मोहम्मद अली जिन्ना और नेहरू के अड़ियल और पीछे हटने के नजरिए के चलते हुआ देश का बंटवारा

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स्वामिनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर

15 अगस्त को यह खयाल उभर ही आता है कि क्या 1947 में भारत विभाजन टाला जा सकता था? कुछ लोग कहते हैं कि अंग्रेजों ने बंटवारा हम पर थोप दिया, लेकिन इतिहास का कोई भी छात्र बता देगा कि यह झूठ है। इस बारे में एक राय है, जिस पर काफी लोग यकीन करते हैं। कहते हैं कि एक तो मुहम्मद अली जिन्ना बहुत अड़ियल थे, दूसरी ओर कांग्रेस ने बंटवारे के खिलाफ खड़ा होने का दम नहीं दिखाया, लिहाजा देश बंट गया।

कांग्रेस हिंदुओं की पार्टी
1909 से देश में लोकल इलेक्शन शुरू हुए। तब ब्रिटिश राज ने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल बना दिया। मुस्लिम निर्वाचक मंडल वाले सिस्टम में मुसलमानों ने लगभग एकतरफा तौर पर मुस्लिम लीग को वोट दिया। इस पर कांग्रेस ने कहा कि यह जो अलग निर्वाचक मंडल का खेल है, राष्ट्रीय भावना के लिए बहुत नुकसानदेह है। वह खेल दरअसल जमीनी हकीकत से जुड़ा था। मुसलमानों की आबादी करीब एक तिहाई थी, लेकिन सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने की व्यवस्था में मुसलमानों के हाथ एक तिहाई से काफी कम सीटें आतीं। उनके लिए अगल निर्वाचक मंडल बना देने से कांग्रेस का दबदबा घट गया।
लाला लाजपत राय का कहना था कि सेपरेट इलेक्टोरेट के जरिए मुसलमानों के साथ सत्ता में साझेदारी असंभव है। इसके बजाय उन्होंने विभाजन का यह प्रस्ताव रख दिया। भारतीय उपमहाद्वीप का अधिकांश हिस्सा हिंदुओं को मिले। मुसलमानों को पठानों के बहुमत वाला नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस दिया जाए। धर्म के आधार पर पंजाब का बंटवारा किया जाए और पश्चिम वाला आधा हिस्सा भी उन्हें मिले। इसी तरह धर्म के आधार पर बंगाल विभाजन हो और पूरब का आधा हिस्सा मुसलमानों को दिया जाए। साथ ही, सिंध भी उन्हें दे दिया जाए। लाला लाजपत राय ने यह प्रस्ताव रखा था 1924 में। यानी तब, जब पाकिस्तान शब्द भी नहीं गढ़ा गया था। लेकिन 1947 में जब देश बंटा, तो हूबहू इसी तरह बंटा।

