आप्त पुरूष संसार में, हरें दुखियों का भार

गतांक से आगे….
संत की वाणी का असर,
सब काहू पै न होय।
चुम्बक लोहे को खींच ले,
कीचड़ देय बिछोय।। 952 ।।

व्याख्या :-
संत अथवा सत्पुरूष तो चमकते हुए सूर्य की तरह होते हैं। सूर्य की किरणें पृथ्वी के कण-कण को आलोकित करती हैं किंतु वे उन घरों को प्रकाशित नही कर पाती हैं जिनके दरवाजों के ताले लगे हुए हैं। यदि ऐसा है तो इसमें सूर्य का क्या दोष? चुम्बक लोहे को अपनी ओर खींच लेती है और अपने सजातीय गुणों से ओत-प्रोत कर देती है, उसे अपने जैसा चुम्बक बना देती है , लेकिन किसी लोहे की कील के चारों तरफ कीचड़ लिपटा हो अथवा मिट्टी लगी हो तो उस पर चुम्बक का प्रभाव नही पड़ता है। ठीक इसी प्रकार जिनका हृदय सात्विक प्रवृत्ति से ओत-प्रोत होता है, उन पर संत अथवा सत्पुरूषों की वाणी का प्रभाव शीघ्र होता है, किंतु जिनका मन जड़ता अथवा दुष्टता के कीचड़ में लिपटा पड़ा हो उन पर संत वाणी का कोई प्रभाव नही पड़ता है।
उपरोक्त बात की पुष्टि में रामायण का यह दृष्टांत देखिए-जब माता सीता की तलाश में हनुमान जी लंका में पहुंचे तो रावण के भव्य भवनों के प्रत्येक कक्ष में जाकर वे माता सीता को ढूंढ़ रहे थे। महाबली हनुमान अखण्ड ब्रह्मचारी, प्रकाण्ड पंडित, रामभक्त और सात्विक प्रवृत्ति के महान संत थे। उनकी पदचाप सुनकर सात्विक प्रवृत्ति के धनी रावण के छोटे भाई विभीषण जग गये जबकि जड़ता से आबद्घ और तामसिक प्रवृत्तियों में डूबा हुआ रावण गहन निद्रा में सोता रहा। ठीक इसी प्रकार संत की वाणी का प्रभाव उन्हीं पर पड़ता है जिनकी सात्विक प्रवृत्ति है अर्थात संत प्रवृत्ति है। दुष्ट लोगों पर संत-वाणी का प्रभाव इसलिए नही पड़ता क्योंकि वे रावण की तरह तमस में पड़े हैं अथवा लोहे की कील की तरह कीचड़ में लिपटे पड़े हैं।

सत्य और सुंदरता सदा,
रहती शिव के साथ।
जैसे रवि रश्मियां,
हर क्षण रवि के साथ ।। 953।।

व्याख्या :-
जहां शिव (कल्याण) है वहां सत्य और सुंदरता स्वत: ही आ जाती हंै, क्योंकि सत्य और सुंदरता तो शिव की अनुगामिनी हैं। सच पूछो तो ये तीनों हमारे लिए जीवनदायिनी हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इनका समावेश ही जीवन का उद्देश्य प्राप्त कराता है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने मनीषियों ने भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र इस उद्घोष के साथ किया-‘सत्यं शिवं सुंदरम’।

आप्त पुरूष संसार में,
हरें दुखियों का भार।
इसीलिए परमात्मा,
करते उनसे प्यार ।। 954।।

व्याख्या :-
परमपिता परमात्मा जिन्हें स्वयं प्यार करते हैं उनका स्वभाव कुछ इस प्रकार का होता है कि वे सामान्यजनों में विलक्षण दिखाई देते हैं, क्योंकि आपत्ति किसी पर आती है किंतु रक्षा में हाथ ऐसे ही विलक्षण व्यक्तियों के उठते हैं। वेद ने ऐसे सत्पुरूषों को ‘आप्तपुरूष’ कहा है। दूसरों को विपत्ति में देखकर उनका हृदय मक्खन की तरह पिघलता है। इसलिए ये विपत्तिग्रस्त लोगों की तन, मन, धन से मदद करते हैं। जाति, धर्म, सम्प्रदाय और देश की सीमाएं भी इन आप्तपुरूषों के प्रेम को रोक नही पाती हैं। ऐसे व्यक्ति मानवता की धरोहर होते हैं, इस धरती के गौरव होते हैं। सच्चे अर्थों में परमात्मा के प्रतिनिधि होते हैं। प्रभु उनके सत्कार्यो (पुण्य) से प्रसन्न होते हैं। इसीलिए प्रभु उसे स्वयं असीम प्यार करते हैं। क्रमश:

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