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कश्मीर और कश्मीरियों की भावनाओं के साथ आखिर कब तक होता रहेगा खिलवाड़

                                                                                                       –प्रो. रसाल सिंह

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्षा और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने अपनी पार्टी के 22 वें स्थापना दिवस (28 जुलाई) के अवसर पर फिर उत्तेजक, आपत्तिजनक और गैर-जिम्मेदाराना बयान देकर एकबार फिर आग भड़काने की साजिश की है। उन्होंने इस अवसर पर कहा है कि केंद्र सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को कश्मीरियों से जो कुछ छीना है, उसे सूद समेत लौटाना पड़ेगा। इसीतरह का उनका एक और विवादास्पद बयान उल्लेखनीय है। उसमें उन्होंने 5 अगस्त, 2019 से पहले की स्थिति की बहाली तक तिरंगा न फहराने की कसम खायी थी। हालांकि, अपनी पार्टी और गुपकार गठजोड़ तक में अकेले पड़ जाने और राष्ट्रीय स्तर पर हुई फजीहत के दबाव में उन्हें अपना वह बयान वापस लेना पड़ा था। महबूबा की बौखलाहट और बिलबिलाहट अस्वाभाविक नहीं है। अलगाववाद और भेदभाव की राजनीति करने वाली महबूबा मुफ़्ती और उनकी पार्टी अस्तित्व-संकट से जूझ रही हैं और खात्मे के कगार पर हैं। गुपकार गठजोड़ में भी वे अलग-थलग पड़ती जा रही हैं। 24 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिल्ली में आयोजित जम्मू-कश्मीर के प्रमुख नेताओं की सर्वदलीय बैठक में इसकी बानगी साफ दिखी। जहाँ फारूक अब्दुल्ला, गुलाम नबी आजाद और सज्जाद लोन जैसे नेता छोटी-मोटी असहमतियों के बावजूद नयी संवैधानिक स्थिति को स्वीकारते हुए जम्मू-कश्मीर को मुख्यधारा से जोड़ना चाहते हैं; वहीं महबूबा अभी भी अपनी अलगाववादी ढपली पर हिंसा, स्वायत्तता, अराजकता और आतंकवाद का बेसुरा राग अलाप रही हैं। वे 5 अगस्त, 2019 से पहले की स्थिति के ख्याली पुलाव पका रही हैं और कश्मीर घाटी के मुठ्ठी भर भ्रमित लोगों को सब्जबाग दिखा रही हैंI  जबकि वास्तविकता यह है कि तब से वितस्ता और तावी में बहुत पानी बह चुका हैI तमाम तरह की बाधाओं और दूरियों को मिटाते हुए जम्मू-कश्मीर के लोग भी आगे बढ़ते हुए राष्ट्रीय मुख्यधारा के जुड़ चुके हैंI अब बंद, हड़ताल, पत्थरबाजी, और गोलीबारी की जगह वे भी अमन-चैन और खुशहाली चाहते हैंI यह बात महबूबा भी जानती हैं और अन्य  अलगाववादी भी जानते हैंI परन्तु बुझने से पहले फड़फड़ाना दिए का स्वभाव होता हैI यह राष्ट्र-विरोधी और भड़काऊ बयानबाजी टूटती सांसों की आखिरी जद्दोजहद हैI

