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धर्म-अध्यात्म

सर्व प्राचीन वैदिक धर्म का आधार ईश्वर और उसका निज ज्ञान वेद

ओ३म्

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संसार में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं जो अपने आप को धर्म बताते हैं। क्या वह सब धर्म हैं? यह मत-मतान्तर इसलिये धर्म नहीं हो सकते क्योंकि धर्म श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव को धारण करने को कहते हैं। मनुष्य का कर्तव्य है कि श्रेष्ठ व अनिन्दित गुण, कर्म व स्वभावों को जाने व उन्हें धारण करें। धर्म विषयक एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हमारी यह सृष्टि लगभग दो अरब वर्ष (1 अरब 96 करोड़ 08 लाख 53 हजार 121 वर्ष) पहले बनी और तभी से मनुष्य इस पृथिवी पर है। आरम्भ से ही मनुष्य श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव को धारण करता आ रहा है जिसका आधार ईश्वर प्रदत्त ज्ञान वेद है। वेदों में ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति तथा मनुष्यों के कर्तव्यों आदि का जो ज्ञान है वह सत्य एवं पूर्ण है। उसमें किंचित न्यूनता व असत्य का लेश नहीं है। आजकल संसार में वेद से इतर जितने भी मत-मतान्तर प्रचलित हैं वह सब विगत ढाई सहस्र वर्ष पूर्व व उसके बाद किसी समय मत के प्रवर्तकों के द्वारा आरम्भ किये गये हैं। परीक्षा करने पर यह भी ज्ञात होता है कि सभी प्रचलित मतों में अविद्या, अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीतियां, मिथ्या परम्परायें, सामाजिक असमानता, छोटे बड़े का भाव, विज्ञान के विपरीत कथन, अपूर्णतायें, ईश्वरोपासना की सही विधि न होना तथा ईश्वर के सत्यस्वरूप से भी सभी मत मतान्तरों का अनभिज्ञ होना है। ऐसी स्थिति में प्रचलित मतों को धर्म नहीं कहा जा सकता।

संसार में सभी मनुष्यों का एक ही धर्म है और वह ईश्वर द्वारा वेद में प्रतिपादित मनुष्यों के लिए धारण करने योग्य श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव को धारण कर उनका आचरण करना है। वेद व उसके आचार्यों की शिक्षा है कि ‘सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ इत्यादि। सदैव सत्य बोलना धर्म है। जो वेदों की आज्ञा है और जो बातें विद्या व तर्क से सत्य सिद्ध होती हैं उनका आचरण करना ही धर्म है। धर्म का ज्ञान वेदों के नित्यप्रति स्वाध्याय करने से होता है। स्वाध्याय करना सत्य ज्ञान व आचरण के लिए आवश्यक है। यह वेदों के अर्थों का साक्षात्कार किये हुए ऋषियों की मान्यता है। अन्य मतों के आचार्यों व अनुयायियों को यह ज्ञान ही नहीं होता कि उनकी सभी मान्यतायें सत्य हैं भी या नहीं? वह अपने मत की मान्यताओं की सत्यता की परीक्षा वा पुष्टि कभी करते हों, इसका भी कहीं उल्लेख नहीं मिलता। यदि कोई विद्वान उन्हें कुछ बताना भी चाहे तो वह बुरा मानते हैं और घोषणा करते हैं कि इन पर विचार नहीं किया जा सकता। यूरोप के वैज्ञानिकों ने शायद इसी कारण से धर्म को मानना ही छोड़ दिया है क्योंकि धर्म की मान्यतायें विज्ञान के साथ मेल नहीं खाती। ऐसी स्थिति में कोई भी प्रचलित मत सत्य को प्राप्त नहीं हो सकते।

