विश्वविजेता सिकंदर की भारत विजय: एक भ्रम-भाग-2

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में फिलिप मेसिडोनिया का शासक बना और उसने जल्दी ही मेसिडोनिया को शक्तिशाली राज्य बना दिया । सिकंदर इसी फिलिप का पुत्र था जो ईसा पूर्व सन 326 में 19 – 20 वर्ष की उम्र में शासक बना , पर कैसे बना — इस बारे में इतिहास – लेखकों में मतभेद है क्योंकि फिलिप की हत्या हुई थी और ह्त्या के षड्यंत्र में प्लूटार्क जैसे इतिहास – लेखक सिकंदर को भी शामिल मानते हैं। इस संदेह के कई कारण हैं । कहा जाता है कि सिकंदर की माँ ओलम्प्यास (फिलिप की चौथी पत्नी ; फिलिप ने सात-आठ स्त्रियों से विवाह किए ), विवाह के समय गर्भवती थी, हांलाकि इस बात को ढकने के लिए लोगों ने उसी प्रकार देवताओं वाली कहानी गढ़ी है जैसी हमारे यहाँ महाभारत के पात्र  कर्ण  के जन्म की गढ़ी है। बाद में, फिलिप ने जब अपने एक जनरल  अटालस  की भतीजी क्लियोपेट्रा से विवाह किया, तब विवाह के अवसर पर अटालस ने देवताओं से यह प्रार्थना सार्वजनिक रूप से की कि इस विवाह से  वैध उत्तराधिकारी  का जन्म हो । इसका भी संकेत यही है कि सिकंदर वैध संतान नहीं था । प्लूटार्क ने इस अवसर पर पिता – पुत्र के झगड़े की भी चर्चा की है जिसमें फिलिप ने सिकंदर को मारने के लिए तलवार निकाल ली , पर नशे में होने के कारण वह मेज़ से टकरा कर गिर पड़ा। इस पर सिकंदर ने अपने पिता की हंसी उड़ाई। क्लियोपेट्रा से फिलिप का एक बेटा हुआ । कहा जाता है कि सिकंदर की माँ ओलम्प्यास ने उसे सिकंदर के रास्ते का काँटा मानकर ऐसा विष दिया कि वह मानसिक रूप से विकलांग हो गया । जो भी हो, यह निश्चित है कि फिलिप के बाद मेसिडोनिया का शासक सिकंदर ही बना ।

सिकंदर ईरान वालों से बदला लेना चाहता था । वस्तुत: इसकी तैयारी फिलिप भी कर रहा था ( ऊपर जो फिलिप की हंसी उड़ाने की बात कही गई है उसमें सिकंदर ने यह कहा कि देखो, यह व्यक्ति मेरे पास तक तो पहुँच नहीं पाया , पर ईरान जाने की बात करता है ) । सिकंदर को इस तैयारी का लाभ मिला । ईरान का शासक उस समय दारा तृतीय था और उसका शासन मिस्र तक फैला हुआ था। सिकंदर ने अपनी विजय – यात्रा मिस्र से शुरू की और क्रमश: आगे बढ़ते – बढ़ते, विभिन्न प्रदेशों को जीतते – जीतते वह ईरान तक पहुँच गया। ईरान में यद्यपि उसे भयंकर युद्ध करना पड़ा , पर अंतत: विजय – श्री उसी के हाथ रही।

5.0 सिकंदर की बर्बरता

सिकंदर की विजय यात्राओं से यह तो एकदम स्पष्ट है कि वह निडर, बहादुर, साहसी और कुशल सेना – नायक था, पर सभी इतिहास – लेखकों ने उसकी क्रूरता और बर्बरता की बहुत चर्चा की है। शासक बनते ही सबसे पहले उसने अपने उन सभी विरोधियों की हत्या कर दी / करवा दी जिनसे उसे अपनी कुर्सी के लिए जऱा भी खतरा लगा, फिर वे चाहे उसके परिवार के ही हों या बाहर के। इस काम में उसकी माँ ओलम्पियास भी शामिल थी । क्लियोपेट्रा को उसकी बेटी सहित जि़ंदा जलाया गया और अटालस की सपरिवार हत्या कर दी गई जिसमें उसकी बेटी एवं बेटी के बच्चे भी शामिल थे। साम्राज्य विस्तार के उसके अभियान में वे लोग तो उसके कोप का भाजन बनने से बच गए जिन्होंने बिना लड़े उसकी अधीनता स्वीकार कर ली, पर जिन्होंने उसका सामना करने की जुर्रत की, वे हार जाने पर उसके कहर से बच नहीं पाए।

