संयुक्त राष्ट्र में आजम का पत्र बनाम संयुक्त राष्ट्र का गौ समर्थन !!

प्रवीन गुगनानी

गत सप्ताह संयुक्त राष्ट्र संघ के उल्लेख वाली दो घटनाएं देश भर के ध्यान में रही. इन दोनों घटनाओं का दीर्घकालीन प्रभाव भारत में और विश्व में देखनें को मिलता रहेगा. वैसे आजम खान जिस प्रकार की राजनैतिक प्रवृत्तियों के लती और नशेड़ी रहें हैं उस अनुसार उनके लिए राष्ट्र विरोध, संविधान उल्लंघन, देश विद्रोह जैसा काम कोई नई बात नहीं है. जो व्यक्ति भारत में रहते और यहीं का अन्न खाते हुए भारत माता को डायन कह चुका हो उससे किसी भी प्रकार की नैतिकता की आशा करना व्यर्थ ही नहीं अपितु पागलपन है. आजम खान का देश से गद्द्दारी करते हुए व जिस थाली में खाते उसमें छेड़ करने की प्रवृत्ति को सिद्ध करते हुए ये सब कहना उसे एक घृणास्पद व्यक्ति का दर्जा देता है. कानूनी रूप से भी आजम खान का संयुक्त राष्ट्र को सीधे पत्र लिखना देश द्रोह जैसे गंभीर अपराध की परिधि में आता है.

संयुक्त राष्ट्र संघ के नाम से चर्चित इन दोनों समाचारों में पहले सकारात्मक समाचार की चर्चा करते हैं. यूनाइटेड नेशन्स के एनवायरमेंट प्रोग्राम ने गौमांस को ‘पर्यावरणीय रूप से हानिकारक मांस’ बताया है. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि – औसतन एक हैंमबर्गर (गौमांस से बना आहार) के कारण पर्यावरण में तीन किलो कार्बन का उत्सर्जन होता है. इतनें कार्बन का उत्सर्जन सामान्य आहार पकानें से उत्सर्जित होनें वाले कार्बन से लगभग पचास गुना अधिक होता है. संयुक्त राष्ट्र संघ की विशेषज्ञ समिति ने यह भी लिखा कि – आज पृथ्वी को बचाना वाकई स्थायी उपभोग सुनिश्चित करने से जुड़ा है और मांस का उत्पादन दुर्भाग्यवश बेहद ज्यादा उर्जा खपत वाला काम है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मांसाहारी लोग और विशेषत: गौमांस का भक्षण करनें वाले लोग वैश्विक पर्यावरण के सर्वाधिक बड़े दुश्मन हैं. गत माह ही इस देश के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी तथा कलाकार बढ़-चढक़र इस बात की सगर्व घोषणा कर रहे थे कि वे गौमांस भक्षण करते हैं. अब संयुक्त राष्ट्र संघ की इस रिपोर्ट से उन बुद्धिजीवियों को चुल्लू भर पानी में डूब मरनें जैसी स्थिति बन आई है. यद्दपि संयुक्त राष्ट्र कि रिपोर्ट के नहीं आनें की स्थिति में भी इन कथित इंटेलेक्चुअल्स और आर्टिस्टों की इस प्रकार की बेतुकी घोषणाओं से उनका संज्ञाशून्य होना, असंवेदनशील ही नहीं बल्कि पशु वृत्ति का होना तथा बेहद घमंडी होना सिद्ध हो गया था तथापि अब इस रिपोर्ट पर इस कथित वर्ग की प्रतिक्रया बहु प्रतीक्षित है. देश-समाज जानना चाहता है कि कुछ समय पहले गौमांस भक्षक होनें की सार्वजनिक घोषणा करनें वाले इन विघ्न संतोषियों के इस रिपोर्ट पर क्या विचार हैं?! भारत के वे लोग जो यह कहते फिर रहे थे कि – क्या अब हमारा भोजन मेन्यु भी सरकार तय करेगी? संयुक्त राष्ट्र के विषय में अब क्या कहना चाहते हैं. समय-असमय बात-बेबात पर अपना मूंह चलाकर अपनी टीआरपी बढ़ानें और विवादों के माध्यम से ख़बरों-चैनलों में बनें रहनें का नुस्खा लगानें वाले ये कथित बुद्धिजिवी और विचारक अब मूंह में दही क्यों जमायें बैठे हैं?!

