देश की दुर्दशा के लिए कितनी जिम्मेदार है वर्तमान राजनीति

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प्रस्तुति – देवेंद्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’)

पिछले कुछ समय में हमारी राजनीति का स्तर जिस तेजी से गिरा है, उसके साक्ष्य वैसे तो हम हर रोज ही देख रहे हैं लेकिन उसका ताजातरीन उदाहरण केन्द्रीय मंत्री नारायण राणे और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बीच उपजा विवाद है, जो बतलाता है कि हमारे ज्यादातर राजनैतिक दल और राजनेता इस दलदल को साफ करने की बजाय उसे और ज्यादा फैलाने में दिलचस्पी रखते हैं। यह स्वतंत्र भारत में पहला अवसर है जब कोई केन्द्रीय मंत्री जैसे उच्च पद पर बैठा एक व्यक्ति अपने ही राज्य में उसी प्रदेश के मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से थप्पड़ जड़ने की मंशा का इज़हार करता है, तो दूसरी तरफ उतनी ही तत्परता से सीएम उसे गिरफ्तार भी करा देता है। सवाल यह है कि जब इस हमाम में सारे ही नंगे हों तो इस नग्नता को ढांकने की जहमत कौन करेगा? शायद जनता की भी इसमें दिलचस्पी खत्म हो गई है और वह भी इसका आनंद लेना चाहती है।

मामला वहां से शुरू हुआ जब नारायण राणे मंगलवार की रात महाराष्ट्र के रत्नागिरी में भारतीय जनता पार्टी की ओर से इन दिनों चलाई जा रही राष्ट्रव्यापी ‘जन आशीर्वाद यात्राÓ के अंतर्गत एक सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने ठाकरे के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिये गये भाषण का जिक्र करते हुए बताया कि उन्हें (ठाकरे) यह याद नहीं कि देश को आजाद होकर कितने साल हो गये हैं और उसकी जानकारी वे मंच पर बैठे व्यक्ति से पीछे मुड़कर लेते हैं। राणे ने यह भी कहा कि अगर वे वहां होते तो ठाकरे को थप्पड़ जड़ देते। राणे के इस वक्तव्य का संज्ञान लेते हुए पुलिस ने उन्हें उस समय गिरफ्तार कर लिया जब वे कार्यक्रम के पश्चात भोजन कर रहे थे। इसे लेकर बवाल मचा और राणे के कार्यकर्ताओं ने तोड़-फोड़ की। उनके खिलाफ कुछ और पुलिस थानों में एफआईआर दर्ज कराई गई है। वैसे उन्हें देर रात को जमानत दे दी गई।

उल्लेखनीय है कि स्वयं राणे कभी शिवसेना के ही नेता थे जिस पार्टी के मुखिया आज ठाकरे हैं। राणे के आक्रामक तेवर इसी पार्टी की देन हैं। एक समय में शिवसेना के मनोहर जोशी को हटाकर राणे को संस्थापक अध्यक्ष बाल ठाकरे ने सीएम बना दिया था। बाद में जब वे खुद उद्धव के साथ पार्टी के भीतर स्पर्धा पर उतारू हो गये तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया। इसके बाद राणे कांग्रेस में चले गये जहां उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की जगह लेनी चाही तो कांग्रेस ने उन्हें निलम्बित कर दिया। हालांकि बाद में उनका निलम्बन तो रद्द हुआ परन्तु बाद में उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कीं। अंतत: उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया जिसने उन्हें राज्यसभा तक पहुंचाया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले मंत्रिमंडल विस्तार में राणे को राजस्व मंत्री बनाया।

राणे-उद्धव के बीच दुश्मनी पुरानी है जो बेहद कटुतापूर्ण स्तर तक पहुंच चुकी है। आपसी मतभेद और वैमनस्यता तो कोई बड़ी बात नहीं लेकिन यह एपिसोड दर्शाता है कि हमारा राजनैतिक व्यवहार कितना असहिष्णु और अमर्यादित हो गया है। भारत के लिए यह सब देखना इसलिए बेहद कष्टप्रद है क्योंकि उसने वह दौर भी देखा है जब अलग-अलग विचारधाराओं के लोग तीव्र मतभेदों के बाद भी देश के निर्माण में मिल-जुलकर हाथ बंटाते थे। पिछले करीब सात दशकों में अनेक राजनैतिक दलों की सरकारें आई और गई हैं। कई सरकारें तो विपरीत विचारधारा के दलों द्वारा गठबंधन करके भी चलाई गईं लेकिन नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच ऐसी कट्टर स्पर्धा तथा तीव्र मतभेद कभी भी देखने को नहीं मिले। मतभेद थे भी परन्तु उनकी अभिव्यक्ति सभ्य व संसदीय तरीके से होती आई है।

जब से राजनीति का व्यवसायीकरण एवं उसमें धर्म एवं अपराध का समावेश हुआ है तथा वह नेताओं-कार्यकर्ताओं के स्वार्थ साधने का माध्यम बनी है, राजनैतिक विमर्शों में बदजुबानी और तल्खी बढ़ी है। हाल के वर्षों में, खासकर जब से मोदी के नेतृत्व में भाजपा प्रणीत सरकार ने केन्द्रीय सत्ता सम्भाली है, जुबानी जंग और भी अशिष्ट हो गई है। एक-दूसरे को अपमानित करने से लेकर हिंसा हमारी समकालीन सियासत का प्रमुख भाव बन गया है। इस अपसंस्कृति का नजारा हमें संसद से लेकर चुनावी सभाओं तक और सामान्य बातचीत से लेकर सोशल मीडिया के संवादों में दिखलाई दे रहा है। विरोधी विचारधाराओं प्रति नफरत का ऐसा माहौल बना हुआ है जिसने हमारी शालीनता और सदाशयता से युक्त राजनैतिक संस्कृति को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है।

सत्ता के प्रति उत्कट अनुराग और अपने विरोधियों के प्रति तीव्र घृणा से यह माहौल बना है जिसके लिए किसी एक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हां, सत्ता में बैठे लोगों को संयम, परस्पर आदर और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण का निर्माण करने के लिए सामूहिक कदम उठाने होंगे वरना हमारी राजनीति की यह कटु भाषा और दुर्व्यवहार देश को नर्क बनाकर रख देगा। परस्पर सम्मान और सहिष्णुता आवश्यक है।

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