संसार के सभी मनुष्यों का धर्म एक है और वह सत्य मान्यताओं को जानकर उनका निष्ठापूर्वक आचरण करना है। जो समाज व मनुष्य समूह अपने किसी पूर्व आचार्य की बातों व उपदेशों के आधार पर स्थापित हुआ है, वह धर्म न होकर मत, पंथ, सम्प्रदाय, मजहब, रिलीजन आदि कहलाता है। वेद सत्य ज्ञान का पुस्तक है। उसका रचयिता कोई मनुष्य नहीं है। वेदों की रचना किसी सांसारिक पुस्तक की रचना के रूप में नहीं हुई है। अतः वेदों की रचना के साथ किसी मनुष्य, ऋषि अथवा विद्वान का नाम रचनाकार के रूप में नहीं जुड़ा है। वेद ईश्वर का दिया हुआ ज्ञान है जो सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने चार ऋषियों के हृदय स्थित आत्मा में अन्तःप्रेरणा द्वारा दिया था। परमात्मा सर्वव्यापक होने के कारण सभी जीवात्माओं के भीतर व बाहर विद्यमान है। अतः उसे बोल कर किसी मनुष्य को प्रेरणा करने की आवश्यकता नहीं होती। वह बिना बोले ही मनुष्य की जीवात्मा व जीवात्माओं में निभ्र्रान्त ज्ञान का अनुभव करा सकता है। इसी विधि से परमात्मा ने सृष्टि की आदि में चार ऋषियों को वेदों का ज्ञान दिया था। विस्तार से जानने के लिए ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ देखना चाहिये। अतः वेद ही संसार के ज्ञान व विज्ञान सहित धर्म के प्रमुख व आदि ग्रन्थ हैं। जो बातें, वचन, मान्यतायें व सिद्धान्त वेदों के अनुकूल हैं और तर्क, युक्तियों तथा विद्या आदि से सत्य सिद्ध होते हैं, वह भी धर्म कहलाते हैं। मनुष्यों को सत्य सिद्धान्तों का पालन व आचरण ही करना चाहिये, असत्य तथा तर्क व युक्ति विरुद्ध का नहीं।

वेद संसार में सबसे प्राचीन है और संसार का प्रथम ग्रन्थ है। इससे पूर्व कोई ज्ञान मनुष्य को किसी से प्राप्त नहीं हुआ और न इससे पूर्व किसी ने कोई ग्रन्थ ही लिखा। वेदों के आविर्भाव से पूर्व मनुष्यों की उत्पत्ति नहीं हुई थी, अतः धर्माधर्म विषयक किसी ग्रन्थ की रचना की आवश्यकता भी न थी। चार वेदों से ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति, मनुष्य के कर्तव्यों, सामाजिक नियमों, राजा व प्रजा के कर्तव्यों आदि का विस्तार से ज्ञान प्राप्त होता है। राजा किन किन गुणों से सम्पन्न होना चाहिये इसका वर्णन भी वेद मंत्रों व उसके बाद वेदों के आधार पर रचे गये ऋषियों के ग्रन्थों से प्राप्त होता है। ऋषि दयानन्द जी ने भी अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में राजधर्म विषय पर एक पूरा अध्याय लिखा है। सत्यार्थप्रकाश का छठा अध्याय राजा, प्रजा, दण्ड व्यवस्था, मन्त्री व दूतों के लक्षण, दुर्ग-निर्माण, युद्ध के प्रकार, राज्य रक्षा विधि आदि अनेक विषयों का वर्णन किया गया है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के प्रथम 10 समुल्लासों व अध्यायों में मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक सभी प्रमुख बातों का विस्तार से विवेचन कर बोध कराया गया है। जो ज्ञान व जिन विषयों का विश्लेषण सत्यार्थप्रकाश में किया गया है, वह ज्ञान मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में उपलब्ध नहीं होता। अतः मनुष्य जीवन की पूर्ण उन्नति में सहायक तथा मनुष्य की सभी शंकाओं का तर्क व युक्ति से समाधान करने सहित सृष्टि की आदि से चली आ रही सरल व ग्राह्य वैदिक जीवन पद्धति का परिचय देने के कारण सत्यार्थप्रकाश को आधुनिक युग का धर्म ग्रन्थ कह सकते हैं जो वेदों में शत-प्रतिशत आस्था व विश्वास रखते हुए उसे प्रमाणों से सिद्ध भी करता है।

