21 जून जन्म दिवस पर विशेष- आवारा मसीहा : विष्णु प्रभाकर

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बंगला उपन्यासकार शरद चंद्र के जीवन पर ‘आवारा मसीहा’ जैसी कालजयी रचना लिखने वाले हिन्दी कथाकार श्री विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, 1912 को मीरापुर (मुजफ्फरनगर, उ.प्र.) में हुआ था।

उनका प्रारम्भिक जीवन हरियाणा के हिसार नगर में व्यतीत हुआ। वहां से ही उन्होंने 1929 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वे नौकरी करने लगे। साथ-साथ ही उन्होंने हिन्दीभूषण, प्राज्ञ, हिन्दी प्रभाकर तथा बी.ए. भी किया। 1944 में वे दिल्ली आ गये। कुछ समय अखिल भारतीय आयुर्वेद महामंडल तथा आकाशवाणी में काम करने के बाद वे पूरी तरह मसिजीवी हो गये।

विष्णु जी स्वतंत्रता आंदोलन में 1940 और 42 में गिरफ्तार हुए और शासनादेश के कारण उन्हें पंजाब छोड़ना पड़ा। उन्हीं दिनों उन्होंने खादी पहनने का संकल्प लिया और उसे जीवन भर निभाया। उन्होंने हिन्दी की प्रायः सभी विधाओं कहानी, नाटक, उपन्यास, यात्रावृत, रेखाचित्र, संस्मरण, निबंध, अनुवाद, बाल साहित्य आदि में उन्होंने प्रचुर लेखन किया। फिर भी वे स्वयं को मुख्यतः कहानीकार ही मानते थे।

अपने प्रारम्भिक जीवन में वे रंगमंच से भी सम्बद्ध रहे। उन्होंने अनेक पुस्तकों का सम्पादन किया। हिन्दी की इस सेवा के लिए उन्हंे देश-विदेश की हजारों संस्थाओं ने सम्मानित किया। राष्ट्रपति डा. कलाम ने भी उन्हें ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया था।

विष्णु जी ने अपना जीवन अपने ढंग से जिया, इसके लिए उन्होंने किसी से समझौता नहीं किया। भारत देश और हिन्दी भाषा के प्रति उनके मन में बहुत प्रेम था। अंत्यन्त स्वाभिमानी विष्णु जी ने कभी सत्ता के सम्मुख घुटने नहीं टेके। स्वामी दयानंद और गांधी जी के विचारों की छाप उनके मन, वचन और कर्म से सर्वत्र दिखाई देती थी। वे स्वतंत्र चिंतन के पक्षधर थे, अतः विरोधी विचारों का भी खुलकर स्वागत करते थे।

उन्होंने देश के हर भाग की यात्रा कर समाज जीवन का व्यापक अनुभव बटोरा था। इसीलिए उनका लेखन रोचक और जीवंत होता था। जब वे दिल्ली में होते थे, तो सुबह गांधी समाधि पर टहलने अवश्य जाते थे। इसी प्रकार वे शाम को मोहन सिंह प्लेस स्थित काफी हाउस पहुंचते थे, जहां कई पीढ़ी के लेखकों से उनकी भेंट हो जाती थी। वहां साहित्य पर गहरा विमर्श तो होता ही था, हंसी-मजाक भी भरपूर होती थी। देश भर के हजारों लेखकों व पाठकों से वे पत्र-व्यवहार द्वारा सम्पर्क बनाकर रखते थे।

अपनी रचनाओं में वे जाति, भाषा, धर्म के आधार होने वाले भेद तथा नारी समस्याओं को प्रखरता से उठाते थे। समय, समाज व संस्कृति पर की गयी उनकी टिप्पणियां शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। आकाशवाणी के लिए लिखे गये रूपक व नाटकों में उन्होंने कई नये प्रयोग किये, जिसे श्रोताओं ने बहुत सराहा।

‘आवारा मसीहा’ उनकी सर्वाधिक चर्चित रचना है। इसके लिए उन्होंने जीवन के 14 वर्ष लगाये। उन्होंने बंगला भाषा सीखकर शरदचंद्र के सैकड़ों समकालीन लोगों से बात की और बिहार, बंगाल तथा बर्मा का व्यापक भ्रमण किया। इससे पूर्व शरदचंद्र की कोई प्रामाणिक जीवनी नहीं थी। अतः हिन्दी के साथ ही बंगलाभाषियों ने भी इसका भरपूर स्वागत किया।

भारतीय साहित्य के इस भीष्म पितामह का 11 अपै्रल, 2009 को 97वर्ष की सुदीर्घ आयु में देहांत हुआ। वे जीवन भर अतिवाद, रूढ़िवाद और कर्मकांडों से मुक्त रहे। उनकी इच्छानुसार मृत्यु के बाद उनका शरीर छात्रों के उपयोग के लिए अ.भा.आयुर्विज्ञान संस्थान को दान कर दिया गया।
(संदर्भ : साहित्य अमृत, जून 2009)

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