युद्ध में जिस स्थान को भी उसने जीता, उसे हर तरह से बरबाद कर दिया । सीरिया के पास टायर नामक प्रदेश को जीतने पर उसने शहर को उजाड़ दिया, सभी युवाओं की हत्या कर दी और बच्चों एवं स्त्रियों को दास बनाकर बेच दिया । मिस्र के गाज़ा में उसे कड़ी टक्कर मिली, पर अंतत: वह जीत गया । बस , जीतने पर उसने उस स्थान को बरबाद करना शुरू कर दिया , सभी पुरुषों की बर्बर ढंग से हत्या कर दी और स्त्रियों एवं छोटे बच्चों को दास बना कर बेच दिया । पर्सिपोलस जीतने पर उसने वहां आग लगा कर सब कुछ नष्ट कर दिया । ईरान में उसने विजय के बाद वहां के विशाल महल को , नगर की इमारतों को , सडकों तक को तहस – नहस कर डाला। बख्तर ( बैक्ट्रिया ) ईरान के सम्राट दारा तृतीय के अधीन एक प्रदेश था और वहां का शासक  बेसस  था । सिकंदर ने उस पर आक्रमण किया तो उसने डट कर मुकाबला किया , पर लम्बे संघर्ष के बाद अंतत वह हार गया और पकड़ा गया । सिकंदर के आदेश से उसे बैक्ट्रिया के मुख्य मार्ग पर बिलकुल नंगा किया गया , रस्सी से बांधकर कुत्ते की तरह खड़ा किया गया, कोड़े लगाए गए, नाक और कान काट दिए गए, और इस तरह के अपमान के बाद उसका वध कर दिया गया । नेहरू जी ने भी उसके इस प्रकार के क्रूर व्यवहार का उदाहरण देते हुए लिखा है ,  थीब्स नामक यूनानी शहर ने उसके आधिपत्य को नहीं माना और बगावत कर दी । इस पर सिकंदर ने उस पर बड़ी क्रूरता से और निर्दयता के साथ आक्रमण करके उस मशहूर शहर को नष्ट कर दिया , उसकी इमारतें ढहा दीं, बहुत से नगर निवासियों का क़त्ल कर डाला और हज़ारों को गुलाम बनाकर बेच दिया ( विश्व इतिहास की झलक, संक्षिप्त संस्करण, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली 1984 , पृष्ठ 29 ) ।  सिकंदर का पूरा इतिहास ऐसे ही उदाहरणों से भरा पड़ा है ।

शायद इसी तरह का व्यवहार करने की परम्परा उसे विरासत में मिली थी । उसके पिता फिलिप ने भी अनेक स्थानों को इसी प्रकार नष्ट किया था । अरस्तू के गृह नगर  स्तेगीरा  को भी उसने नेस्तनाबूद करके वहां के सारे निवासियों को दास बनाकर बेच दिया था । बाद में जब अरस्तू सिकंदर का गुरु बना तब उसने अरस्तू पर अहसान करते हुए उस नगर का पुनर्वास कराया ।

