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भारतीय संस्कृति

योग, प्राणायाम और शरीर के आठ चक्र

 

योग संसार के लिए भारत की अप्रतिम देन है।
महर्षि पतंजलि ने योग की परिभाषा करते हुए कहा कि – ”योगश्चित्त वृत्ति निरोध:” चित्त की वृत्तियों का रोकना ही योग है। चित्त को यदि एक सरोवर मानें तो सरोवर में उठी हुई लहरों को चित्त की वृत्तियां मानना पड़ेगा । इस चित्त के सरोवर का एक किनारा बुद्धि से मिला हुआ आत्मा रूपी गंगा की ओर है और उसका दूसरा विरोधी किनारा इंद्रियों से मिला हुआ जगत की ओर है। चित्त के सरोवर में उठने वाली वृत्ति रूपी लहरें पांच प्रकार की होती हैं :– प्रमाण अर्थात प्रत्यक्ष , अनुमान और आगम
2 – विपर्यय अर्थात नक्शा ज्ञान
3– विकल्प अर्थात वस्तु कल्पित नाम
4 — निद्रा अर्थात सोना
5 — स्मृति अर्थात पूर्व श्रुत और दृष्ट पदार्थ का स्मरण।


”युज्यते असौ योग:” अर्थात् जो युक्त करे अर्थात् जोड़े -वह योग है। आत्मा व परमात्मा को युक्त करना ही योग है। संसार की सभी वस्तुओं का योग होना या कराना तो सहज है, परंतु आत्मा और परमात्मा का योग कराना बड़ा कठिन कार्य है। यद्यपि हमारे ऋषियों ने इसे इतना सरल करके समझाया कि अभी उनके लिए यह इतना कठिन या असंभव नहीं था, जितना आज हमारे लिए हो गया है।
योग के माध्यम से भारत वर्ष ने मनुष्य मात्र को मुक्ति का मार्ग समझाया है । हमारे ऋषियों ने अपनी गहन साधना और तप के उपरांत जिस अष्टांग योग अर्थात यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का चिंतन प्रस्तुत किया वह संसार में बेजोड़ है । हमारे ऋषि पूर्वजों ने हमें बताया कि मानव शरीर में कुल 8 ही चक्र होते हैं । इन आठों चक्रों का प्राणायाम से भी बड़ा गहरा संबंध है। सन्ध्या में महर्षि दयानंद ने प्राणायाम का निम्नलिखित मंत्र हमारे लिए स्थापित किया है :-
ओं भू: । ओं भुवः। ओं स्व :। ओं मह:। ओं जन:। ओं तप:। ओं सत्यम् ।
प्राणायाम की क्रिया करते जावें और प्राणायाम मन्त्र का जप भी करते जावें। कम से कम तीन और अधिक से अधिक 21 प्राणायाम करने का प्रावधान महर्षि दयानंद ने किया है। प्राणायाम के अभ्यास से हमारा आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ता जाता है ।

दह्यन्ते ध्यायमानानां धातूनां च यथा मला:
तथैन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषा: प्राणस्य निग्रहात ॥

यह मनुस्मृति ६ । ७१ का श्लोक है। इस श्लोक में भारतीय संस्कृति के महानतम व्यक्तित्व के धनी और सृष्टि पहले राजनीतिक संविधान के निर्माता महर्षि मनु प्राणायाम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं:- जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धतुओं का मल नष्ट होकर वे पूर्णतया निर्मल निर्विकार और शुद्ध होते हैं वैसे प्राणायाम करके हमारे  मन,बुध्दि आदि इंद्रियों के दोष क्षीण होकर वे निर्मल हो जाती हैं।
इंद्रियों की निर्मलता से आत्मा में ज्ञान का प्रकाश भासने लगता है।

अथर्ववेद का यह मंत्र है :-

अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या,
तस्यां हिरण्यमय: कोश स्वर्गोज्योतिषावृता।।

(अथर्व 10/2/32) वेद के इस मंत्र में बहुत ही सुंदर ढंग से अपनी बात को रखते हुए ऋषि कहता है कि “आठ चक्रों और नवद्वारों वाली यह मानवदेह एक ऐसी पुरी है जो कि ‘अवध’ है, अर्थात जिसमें मानसिक, वाचिक या कायिक किसी भी प्रकार की हिंसा नही होती है।”
मानव शरीर में विद्वानों ने यूँ तो सात चक्र ही प्रमुख रूप से माने हैं, परंतु हम वेद की भाषा में वर्णित किए गए 8 चक्रों का ही यहां पर वर्णन कर रहे हैं। 8 चक्रों की स्थिति इस प्रकार है :-

