३म् ‘की महिमा का वर्णन करते हुए कहता है – “यह ओ३म् एक अक्षर है, परन्तु यही ब्रह्य है, यही सब से परे है,इसी अक्षर को जानकर जो कोई कुछ चाहता है,उसे वह प्राप्त हो जाता है।इसी का सबसे श्रेष्ठ सहारा है,इसी का सबसे अन्तिम सहारा है।इसी सहारे को जानकर मनुष्य ब्रह्मलोक में महान् हो जाता है।” इसलिए हे मनुष्य ओ३म् का आश्रय ले,उसका सुमिरन कर,इसी में तेरा आत्मकल्याण है।

नित्य निरन्तर अजन्मा,
पुरातन है ये जीव।
राही आनन्द-लोक का,
पाना चाहवै पीव॥1489॥

मृत्यु की मृत्यु मोक्ष है,
जाने कोई सुजान।
शरणागति से ही तेरा,
होय आत्मकल्याण॥1490॥

व्याख्या:- प्रसंगवश पाठकों की जानकारी के लिए बताना चाहता हूँ।राजा जनक की सभा में प्रकाण्ड पण्डित आर्तभाग ने महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछा था – मृत्यु की मृत्यु क्या है? इस पर याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया – मृत्यु की मृत्यु ब्रह्म -.साक्षात्कार है अर्थात् मोक्ष है। इस रहस्य को कोई बुद्धिमान व्यक्ति ही जानता है।अतः मनुष्य को प्रभु की शरणागति प्राप्त करनी चाहिए। शरणागति गीता का सार है। भगवान कृष्ण गीता के 18वें अध्याय के 66वें श्लोक में कहते हैं – “सर्वधमान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” अर्थात् हे अर्जुन!सब धर्मों को छोड़कर तू मेरी शरण में आ जा भाव यह है कि अनन्य भाव से केवल मेरी शरण में आ जा। जो मेरी शरण में आता है उसके योग-क्षेम और आत्मकल्याण का मैं स्वतः ही ध्यान रखता हूँ।अतः आत्मकल्याण के लिए प्रभु के शरणागत होना नितान्त आवश्यक है। जैसे सूर्य के सम्मुख अन्धकार नहीं ठहरता ठीक इसी प्रकार प्रभु के शरणागत होने वाले साधन के सभी शोक स्वतः नष्ट हो जाते हैं।
क्रमशः

प्रोफेसर विजेन्द्रसिंह आर्य
संरक्षक : उगता भारत

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