6.0 धर्म विजयी बनाम असुर विजयी नृप  हमारे यहाँ प्राचीन साहित्य में दो शब्द मिलते हैं,  धर्म विजयी नृप  और  असुर विजयी नृप । धर्म विजयी नृप ऐसा राजा बताया है जो हारे हुए राजा की  श्री   प्रभुता  ( ह्यश1द्गह्म्द्गद्बद्दठ्ठह्ल4 ) तो ले, पर  मेदिनी  अर्थात ज़मीन ( ह्लद्गह्म्ह्म्द्बह्लशह्म्4 ) लौटा दे , राजा को  ह्म्द्गद्बठ्ठह्यह्लड्डह्लद्ग  करके उसकी गद्दी पर उसे फिर से बैठा दे । महाकवि कालिदास ने रघु की दिग्विजय में रघु को  धर्म विजयी नृप  कहते हुए  श्रीयं जहार न तु मेदिनीम्  कहा है । हमारी परम्परा धर्म विजयी नृप की ही थी ,  चक्रवर्ती सम्राट  ऐसे ही होते थे। इसके विपरीत  असुर विजयी नृप  वह है जो  उत्थाय तरसा  अर्थात विजित को जड़ से उखाड़ दे ।

प्राय:  असुर  का अर्थ  न सुर: इति असुर:  ( जो देवता नहीं , वह असुर ) किया जाता है पर सुप्रसिद्ध इतिहासकार डा. भगवत शरण उपाध्याय ने बताया है कि  असुर विजयी नृप  में असुर का सम्बन्ध ऊपर वाले अर्थ से नहीं, बल्कि प्राचीन पश्चिमी एशिया के देश  असीरिया  से है जो सुमेरिया और बाबुलोनिया (बेबिलोनिया) से ही लगा हुआ था। असीरिया के निवासी, उनकी राजधानी , उनके देवता — सबका नाम  असुर  था । अपने गौरव काल में असीरिया का साम्राज्य मिस्र से ईरान तक फैला हुआ था। यहाँ के शासकों की विशेषता बताते हुए डा. उपाध्याय ने लिखा है कि वे जिस प्रदेश को जीतते थे, उस समूचे राज्य को उखाड़ और उजाड़ देते थे। पूरी आबादी को बदल दिया करते थे और उसे ले जाने का जो तरीका था वह मवेशी की तरह हांक कर ले जाने का था । कोई आदमी इधर-उधर न चला जाए इसलिए एक पतली डोर डालकर ओंठों और नाक को नथ देते थे जिसको अरबों ने बाद में नाकिल कहा। (प्राचीन पश्चिम एशिया और भारत प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली 1977, पृष्ठ 7) ।

सिकंदर से संबंधित विभिन्न घटनाएँ पुकार – पुकार कर यही कह रही हैं कि वह इसी प्रकार का ‘ असुर विजयी नृप ‘ था, क्रूरता उसकी रग – रग में भरी हुई थी। तभी तो उसने शत्रु राजाओं / राज्यों के प्रति ही नहीं, अपने मित्रों / शुभचिंतकों तक के साथ भी क्रूरतम व्यवहार किया। सिकंदर के गुरु अरस्तू का भतीजा  केलिस्थनीज़  सिकंदर का घनिष्ठ मित्र था, लेखक था , युद्ध में उसके साथ था और उसके विजय अभियान को लिपिबद्ध करता जा रहा था ; पर उसकी किसी बात पर नाराज़ होकर सिकंदर ने स्वयं उसकी ह्त्या कर दी। एक और उदाहरण  क्लीटस  का देखिए जो सिकंदर की धाय  लानिके  का भाई और सिकंदर का अभिन्न मित्र था । ईरान के युद्ध में जब सिकंदर घायल हो गया था , शत्रुओं से बुरी तरह घिर गया था और उसका जीवित बचना लगभग असंभव था , तब क्लीटस ने ही अपनी जान जोखिम में डालकर सिकंदर की जान बचाई पर उसी क्लीटस की किसी बात पर तैश में आकर सिकंदर ने पहले उसके साथ अमानुषिक व्यवहार किया और फिर बर्बरतापूर्वक उसकी हत्या कर दी । उसके इसी प्रकार के व्यवहार के कारण नेहरू जी ने सिकंदर को अभिमानी, घमंडी, निर्दयी, बर्बर और क्रूर कहा है । .

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