मूलाधार चक्र :
पहला चक्र मूलाधार चक्र है । जिसका निवास स्थान गुदा के निकट माना गया है ।इसमें उत्तेजना प्राप्त कर वीर्य स्थिर और अभ्यासी ऊर्ध्व रेत्ता बनता है अर्थात जीवनी शक्ति वीर्य इसकी साधना से ऊपर को मस्तिष्क की ओर चलता है । जिससे हमारे मस्तक पर अलौकिक तेज भासने लगता है। हमारे ऋषियों के मस्तक पर दिखने वाला अद्भुत अलौकिक तेज इसी की साधना के फलस्वरूप व्याप्त होता था। ऊर्ध्वरेता होने से मनुष्य वीर, पराक्रमी और साहसी बनता है । वीर्य जैसी अद्भुत जीवनी शक्ति का संचय हो और वह शरीर में व्यय होकर हमारे शरीर की पुष्टि का कारण बने, इसके लिए हमारे ऋषियों ने ब्रह्मचर्य की साधना पर विशेष बल दिया है। जिससे कि मनुष्य मुक्ति के मार्ग पर चल सके और उस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का सरलता से सामना कर सके। वीर्य शक्ति के संचय को हमारे ऋषियों ने हमारे जीवन का आधार माना है।

स्वाधिष्ठान चक्र :
यह चक्र मूलाधार चक्र से मात्र 3 सेंटीमीटर ( कुछ विद्वानों का कहना है कि चार अंगुल ऊपर ) ऊपर की ओर स्थित होता है। जब स्वाधिष्ठान चक्र में चेतना जागृत होती है तो मनुष्य के भीतर प्रेम और अहिंसा के भावों का जागरण होता है । यह सारा कार्य प्राणायाम के माध्यम से होता है । इससे शरीर को स्फूर्ति का अनुभव होता है और मनुष्य की थकावट दूर होती है। प्रेम और अहिंसा के भावों से मनुष्य के भीतर सात्विकता का प्राकट्य होता है और मनुष्य बहुत सहज ‘सरल रहकर आमोद – प्रमोद में जीवन व्यतीत करने में सक्षम होता है। स्वाधिष्ठान चक्र में योगी की चेतना के जागरण के फलस्वरूप भूख भी अच्छी लगने लगती है और नींद भी अच्छी आती है।

मणिपूरक चक्र :
तीसरा चक्र मणिपूरक है, जो मनुष्य की नाभि में स्थित होता है , इसके ऊर्जान्वित होने से शारीरिक और मानसिक दु:ख कम हो जाते हैं । मणिपूरक चक्र में चेतना के जागरण से मन स्थिर होने लगता है। जिससे मनुष्य के भीतर शांति के भावों का प्रकटन होता है। उसके जीवन में सर्वत्र एक अलग ही प्रकार का मधुरस बरसने लगता है। मन की स्थिरता से प्रत्याहार का अच्छा अभ्यास बन जाता है। इंद्रियां संसार के विषयों से हटकर ईश्वर के मधुरस ,सोमरस या अमृत रस का रसास्वादन करने लगती हैं और उसकी अभ्यासी हो जाती हैं। संसार के विषयों में भटकती हुई इंद्रियां अब आत्मस्थ हो जाती हैं और शांत रहकर हमारी आध्यात्मिक उन्नति का कारण बनने लगती हैं।
भीतर के सारे उपद्रव और उत्पात शांत होने से मनुष्य की कर्मशीलता में वृद्धि होती है ।

अनाहत चक्र :
चौथा चक्र अनाहत चक्र है । यह चक्र पेट के ऊपर हृदय के धड़कने के स्थान के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित रहता है । यह चक्र अपने आपमें बहुत अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका अधिकार भीतरी सभी अवयवों पर है। प्राणमय कोश इसी चक्र में रहता है। यह चक्र इतना अधिक संवेदनशील होता है कि इस पर चोट लगने से मनुष्य तत्काल मर जाता है।
पहलवान कुश्ती के समय इसी पर चोट मारकर प्रतिद्वंदी को बलहीन कर देता है ।मस्तिष्क प्राण के लिए इसी चक्र का आश्रय लेता है। इस चक्र के जागरण से हमारी चेतना सृजनशीलता को बल देती है। संसार के जितने भर भी सृजनशील प्रवृत्ति के लोग हैं, उन सबको इसी चक्र से ऊर्जा प्राप्त होती है।
इस चक्र की चेतना के जागरण से मनुष्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला बनता है और उस पर सरस्वती की कृपा होने लगती है। क्योंकि वह संसार के द्वन्द्वों से बाहर निकलने में बहुत अधिक सक्षम होने लगता है। ज्ञान विज्ञान के सारे कार्यों का सृजन यहीं पर होता है।