आज़ादी से 5 अगस्त,2019 तक जम्मू-कश्मीर प्रदेश का अधिसंख्य समाज कश्मीर-केंद्रित नेतृत्व की भेदभावपूर्ण शासकीय  नीतियों का शिकार रहा था। यह भेदभाव विकास-योजनाओं से लेकर लोकतांत्रिक भागीदारी तक और अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के संवैधानिक अधिकारों और बहिन-बेटियों के जन्मजात अधिकारों की अवहेलना तक व्याप्त था। जातिगत, धर्म आधारित, क्षेत्रीय और लैंगिक भेदभाव जम्मू-कश्मीर राज्य का स्वातंत्र्योत्तर सच थाI इस अन्याय और भेदभाव के खिलाफ लड़ाई का भी लंबा इतिहास हैI अमर बलिदानी डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, शेरे-डुग्गर पंडित प्रेमनाथ डोगरा, महाराजा हरिसिंह, ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह और ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान जैसे महान सपूतों के संघर्ष और त्याग के परिणामस्वरूप जम्मू-कश्मीर की एकात्मता और विकास का सपना साकार हो सका है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित प्रेमनाथ डोगरा ने जम्मू-कश्मीर को राष्ट्रीय चिंता और चिंतन का केंद्र बनाने के लिए लगातार संघर्ष करते हुए अनेक आंदोलन किये। उन्होंने जम्मू- कश्मीर के लोगों के साथ न्याय और समानता सुनिश्चित करने के लिए अनवरत जनजागरण किया। 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 व 35 A की समाप्ति के बाद जम्मू-कश्मीर के वर्षों से उपेक्षित-वंचित वर्गों के साथ न्याय की परियोजना प्रारंभ हुई है। लम्बी खूनी रात का अंत हुआ है और जम्मू-कश्मीर में नयी सुबह हुई हैI  यहाँ सकारात्मक बदलाव की शुरुआत हुई है।

आज जम्मू-कश्मीर में ज़मीनी बदलाव नज़र आ रहे हैं। कुछ काम हो गया है; और बहुत काम होना बाकी है…! विकास और बदलाव की ये तमाम परियोजनाएं और प्रकल्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के निर्देश पर उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व में कार्यान्वित किये जा रहे हैंI जम्मू-कश्मीर में अभी तक हुए मुख्य बदलाव इसप्रकार हैं- 28 वर्ष की लंबी प्रतीक्षा के बाद यहाँ पिछले साल से त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था पूरी तरह लागू हो गयी है। स्थानीय निकायों को वे सभी अधिकार और संसाधन मिल गये हैं जो पूरे देशभर में मिलते हैं। जम्मू-कश्मीर में ST वर्ग (गुज्जर बक्करवाल, गद्दी, सिप्पी आदि) को राजनीतिक आरक्षण मिला है, जिससे इस वर्ग के विकास के रास्ते खुले हैं। ग्राम पंचायत, क्षेत्र विकास परिषद् और जिला विकास परिषद् चुनावों के माध्यम से ज़मीनी लोकतंत्र में अनुसूचित जनजाति  वर्ग की उल्लेखनीय भागीदारी हुई है। जम्मू-कश्मीर के अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण देकर सामाजिक-न्याय सुनिश्चित किया गया है। संविधान-शिल्पी डॉ. भीमराव अम्बेडकर का यही सपना था कि देशभर में समता और न्याय होI जाति-धर्म, क्षेत्र, लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न होI 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में हुए परिवर्तन के बाद बाबा साहब अम्बेडकर का यह स्वप्न देश के अन्य भागों की तरह जम्मू-कश्मीर में भी साकार होने की पहलकदमी हुई हैI जम्मू-कश्मीर की अधिकार-वंचित बहिनों-बेटियों (जिनका विवाह प्रदेश से बाहर हो जाता था) को न्याय मिला है। पहले उन्हें नागरिक अधिकारों तक से वंचित कर दिया जाता थाI स्वाधीन भारत में लैंगिक भेदभाव का यह शर्मनाक उदाहरण थाI हमारे सभी संविधान-निर्माताओं ने स्वतंत्रता के समय “एक व्यक्ति-एक मत’ का प्रावधान करते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका से भी पहले महिलाओं को मताधिकार देकर दूरदर्शिता, प्रगतिशीलता और लोकतान्त्रिक मूल्यों में गहरी आस्था व्यक्त की थीI किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध स्वतंत्रता, समानता और बंधुता ही उनके मार्गदर्शक सिद्धांत थेI जम्मू-कश्मीर अनुच्छेद 370 और 35ए के तहत मिले अस्थायी और संक्रमणकालीन विशेषाधिकारों की आड़ में इन सिद्धांतों की अवहेलना करता आ रहा थाI अब वहाँ भारत का संविधान पूरी तरह लागू होने से आमूलचूल सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की प्रस्तावना हुई हैI इसी के चलते जम्मू-कश्मीर में बसे हुए लाखों दलितों (विशेषकर वाल्मीकि समाज), पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों, गोरखाओं और पीओजेके विस्थापितों को सम्मान, समान अवसर और मतदान जैसे मूल अधिकार और सुविधाएं मिली हैं।

