ज्ञानी के क्षण बोलते, शास्त्र-ज्ञान और मोद

बिखरे मोती-भाग 110

यदि मैं मेरे को जानता,
तो भक्ति में हो लीन।
उर में ऐसी तड़प हो,
जैसे जल बिन मीन ।। 966।।
व्याख्या :-
जो लोग ‘मैं’ आत्मा ‘मेरे’ परमात्मा को जानना चाहते हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि शरीर के प्रपंच के पीछे जीवात्मा ही सार वस्तु है, संसार के प्रपंच के पीछे ब्रह्मा ही सार वस्तु है। जीवात्मा तथा ब्रह्मा ही आत्म तत्व है, उसे ही जानना चाहिए किंतु यह बुद्घि का विषय नही है। इसके लिए चित्त की पवित्रता तथा श्रद्घा भक्ति का होना नितांत आवश्यक है। जैसे पृथ्वी  तत्व के बिना गंध को प्राप्त नही किया जा सकता है, ठीक इसी प्रकार आत्मप्रज्ञा और अगाध श्रद्घा भक्ति के बिना मैं और मेरे को नही जाना जा सकता है। इन दोनों को जानने से अभिप्राय है-सत्य में अवस्थित होना। अत: इसके लिए हृदय में तड़प ऐसी हो जैसे मछली पानी के लिए तड़पती है। भाव यह है कि प्रेमभक्ति से ही मैं और मेरे को जाना जा सकता है।
ज्ञानी के क्षण बोलते , 
शास्त्र-ज्ञान और मोद।
मूरख सदा उलझा रहे,
ईष्र्या द्वेष और क्रोध ।। 967 ।
व्याख्या :-
प्राय: इस संसार में विवेकशील व्यक्तियों का समय शास्त्रों का स्वाध्याय करने में, ज्ञान का अर्जन-परिमार्जन तथा नये-नये आविष्कार एवं खोज करके उसका संवर्धन करने में, लोक कल्याणकारी कार्यों के द्वारा विश्वमंगल करने में, पुण्य-प्रार्थना (भक्ति) के द्वारा प्रभु को प्रसन्न करने में तथा चित्त की प्रसन्नता को अक्षुण्ण रखने में बीतता है, जबकि मूर्ख व्यक्ति और क्रोध व प्रतिशोध की अग्नि में धधकते रहते हैं। समझदार व्यक्ति को इनसे बचना चाहिए और सत्पुरूषों जैसा जीवन बिताना चाहिए।
मानव मन तो मतंग है,
करै हस्ति स्नान।
हरि खूंट से बांध ले,
इसका अचूक निदान ।। 968 ।।

व्याख्या-
हमारे ऋषियों ने मानव मन को हाथी की उपमा दी है। जिस प्रकार हाथी में अपार बल है, ठीक उसी प्रकार हमारे मन में भी अपरिमित शक्ति है, बशर्ते कि हाथी की तरह इसे काबू में कर लिया जाए। इसके अतिरिक्त हाथी का जन्मजात स्वभाव होता है कि पहले तो वह अपने शरीर को स्वच्छ रखने के लिए जल से स्नान करता है, किंतु कुछ ही समय बाद आसपास की धूल मिट्टी को अपने शरीर पर डालकर फिर गंदा हो जाता है। यही स्वभाव हमारे मन का है। हम सतचर्चा, सत्कर्म, सत चिंतन के द्वारा मन को स्नान कराते हैं, अर्थात उसे निर्मल करते हैं किंतु थोड़ी सी अवहेलना होते ही हमारा मन आवरण, मल विक्षेप अर्थात ईष्र्या, द्वेष, लोभ, मोह, मद, मत्सर, काम, क्रोध, घृणा और वाणी के उद्वेगों के कीचड़ में फिर दूषित हो जाता है। यह स्थिति स्नान जीवन पर्यन्त चलता रहता है और व्यक्ति मन के इस बुरे स्वभाव (शिकं जे) से निकल नही पाता है। वह जहां से चला था, अंतत: स्वयं को वही खड़ा पाता है। इसका एक ही निदान (ईलाज अथवा उपाय) है कि जिस प्रकार स्नान किये हुए हाथी को महावत मोटी जंजीर से एक खूंटे से बांध देता है तो फिर वह गंदा  नही हो पाता है। ठीकइसी प्रकार यदि मानव मन को कठोर, नैतिक नियमों की जंजीर से पुण्य, प्रार्थना (प्रभु-भक्ति) के खूंटे से बांध दें तो यह मन का निदान राम बाण सिद्घ होगा। प्रभु भक्ति से अभिप्राय है कि सिमरण के साथ-साथ ऐसे कार्य करो जिनसे प्रभु प्रसन्न रहें। 
क्रमश:

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