विशुद्धि चक्र :
पांचवा चक्र विशुद्धि चक्र होता है। गले में आवाज से कुछ ऊपर इस चक्र की स्थिति मानी जाती है। वैज्ञानिक सोच की ओर बढ़े मानव को इस चक्र में चेतना के जागरण होने से तार्किक शक्ति प्राप्त होती है और उसकी बौद्धिक शक्तियां उसका बहुत ही उत्तमता से मार्गदर्शन करने लगती हैं। प्राणायाम करते समय कुंभक काल को हम जितना अधिक खींचने का अभ्यास करते जाते हैं, उतना ही यह चक्र बलवती होने लगता है। तब हमारी चेतना हमारे उत्थान में अधिक से अधिक कल्याणकारी सिद्ध होने लगती है। प्राणशक्ति के बढ़ने से प्रत्येक चक्र ऊर्जावन्त और शक्तिमान हो उठता है। विशुद्धि चक्र में पहुंचकर योगी शारीरिक शक्ति का जागरण करने में सफल होता है।

ललना चक्र :
छठा चक्र ललना चक्र है । इस चक्र का स्थान जिह्वा के मूल में माना गया है । प्राणायाम के समय साधक की साधना जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे – वैसे ही उसकी चेतना क्रियाशील और बलवती होती जाती है जिससे उसका मानसिक, आत्मिक, बौद्धिक और शारीरिक सभी प्रकार का विकास होने लगता है। इन शक्तियों के सकारात्मक रूप से जागरण से मनुष्य का आध्यात्मिक जागरण होता है । वह संसार से विरक्ति का अनुभव कर संसार के सिरजनहार अर्थात परमपिता परमेश्वर से संबंध जोड़ने में अपना भला समझने लगता है। धीरे-धीरे उसे संसार की नश्वरता समझ आ जाती है और उसके जीवन का उद्देश्य क्या है ? – इसे भी वह भली प्रकार समझने लगता है ।

आज्ञा चक्र :
सातवां चक्र आज्ञा चक्र है । यह चक्र हमारी दोनों भौहों के मध्य में स्थित होना माना गया है । जब कोई साधक इस सातवें चक्र में प्रवेश करता है अर्थात इसकी साधना में लीन होता है तो वह धीरे-धीरे बाहरी विषयों से अपने आपको हटाने में सफल हो जाता है अर्थात उसे ध्यान की अवस्था प्राप्त होने लगती है। संसार के सारे बंधन शिथिल पड़ते अनुभव होते हैं, और उसे आत्मानंद की अनुभूति बार-बार होने लगती है। बाहरी विषयों से संपर्क टूटने से आंतरिक जगत में आनंद भरने लगता है और साधक उस आनंद में अपने आपको बांधे रखने में सफल होने लगता है।
इससे तारुण्य और उत्साह प्राप्त होता है । इससे शरीर पर प्रभुत्व नाड़ी और नसों में स्वाधीनता आती है। सुख-दुख , हानि लाभ , जीवन मरण , यश – अपयश के द्वंद्वों का अब मनुष्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।

सहस्रार चक्र :
आठवां चक्र सहस्रार चक्र होता है। इसका स्थान मस्तिष्क में माना जाता है। कई योगियों ने इसका स्थान सिर के सबसे ऊपर के भाग में होना बताया है। इसलिए इस चक्र को ब्रह्मरंध्र भी कहा गया है । इस चक्र की अवस्था में पहुंचा साधक वास्तविक आत्मानंद को प्राप्त कर लेता है। अब वह अपने आपको संसार से पूर्णतया विरक्त कर चुका होता है। साधना की जिस ऊंचाई में वह इस समय होता है वह उसे संसार के साधारण लोगों से अलग असाधारण प्रतिभा और शक्ति का प्रतीक बना देती है। वह सौंदर्य की प्रतिमूर्ति बन जाता है। ऐसे लोगों के दर्शन मात्र से भी साधारण लोगों को शांति का अनुभव होता है।
ऐसी स्थिति को प्राप्त करके ही मनुष्य बड़े आत्मविश्वास से यह कह उठता है कि :-

भिद्यते हृदयग्रंथि: छिद्यन्ते सर्वसंशया:।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन दृष्टे परावरे।।
अर्थात जब महान परमात्मा की तेजोमय ज्योति का भान अपने हृदय में कर लिया या उसके दर्शन कर लिए या आत्मसाक्षात्कार कर लिया तो हृदय की गांठ अर्थात हृदय के सब बंधन और बंधनों का हेतु अर्थात वासना खुल जाती है, मिट जाती है, दूर हो जाती है । तब समस्त संशय भी नष्ट हो जाते हैं और इस समय समस्त कर्म दोष भी क्षीण हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति निश्चय ही ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म बन जाता है और उसके कुल में धर्म को न जाने वाला कोई नहीं रहता, वह सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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