नयी औद्योगिक नीति लागू होने और निवेशक सम्मेलनों के आयोजन से स्थानीय लोगों को रोजगार के अधिकाधिक अवसर उपलब्ध कराने की पहल हुई है। साथ ही, नई भाषा नीति लागू करके अधिसंख्य जम्मू-कश्मीरवासियों की मातृभाषाओं-डोगरी, कश्मीरी और हिंदी को राजभाषा (शासन-प्रशासन की भाषा) का दर्जा देकर स्थानीय लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने का काम हुआ है। लगभग 98 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा कश्मीरी, डोगरी, हिंदी और पंजाबी आदि हैंI इससे पहले उर्दू और अंग्रेजी को ही राजभाषा का दर्जा प्राप्त थाI उल्लेखनीय है कि उर्दू और अंग्रेजी दो फ़ीसदी से भी कम लोगों की मातृभाषा हैंI इससे स्थानीय लोगों की शासन-प्रशासन की योजनाओं में भागीदारी बढ़ेगीI जम्मू-कश्मीर भाषा, साहित्य और संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैI यह निर्णय समृद्ध साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और विकास में भी सहायक होगाI इन सभी भाषाओं की अकादमियां स्थापित करके और और इन भाषाओं में लिखने-पढ़ने वाले संस्कृतिकर्मियों को प्रोत्साहन देकर यह काम किया जा सकता हैI लम्बे समय से आतंकवाद और भेदभाव के शिकार रहे पर्यटन उद्योग को पुनः विकसित किया जा रहा है। हाल तक उपेक्षित और नज़रंदाज़ किये किये पर्यटन-स्थलों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इस श्रंखला में जम्मू-कश्मीर शासन और तिरुपति तिरुमल देवस्थानम् के संयुक्त प्रयासों के परिणामस्वरूप श्री वेंकटेश्वर भगवान के भव्य मंदिर का निर्माण, पवित्र देविका नदी ( जिसे कि गुप्त गंगा भी कहा जाता है) और शिवखोड़ी गुफा का पुनरुद्धार आदि किया जा रहा है। इससे शेष भारत के साथ जम्मू-कश्मीर का सशक्त सम्बन्ध-सेतु निर्मित होगाI पारस्परिक अजनबीपन,अलगाव और दूरियाँ मिटेंगीI पर्यटन उद्योग की बहाली और विकास से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अपरिमित अवसर पैदा होंगेI रोजगार के अवसर पैदा होने से न सिर्फ स्थानीय लोगों के जीवन-स्तर में गुणात्मक सुधार आएगा, बल्कि उनका प्रवासन भी रुकेगाI

आतंकवादी और देश-विरोधी गतिविधियों में शामिल सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई  की जा रही है। जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करके आतंकवादियों के पनाहगार बने एक दर्जन  से अधिक सरकारीकर्मी बर्खास्त किये जा चुके हैं और सैकड़ों के खिलाफ ख़ुफ़िया जाँच चल रही हैI मुस्तैद सुरक्षा बलों द्वारा आतंकवादियों और अलगाववादियों की नकेल कसने और हवाला फंडिंग रुकने से राष्ट्रविरोधी हिंसक गतिविधियों में निर्णायक  गिरावट हुई है। उल्लेखनीय है कि 5 अगस्त, 2019 के बाद से आतंकवादी वारदातें 59 प्रतिशत तक कम हुई हैं। युवाओं को अलगाववादियों और आतंकवादियों के अड्डों से बचाने के लिए उनकी पढ़ाई-लिखाई को प्राथमिकता दी जा रही हैI जम्मू-कश्मीर की सरकार और युवाओं के अभिभावक अब उनके  हाथ में बंदूक और और पत्थर की जगह कलम और किताब थमा रहे हैंI इसी अभियान के तहत ‘मिशन यूथ’ प्रारम्भ किया गया हैI  इसके तहत जम्मू-कश्मीर के 3000 छात्र-छात्राओं को देश के नामी-गिरामी कोचिंग सेंटरों में प्रतियोगी परीक्षाओं और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश की निःशुल्क तैयारी करायी जा रही हैI यह ‘प्रतिभा विनाश के बरक्स प्रतिभा विकास’ की अनूठी योजना हैI

दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले जम्मू-कश्मीरवासियों को बिजली,पानी,सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधायें मुहैय्या कराने पर तेजी से काम हो रहा है। प्रधानमंत्री रोजगार पैकेज के अंतर्गत कश्मीरी विस्थापितों के लिए रोजगार और आवास की व्यवस्था प्राथमिकता के आधार पर हो रही है। उनके पुनर्वास के लिए सुरक्षित और सुविधायुक्त आवासीय परिसर बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान की गयी है।ई-फाइलिंग के जरिये अर्धवार्षिक ‘दरबार-मूव’ की भारी-भरकम और खर्चीली कवायद को समाप्त किया गया है। शासन-प्रशासन को जवाबदेह और संवेदनशील बनाया जा रहा है। विभिन्न कार्यों के समयबद्ध निपटारे और समस्याओं के त्वरित समाधान  के लिए “सिटिजंस चार्टर” लागू किया गया है। इससे निष्क्रिय और टालू सरकारी कर्मी हरकत में आ रहे हैंI कुशल, कर्मठ और प्रतिबद्ध कर्मचारियों को पुरस्कृत और प्रोत्साहित करना और अयोग्य, अकुशल, अकर्मण्य और कर्तव्यच्युत कर्मचारियों को दण्डित करना राज-धर्म हैI ऐसा करके ही कल्याणकारी नीतियों का लाभ पंक्ति के आखिरी व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता हैI सरकारी नौकरियों, मेडिकल,इंजीनियरिंग और प्रबंधन जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों और विकास-योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और भेदभाव की भी समाप्ति की जा रही है। रोशनी एक्ट और शस्त्र लाइसेंस घोटाले में धर-पकड़ हो रही हैI

जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित परिसीमन आयोग द्वारा विधान-सभा क्षेत्रों का परिसीमन करके उन्हें संतुलित और न्यायसंगत बनाया जा रहा है। अच्छी बात यह है कि पहले इस आयोग का बहिष्कार करने वाले नैशनल कॉन्फ्रेंस जैसे दल भी इस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में भाग लेकर इसे समग्र और समावेशी बना रहे हैंI

एकात्मता दिवस विकास और बदलाव के इस सपने को साकार करने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले महापुरुषों को याद करने का दिन है। उनके जीवन-संघर्ष और चिंतन को आत्मसात करके और भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को समर्पित होकर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है। “एक विधान, एक निशान! सबको समता और सम्मान” न सिर्फ जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में देश के नीति-नियंताओं का पाथेय बने, बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष के संदर्भ में इसे अमलीजामा पहनाने की आवश्यकता है। गुलाम कश्मीर भी इसका अपवाद नहीं है ; क्योंकि 26 अक्टूबर, 1948 को महाराजा हरिसिंह ने जिस जम्मू-कश्मीर रियासत का अधिमिलन भारतीय अधिराज्य में किया था, पाक-अधिक्रान्त जम्मू-कश्मीर भी उसका अभिन्न और अविभाज्य अंग है। पाकिस्तानी फौज और आई एस आई द्वारा गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों पर ढाये जा रहे जुल्मोसितम से निकलने वाली करुण-पुकार को लंबे समय तक अनसुना नहीं किया जा सकता है।

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