शुरुआती दिनों में कांग्रेसी रहे जिन्ना ने 1927 में मुस्लिम संगठनों की एक ऑल इंडिया मीटिंग बुलाई। उसमें ‘दिल्ली प्रस्ताव’ पेश किया गया। इसमें अलग निर्वाचक मंडल की मांग नहीं की गई। इसके बजाय कहा गया कि मुसलमानों के लिए कैबिनेट की एक तिहाई सीटें रिजर्व की जाएं। साथ ही, पंजाब और बंगाल में उनकी आबादी के हिसाब से सीटें आरक्षित हों। यह मांग भी की गई कि सिंध, बलूचिस्तान और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस में नए प्रांत बनाए जाएं। शुरू में तो कांग्रेस ने ये प्रस्ताव मान लिए, लेकिन हिंदू महासभा के मदन मोहन मालवीय ने कड़ी आपत्ति की। कांग्रेस उनके आगे झुक गई और एक सुनहरा मौका हाथ से निकल गया।
फिर 1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक रिपोर्ट जारी की गई। कहा गया कि अलग निर्वाचक मंडल तो न बनाया जाए, लेकिन आबादी के लिहाज से मुसलमानों के लिए सीटें रिजर्व की जाएं। यह भी कहा गया कि न तो केंद्र सरकार में इनके लिए कोई रिजर्व सीट हो और न ही पंजाब और बंगाल में धर्म के आधार पर सीटें रिजर्व की जाएं। सांप्रदायिक आधार पर रिजर्वेशन होने पर दोनों राज्यों में मुस्लिम बहुमत ही होता।
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इसके बाद जिन्ना ने एक प्रस्ताव रखा डीसेंट्रालाइज्ड फेडरल इंडिया का, जिसमें सभी प्रांतों को एकसमान स्वायत्तता मिले। साथ ही, अलग निर्वाचक मंडल बनाए जाएं और प्रांतीय और केंद्र सरकारों में एक तिहाई कैबिनेट मंत्री मुस्लिम समुदाय के हों।
साफ था कि कांग्रेस और जिन्ना की राय एक नहीं थी। दोनों ही ओर से मतभेद बढ़ते गए। इतिहासकार के के अजीज कहते हैं कि 1931 से 1940 के बीच विभाजन के जो 33 प्रस्ताव आए, उनमें से केवल 15 प्रस्ताव मुसलमानों ने दिए। बंटवारा तमाम हिंदू भी चाहते थे।
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भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत प्रांतों में चुनाव कराने और सरकारें बनाने की व्यवस्था की गई। 1937 में हुए इन चुनावों में कांग्रेस का बोलबाला रहा। इतिहासकार पेरी एंडरसन कहते हैं कि इसके बाद नेहरू को लगा कि असल राजनीतिक लड़ाई अब कांग्रेस और अंग्रेजों के बीच है, मुस्लिम लीग और रजवाड़े इस जंग में हाशिए पर हैं। कांग्रेस पार्टी के सदस्यों में तब भी 97 फीसदी हिंदू थे। मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों में से 90 फीसदी पर कांग्रेस को मुसलमान उम्मीदवार ही नहीं मिले। रिजर्व कैटिगरी की सीटों पर मुस्लिम लीग ने एकतरफा जीत दर्ज की।
1945-46 में जब चुनाव हुए, तब प्रांतों की 495 मुस्लिम सीटों में से 446 पर मुस्लिम लीग को जीत मिली। मुसलमानों के लिए तय की गई हर सेंट्रल सीट भी उसके खाते में ही गई। बाकी सीटों पर एक बार फिर कांग्रेस का जादू चला। पर अफसोस की बात यह रही कि वे नतीजे पूरी तरह सांप्रदायिक तस्वीर दिखा रहे थे।

टैक्स पर लीग से ठनी
बहरहाल एक अंतरिम कैबिनेट बनी। नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया और लियाकत अली को वित्त मंत्री। लियाकत ने जो बजट बनाया, उसमें उद्योगपतियों पर भारी टैक्स लगा दिया। अधिकतर कांग्रेसियों ने इसे हिंदू विरोधी रुख करार दिया क्योंकि ज्यादातर उद्योगपति हिंदू थे। हालांकि टैक्स की मार पारसियों और ईसाइयों पर भी पड़ी। और हां, ताकतवर टाटा घराने पर भी। कई कांग्रेसी कहने लगे कि मुस्लिम लीग के साथ काम करना असंभव है। नौबत यहां तक आ गई कि जो कांग्रेस 1945 तक कहती थी कि देश बांटने की बात सोची भी नहीं जा सकती, उसी कांग्रेस ने 1947 में माउंटबेटन का प्रस्ताव तुरंत मान लिया। जिन्ना ने जो प्रस्ताव रखे थे, उनके तहत कांग्रेस अगर सत्ता में साझेदारी को राजी हो गई होती तो उस खौफनाक बंटवारे से बचा जा सकता था। लेकिन एक सवाल यह भी है कि तब देश में फिरकापरस्ती जड़ें जमा रही थी और ऐसे में क्या अविभाजित भारत एक गृह युद्ध में फंस जाता? हां, शायद ऐसा हो सकता था। लिहाजा मेरी नजर में बंटवारा ही सबसे अच्छा उपाय था। लेकिन वह भारत पर थोपा नहीं गया। अगर जिन्ना उसके लिए अड़े थे तो नेहरू भी पीछे नहीं थे। उन्होंने भी वह विकल्प चुना ही था।

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