जीवन और मृत्यु का अधिष्ठाता

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🌹जीवन और मृत्यु का अधिष्ठाता🌹

ईशावास्य मिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।
―(यजुर्वेद 49/1)


मन्त्र में बताया है कि यह परिवर्तनशील सम्पूर्ण संसार का एक स्वामी (ईश) है। ज+गत्=जगत्। ज का अर्थ है जन्म लेना और गत् का अर्थ है चले जाना। जहाँ प्राणी जन्म लेता और अन्ततः चला जाता है। इस जन्म और मृत्यु का नियन्ता, अधिष्ठाता भी वही परमात्मा है।.उसी के नियम, व्यवस्था या विधान के अन्तर्गत प्राणी जन्म लेता और मृत्यु को प्राप्त होता है। (तेन त्यक्तेन, भुञ्जजीथाः) उस प्रभुदेव के द्वारा प्रदत्त इस संसार के पदार्थों का त्याग पूर्वक उपभोग करो (मागृधः) इसमें आसक्त मत होओ, इन पदार्थों को अपना मानने का लोभ मत करो। (कस्य स्विद्धनम्) यह धन किसका है? अर्थात् यह धन किसी का नहीं हुआ, इन धनादि पदार्थों का स्वामी वही ईश्वर है।

बड़े से बड़े दुःख, बड़ी से बड़ी मुसीबतें और कष्ट, करुणा-निधान, करुणाकर प्रभु के स्मरण से कम होते हैं और जाते रहते हैं। वही असहायों का सहाय, निराश्रितों का आश्रय और निरवलम्बों का अवलम्ब है। दुनियाँ के बड़े-बड़े वैद्य, डाक्टर, राजा महाराजा और साहूकार प्रसन्न होने पर केवल शारीरिक कल्याण का कारण बन सकते हैं, परन्तु मानसिक व्यथा से व्यथित नर-नारी की शान्ति के कारण तो वही प्रभु हैं, जो इस ह्रदय मन्दिर में विराजमान हैं। दुनियाँ के और लोगों की तरह उसका सम्बन्ध मनुष्यों से शारीरिक नहीं, किन्तु मानसिक और आत्मिक है, वही है जो गर्भ में तथा ऐसी जगहों में जीवों की रक्षा करता है, जहाँ मनुष्यों की बुद्धि भी नहीं पहुँच सकती। एक पहाड़ का भाग सुरंग से उड़ाया जाता है, पहाड़ के टुकड़े-2 हो जाते हैं, एक टुकड़े के भीतर देखते हैं एक तुच्छ कीट है जिसके पास कुछ अन्न के दानें पड़े हैं। बुद्धि चकित हो जाती है, तर्क काम नहीं देता, मन के संकल्प विकल्प थक जाते हैं, यह कैसा चमत्कार है, हम स्वप्न तो नहीं देख रहे हैं। भला इस कठोर ह्रदय पत्थर के भीतर यह कीट पहुँचा कैसे? और उसको वहाँ ये दाने मिले तो मिले कैसे ! वह आश्चर्य के समुद्र में डुबकियाँ लगाने लगता है। अन्त में तर्क और बुद्धि का हथियार डालकर मनुष्य बेसुध-सा हो जाता है। अनायास उसका ह्रदय श्रद्धा और प्रेम से पूरित हो गया, ईश्वर की इस महिमा के सामने सिर झुक गया और ह्रदय से निकल पड़ा कि हे प्रभो! आप विचित्र हो आपके कार्य भी विचित्र हैं।
आपकी महिमा समझने में बुद्धि निकम्मी व मन निकम्मा बन रहा है, आप ही अन्तिम ध्येय और आश्रय हो, नाथ ! आपके ही आश्रय में आने से दुःख-दुःख नहीं रहते, कष्ट-कष्ट नहीं प्रतीत होते।

प्रस्तुति- पंकज शाह

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