वेद पर आधारित वैदिक धर्म विगत दो अरब वर्षों से प्रचलित है। विज्ञान व ज्ञान से वैदिक धर्म का किंचित विरोध नहीं है। अतः सृष्टि की शेष अवधि के लिए भी वैदिक धर्म ही ज्ञान विज्ञान से सुसंगत होने के कारण यही सबके मानने व आचरण करने योग्य है। वेदों से मनुष्य को अपनी आत्मा सहित परमात्मा के सत्य स्वरुप का ज्ञान होता है। ईश्वरोपासना की विधि का ज्ञान भी वेदों से होता है। ऋषि दयानन्द ने वेदों के आधार पर उपासना की पुस्तक सन्ध्योपासना विधि भी लिखी है। 16 संस्कारों पर भी संस्कारविधि ग्रन्थ की रचना उन्होंने की है। वेदों के ज्ञान को ऋषि दयानन्दकृत ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ में संक्षेप में बताया गया है। अतः ऋग्वेदभाष्यभूमिका भी सत्यार्थप्रकाश के समान महत्वपूर्ण व दोनों परस्पर पूरक एवं अज्ञान व अन्धकार के निवारक धर्मग्रन्थ हैं। यह दोनों ग्रन्थ धर्म विषयक अन्योन्याश्रित ग्रन्थ हैं। वेदों व वैदिक साहित्य का अध्ययन कर मनुष्य अपने जीवन को सुखी रखते हुए ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि का ज्ञान प्राप्त कर अपने कर्म संचय में सुधार कर अभ्युदय व निःश्रेयस को प्राप्त होते व हो सकते हैं। अभ्युदय व निःश्रेयस की प्राप्ति ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य एवं लक्ष्य है। वैदिक धर्म में जो स्वाध्यायशील लोग हैं, जिन्होंने वेद और वैदिक साहित्य का अध्ययन किया है, वह वेदों को सत्य ज्ञान व विद्याओं का ग्रन्थ अनुभव करते हैं और वेद ज्ञान से पूर्ण सन्तुष्ट हैं। सन्तोष का कारण यह है कि उनका जीवन, जीवन के उद्देश्य के अनुकूल सत्य मार्ग पर चलते हुए व्यतीत हो रहा है। जब तक संसार में मत-मतान्तर हैं, उनमें आपस में विरोध का भाव बना रहने से संसार में सुख व शान्ति स्थापित नहीं हो सकती। सुख व शान्ति स्थापित होने के लिए सबको सत्य का आश्रय लेना होगा। वह आश्रय वेद के अतिरिक्त और कहीं प्राप्त नहीं हो सकता। मनुष्य का नाम मनुष्य भी तभी सार्थक होता है कि जब वह मनन करते हुए ईश्वर, जीव, प्रकृति, उपासना व कर्तव्य आदि में सत्य व असत्य का विवेचन कर सत्य को प्रतिष्ठित करे। ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज सभी मतों व मनुष्यों को आमंत्रित करते हैं कि वह भले ही वेद को स्वीकार न करें परन्तु एक बार ऋषि दयानन्द और आर्य विद्वानों के वेद भाष्यों का अवलोकन, स्वाध्याय व मनन करें। सत्यार्थप्रकाश और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों का भी सत्य व असत्य को जानने की दृष्टि से अध्ययन करें। सत्य का ग्रहण करें और यदि किसी को कहीं कुछ असत्य लगता है, तो उस पर वैदिक विद्वानों से वार्तालाप व सत्यासत्य के निर्णय के लिए चर्चा करें। ऐसा करने से ही देश व समाज सहित मनुष्य मात्र का हित होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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