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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

एकाग्रता उत्पन्न करो

जीवन में उन्नति के लिए एकाग्रता बहुत ही आवश्यक है। किसी भी कार्य करने के लिए मन की संकल्प शक्ति की तो आवश्यकता होती ही है मन की एकाग्रता की भी उतनी ही आवश्यकता होती है। मन की संकल्प शक्ति को भी मन की एकाग्रता ही बलवती करती है। इसे इस प्रकार समझाया जा सकता है कि जिस प्रकार हमारी अंगुली जब मन की संकल्प शक्ति के साथ मिलकर काम करती है तो पांच दस किलो भार को बड़ी सहजता से उठा लेती है। पर जब अचानक उसे इतना ही वजन उठाना पड़ जाए तो वह टूट भी सकती है। एक अंगुली का भार पचास सौ ग्राम और भार उठाती है पांच दस किलो। कैसे उठा लेती है-उंगली इतना भार? उत्तर यही है कि जब उसका सामंजस्य शरीर की मन रूपी शक्ति के साथ हो जाता है, तो मन के निर्देश पर शरीर का बल उस समय उंगली में समाविष्ट हो जाता है और उंगली को इतनी शक्ति प्रदान कर देता है कि वह पांच दस किलो भार को उठाने में समर्थ हो जाती है। ऐसे ही मनुष्य संसार में रहकर जब किसी कार्य व्यवहार को करता है तो इसकी समस्त शारीरिक शक्तियों का उसमें पूर्ण मनोयोग से अपने मनोरथ के साथ जुड़ जाना बहुत ही आवश्यक है। इसका अभिप्राय है कि किसी भी कार्य में पूर्ण सफलता की प्राप्ति के लिए अपनी पूर्ण प्रतिभा को एक केन्द्र पर केन्द्रित करना नितांत आवश्यक है।

जैसा देश वैसा भेष

हमारे यहां कहा जाता है कि जैसा देश हो वैसा ही भेष होना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि जिस कार्य में आप लगे हों, उसमें डूब जाओ। मन लगाकर उसे करो। यदि मन रूपी कैमरे का फोकस कार्य करते समय बिगड़ जाएगा तो अपेक्षित परिणाम नही मिलेंगे, यदि आपका कार्य पढ़ाई करने का है, तो पाठ में डूब जाओ। सारा पाठ कंठस्थ हो जाएगा। मन की शक्ति को हिलाओ मत, इधर-उधर भटकाओ मत। कार्य करते समय या पढ़ते समय स्वयं को वहीं उसी पाठ के साथ जोड़े रखो। परिणाम निश्चय ही शुभकारी आएंगे।

एक व्यक्ति भैंसों का कार्य करता है, उसका दूध का व्यापार है। अब यदि वह गाय, भैंस आदि का चारा काटते समय या गोबर हटाते समय अपने वस्त्र आदि सर्वथा स्वच्छ रखता है तो वह अपने उद्देश्य में सफल नही हो पाएगा। क्योंकि गाय, भैंस की पूंछ लगते ही या गोबर आदि लगते ही उसे क्रोध आएगा और तब वह कोई भी अनर्थ कर सकता है। इसलिए उसके लिए आवश्यक है कि उसका जैसा कार्य है वैसे ही वस्त्र धारण करें। तब वह अपने कार्य में सफल हो जाएगा। क्योंकि अब उसे गोबर लगने की या कीचड़ लगने की चिंता ही नही है। इसी बात को हम श्रमिकों, किसानों या किसी अन्य व्यवसायी के विषय में भी ले सकते हैं। कुछ लोगों की प्रवृत्ति होती है कि वो जिन व्यवसायों में लगे हैं उनके स्तर के वस्त्र पहनने में संकोच करते हैं या कृपणता करते हैं, तो वह भी अपने पेशे के साथ न्याय नही करते हैं। बात वहां भी यही लागू होगी कि जैसा देश वैसा भेष। बात यही है कि जिस व्यवसाय में भी हो उसे पूर्ण मनोयोग से करने का प्रयास करो।

हम प्राथमिकताएं तय करें

बहुत से लोग कार्याधिक्य का रोना रोते रहते हैं। कहते रहते हैं कि कार्य अधिक है बहुत व्यस्त हूं, शीघ्र बात करो, कुछ और लोगों से भी मिलना है। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि कार्याधिक्य उसकी अपनी व्यस्तताओं, योजनाओं और प्राथमिकताओं में उत्पन्न हुई अस्त-व्यवस्तता का परिणाम है। इसे उन्होंने स्वयं ने उत्पन्न किया है ना कि कार्याधिक्य ने उत्पन्न किया है।

कार्य की अधिकता की इस व्याधि से बचने के लिए हम प्राथमिकता निर्धारित करें। जो कार्य आज के लिए सबसे अधिक आवश्यक है उसे हम अपने वरीयता क्रम में प्रथम स्थान पर रखें। उसके पश्चात दूसरे स्थान पर ऐसे कार्य को रखें, जो पहले कार्य से कम लेकिन अन्य कार्यों से अधिक महत्वपूर्ण हो। इससे आपके जीवन में एक व्यवस्था उत्पन्न हो जाएगी जिससे जीवन व्यवस्थित और सुंदर होता चला जाएगा।

एक व्यक्ति ने एक महात्मा जी से प्रश्न किया कि महाराज नारियल का वृक्ष अन्य वृक्षों की अपेक्षा अधिक ऊंचा क्यों होता है? इस पर महाराज जी ने कहा कि-वत्स, नारियल के वृक्षों का अन्य वृक्षों की तुलना में अधिक ऊंचा होने का कारण है नारियल के वृक्ष में एकाग्रता का होना। वह एक स्थान पर अपनी सारी ऊर्जा और शक्ति को व्यय करता है और आगे बढ़ता है, ऊंचा चढ़ता है। अपनी शक्ति को और अपनी ऊर्जा को अन्य वृक्षों की भांति विभिन्न शाखा प्रशाखाओं में विखंडित नही करता है। नारियल के वृक्ष की इस ऊंची सोच का अन्य वृक्षों की प्रजातियों में अभाव मिलता है, इसलिए वह ऊंचाई में इतने अधिक नही हो पाते जितना नारियल हो जाता है-या इसकी जैसी प्रजातियों के अन्य वृक्ष हो जाते हैं।

आगे महात्मा जी ने कहा-वत्स नारियल आदि के वृक्ष ऊपर उठने हेतु मात्र एक दिशा का चयन करते हैं, जबकि अन्य वृक्ष किसी भी दिशा में उठने हेतु तत्पर रहते हैं, तथा जिधर अवसर प्राप्त हुआ उसी दिशा की ओर बढऩा आरंभ कर देते हैं। ऐसे वृक्षों का अपना कोई निर्धारित लक्ष्य नही होता, उनकी अपनी प्राथमिकताएं नही होती, उनकी अपनी कोई व्यवस्था नही होती। इसलिए वे ऊंचाइयों को छूने से वंचित रह जाते हैं। जबकि नारियल आदि के वृक्ष ऊंचाईयों को छू लेते हैं।

कहने का अभिप्राय है कि यदि हम भी जीवन को व्यवस्थाओं में ढालकर प्राथमिकताएं निर्धारिन्त करते हुए उन प्राथमिकताओं की सीढिय़ों को तय करना आरंभ कर दें, तो हम भी नीचे नीचे फेलने या भ्रम की अवस्था में इधर उधर भटकने की स्थिति से ऊपर उठ जाएंगे और ऊंचाई की ओर चल निकलेंगे।

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