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राजनीति

आगामी विधानसभा चुनावों मे मोदी के नेतृत्व में भाजपा को हरा पाना ‘नामुमकिन’

बाल मुकुन्द ओझा

कहा जा रहा है कि यूपी में अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने खेला होई को अपना नारा बनाने का मानस बना लिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने राज्य में राष्ट्रीय पार्टियों के स्थान पर छोटी पार्टियों के साथ मोर्चा बनाने का संकेत दिया है।

अगले साल होने वाले पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों को लेकर पक्ष और विपक्ष में गठजोड़ की धड़ेबंदी शुरू हो गयी है। अगले साल उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य के अलावा उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में चुनाव होने हैं। पांच में से चार राज्यों पर वर्तमान में भाजपा सत्तासीन है और एक राज्य पंजाब में कांग्रेस का कब्जा है। इनमें यूपी और पंजाब में बहुकोणीय और शेष तीन राज्यों में भाजपा और कांग्रेस में सीधे मुकाबले के आसार हैं। सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश है जहाँ अभी से चुनावी तलवारें खड़खड़ाने लगी हैं।

भाजपा ने शीर्ष स्तर पर अपने संगठन और सत्ता को खंगालना शुरू कर दिया है। वहीँ विपक्ष अभी बंटा हुआ है। बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी की जीत के बाद बंटे हुए विपक्ष के हौसले बुलंद है। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने मराठा नेता शरद पवार के कन्धों का बन्दूक रखकर भाजपा को चुनावों में परास्त करने का चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया है। हालाँकि पवार का मानना है बिना कांग्रेस को साथ लिए मोदी के नेतृत्व में भाजपा को हरा पाना नामुमकिन है। मगर जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यूपी में भाजपा के सामने समाजवादी पार्टी मुख्य मुकाबले में है। सपा ने बंगाल में लोगों की जुबान पर चढ़े खेला होबे की तर्ज पर खेला होई का नारा दे दिया है। सपा ने दीवारों और पोस्टरों के जरिये खेला होई को परवान चढ़ाना शुरू कर दिया है।

कहा जा रहा है कि यूपी में अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने खेला होई को अपना नारा बनाने का मानस बना लिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने राज्य में राष्ट्रीय पार्टियों के स्थान पर छोटी पार्टियों के साथ मोर्चा बनाने का संकेत दिया है वहीँ मायावती की बसपा ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की है। कांग्रेस को प्रियंका गाँधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का विश्वास है। हैदराबाद के सांसद ओवैसी ने राजभर की पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का संकेत दिया है। ओवैसी ने यूपी में एकसौ सीटों पर लड़ने की मंशा व्यक्त की है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव ने बताया अभी भतीजे ने उनसे बात नहीं की है। शिवपाल ने सपा से सम्मानजनक समझौता नहीं होने पर अपनी पार्टी प्रसपा के बैनर पर सभी सीटों चुनाव लड़ने की घोषणा की है। मुलायम सिंह यादव की बहू अर्पणा ने चाचा का साथ देने की बात कही है। दूसरी तरफ भीम आर्मी के नेता ने मायावती के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए भाजपा को हराने के लिए रणनीति बनाने की बात कही है। इस भांति यूपी में भाजपा को बिखरे विपक्ष की चुनौती का सामना करना होगा जो उसके लिए एक सुखद संकेत है।

उत्तर प्रदेश की सियासत जातियों के ईर्दिगर्द ही घूमती रही है। यूपी चुनाव में जातीय समीकरण शुरू से ही अहम भूमिका निभाता आया है, ऐसे में सभी पार्टियां अपनी चुनावी रणनीति जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही बनाती हैं। यूपी चुनाव में धर्म और जातीय समीकरण भी एक अहम रोल अदा करता है और सभी पार्टियां इस पर गणित बैठाने में लगी हुई हैं। वोट बैंक के लिहाज से देखें तो यूपी में मुसलमानों की संख्या करीब 17 प्रतिशत है। बीजेपी को यूपी में रोकने के लिए मुस्लिम समुदाय उस पार्टी को वोट देगी जो उनको कड़ा मुकाबला दे सके। सपा के पास अपना परंपरागत 9 प्रतिशत यादव वोट है जो किसी और पार्टी को नहीं जाता है साथ ही मुसलमानों का एक बड़ा प्रतिशत भी उसके साथ है। बसपा के पास अपना दलित वोट बैंक के साथ मुस्लिम मतों का सहारा भी है। भाजपा स्वर्ण और राजपूत मतदाताओं पर अपना अधिकार जमाती है। 41 प्रतिशत ओबीसी जनसंख्या को भी टारगेट किया जा रहा है। यूपी में भाजपा राजनाथ सिंह के जरिए 8 प्रतिशत ठाकुर वोट जीतना चाहेगी। ब्राह्मण, कुर्मी व भूमिहार वोट जिनकी संख्या करीब तेरह प्रतिशत है भी बीजेपी को अच्छा समर्थन देंगे, क्योंकि यह यूपी में परंपरागत इन्हीं के साथ जुड़े रहे। यूपी में जाटों की आबादी 6 से 8 प्रतिशत बताई जाती है। पश्चिमी यूपी के कई क्षेत्रों में जाटों का दबदबा है। किसान आंदोलन के मद्देनजर विपक्षी पार्टियों को उम्मीद है कि जाट भाजपा को हराने के लिए पूरा दमखम लगाएंगे। किसान आंदोलन के प्रमुख नेता राकेश टिकैत पूर्व में रालोद से चुनाव लड़कर अपनी जमानत जब्त करा चुके हैं।

यूपी में गत लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा मिलकर भी भाजपा की विजय यात्रा को नहीं रोक पाए थे। इसी भांति पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा का संयुक्त गठजोड़ भी यहाँ सफल नहीं हो पाया। अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ फिलहाल कोई बड़ा मोर्चा बनने की सम्भावना दिखाई नहीं दे रही है। आज की स्थिति में सपा यहाँ मुख्य मुकाबले में है। मायावती की बसपा, कांग्रेस, सहित शिवपाल यादव, राजभर और ओवैसी सहित अन्य छोटे नेताओं की जातीय पार्टियां अलग अलग मोर्चे बनाकर चुनाव लड़ती है तो इसका फायदा उठाने में भाजपा पीछे नहीं रहेगी। देश के सबसे बड़े पद राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री का ताज सुशोभित करने वाले इस राज्य में फिलहाल भाजपा के खिलाफ किसी दमदार संयुक्त मोर्चे की सम्भावना नजर नहीं आ रही है। बिखरा विपक्ष चुनाव में खेला होई के नारे को कैसे क्रियान्वित करेगा यह भविष्य ही तय करेगा।

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