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तौर पर गौमांस उत्पादन जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारणों में से एक है. समिति ने मांस उत्पादन उद्योग में गौमांस को शैतान की संज्ञा दी है।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि गौमांस छोडऩे से पृथ्वी पर वैश्विक कार्बन फुटप्रिंट कम होगा. कार्बन उत्सर्जन की यह कमी कारों का उपयोग कम करनें के परिणाम से आनें वाली कार्बन उत्सर्जन की कमी से कई गुना अधिक होगी. पिछले दिनों कुछ अल्पबुद्धियों ने वेदों का उल्लेख करते हुए यह भी कहा कि हमारें ऋषि मुनि भी गौमांस खाते थे. ऐसा कहनें वाले नराधम को यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि वेदों में जिन लोगों का गौमांस भक्षण को लेकर उल्लेख आया है वे समाज में राक्षस नाम से पहचानें जाते थे. शरिया कानून विशेषज्ञ, सउदी अरब के मुफ्ती शेख अब्दुल कहते हैं की विषम परिस्थितियों में व भोजन उपलब्ध न होनें की दशा में एक मुसलमान अपनी बीबी को काटकर उसका मांस खा सकता है. पिछले दिनों जिन लोगों ने गौमांस को लेकर अपनें मूंह व जिव्हा का निकृष्टतम उपयोग किया वे लोग मुस्लिम शरिया क़ानून विशेषज्ञ की इस दलील पर तनिक सा भी मूंह खोल कर बताएं तो जानें! इस भारत भूमि के प्रसिद्द और प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति 11/75 ऋचा में कहा गया है कि मदिरा, माँस आदि यक्ष, राक्षस और पिशाचों का भोजन हैं. जिस मांसाहार और गौमांस भक्षण के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने आज चिंता प्रकट की है उस संदर्भ में हमारें दस हजार वर्ष ईस्वी पूर्व के ग्रंथ विज्ञानसम्मत विचार प्रकट करते हैं.

ऋगवेद 8.101.15 में मनुष्य को संबोधित कर कहा गया है कि – गाय अदिति होकर पूज्य है व इसे काटनें मारनें से मनुष्य पापसिद्द होगा. अथर्ववेद की ऋचा 12.4.38 में कहा गया है कि गौमांस पकानें वाले व्यक्ति के पुत्र मर जायेंगे. अथर्ववेद की ही ऋचा 4.11.3 में कहा गया है कि बैल को खानें वाला व्यक्ति असाध्य कष्टों का भोग करनें को बाध्य होगा. ऋगवेद 6.28.4 में स्पष्ट कहा गया है कि समाज अपनी गायों को वधशाला में न जानें दे अन्यथा विनाश होगा. अथर्ववेद की ऋचा 8.3.24 में कहा गया है कि जो गौहत्या करे उसे तलवार से काट कर मार डालो।

यजुर्वेद की ऋचा 13.43 व 30.18 में भी कहा गया है कि गौहत्यारे को समाज व राज्य द्वारा प्राणदंड दिया जाना चाहिए. ऋषि मुनियों द्वारा गौमांस सेवन की आधारहीन बात कहनें वालों को अथर्ववेद की ऋचा 1.16.4 का स्मरण रखना चाहिए जिसमें कहा गया है कि -यदि नो गां हंसि यद्श्वम यदि पुरुषम – तं त्वां सीसेन विध्यामो यथा नो सो अवीरा: अर्थात जो हमारी गाय, प्रजा, अश्वों की ह्त्या करे उसे शीशे की गोली से निर्ममता पूर्वक मार डालो।

वेदोक्त व शास्त्रोक्त गौसेवा व गौसरंक्षण की करें तो वह वैश्विक मांस उद्योग के कटुक अनुभव की दृष्टि से आज भी सर्वाधिक प्रासंगिक है. ब्राजील व अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों के मांस उद्योगों के कारण वहां के पर्यावरण को जो भारी क्षति हुई उससे वहां का समाज त्राहिमाम कर बैठा है. इन देशों में मांस उद्योग से मिलनें वाले भारी मुनाफे की दृष्टि से जंगलों का विनाश कर बड़े बड़े प्राणी फ़ार्म स्थापित किये गए व इनके सहारे से बड़ी मात्रा में मांस उत्पादन कर धनार्जन किया जा रहा था. अब विशेषज्ञ कह रहें हैं कि मांस उद्योग के कारण इन देशों के जंगल ख़त्म हो गए, भूमि बंजर और अनुर्वर हो गई, वर्षा क्षीण हो गई, जैव विविधता समाप्त होनें से कई जैविक संकट उत्पन्न हुए तथा भूमि में ऐसा तत्वगत परिवर्तन आया कि सम्पूर्ण कृषि दुष्प्रभावित हो गई. इन देशों ने जितना धन मांस उद्योग से अर्जित किया था उससे कई गुना अधिक पर्यावरणीय व कृषि हानि इन देशों ने भुगती है व सतत भुगत रहें हैं.

भारत में गौवंश विरोधियों को यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि सम्पूर्ण विश्व में गौवंश आधारित, गौउत्पाद आधारित प्रयोगों को प्रमुखता से बढ़ाया जा रहा है. अमेरिकी वैज्ञानिक जेम्स मार्टिन ने गाय के गोबर, खमीर व समुद्री पानी से ऐसी उत्प्रेरक खाद विकसित की है जिससे वहां बंजर भूमि को हरा भरा कर कृषि उत्पादन योग्य बनाया जा रहा है. इटली के वैज्ञानिक जी ई बीगेड ने गाय के गोबर से तपेदिक व मलेरिया के रोगाणुओं को समाप्त करनें वाली औषधि विकसित कर ली है. हमारी प्राचीन संस्कृति गौवंश के दुग्ध उत्पादक रहनें या अनुत्पादक रहनें की स्थिति में भी भेद भाव नहीं करती थी क्योंकि अनुत्पादक गौवंश भी एक स्व वित्त पोषित इकाई होकर न केवल स्वयं का व्यय निकालती है अपितु समाज को तत्व प्रदाय के माध्यम से धनार्जन भी करती है।

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