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किसान वर्ग ही अर्थव्यवस्था को दे सकता है सहारा : सरकार को दिखानी होगी किसान के प्रति पूरी हमदर्दी

 

गाजियाबाद। ( ब्यूरो डेस्क ) अब जबकि गाँव गांव, गली गली और खेतोखेत खरीफ फसल बुआई की तैयारी हो रही है और देश में लाकडाऊन का दौर ढलान पर है तब सभी को खरीफ कृषि के संदर्भ यह कहावत स्मरण कर लेना चाहिए –
असाड़ साउन करी गमतरी, कातिक खाये, मालपुआ। मांय बहिनियां पूछन लागे, कातिक कित्ता हुआ॥


अर्थात  –  आषाढ़ और सावन मास में जो गाँव-गाँव में घूमते रहे तथा कार्तिक में मालपुआ खाते रहे (मौज उड़ाते रहे) वे लोग पूछते हैं कि कार्तिक की फसल में कितना अनाज पैदा हुआ। अर्थात् जो खेती में व्यक्तिगत रुचि नहीं लेते हैं उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता है। भारत सरकार एवं भारत भर की प्रदेश सरकारों को भी चाहिए कि वह लॉकडाऊन के इस दौर में भारतीय कृषि के कार्तिक तत्व अर्थात खरीफ उत्पादन हेतु पर्याप्त व्यवस्थाएं करके किसानों को सहयोग दे.
सर्वविदित है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ साथ भारतीय जनमानस भी कृषिनिर्भर ही रहता है. यदि कृषि सफल, सुचारू व सार्थक हो रही है तो भारतीय ग्राम प्रसन्न रहते हैं अन्यथा अवसादग्रस्त हो जाते हैं और यह अवसाद समूचे राष्ट्र को दुष्प्रभावित करता है. यदि भारतीय कृषि को छोटे व निर्धन कृषकों की दृष्टि से देखें तो खरीफ की फसल ही भारत की महत्वपूर्ण फसल है क्योंकि इस मौसम में सिंचाई के साधनों की अनुपलब्धता वाले छोटे छोटे करोड़ों कृषक भी फसल उपजाने में सफल हो पाते हैं.
लगभग राष्ट्रव्यापी लॉकडाऊन के इस  कालखंड में जबकि जून के प्रथम सप्ताह से देश भर में अनलॉकका क्रम प्रारंभ हो रहा है तब बहुत कुछ ऐसा है जिसे खरीफ की फसल व् छोटे, माध्यम व सीमान्त किसानों की दृष्टि से समायोजित किया जाना चाहिए. छोटा किसान दूध, सब्जी, पशुपालन आदि आदि छोटी कृषि आधारित इकाइयों से प्राप्त आय से जीवन यापन भी करता है व खरीफ फसल को बोने बिरोने के खर्चे भी निकालता है. स्वाभाविक है कि दो माह के लाकडाऊन के मध्य ये छोटे कृषक अत्यधिक प्रभावित हुए हैं व उनके पास न तो परिवार के भरण पोषण हेतु समुचित नगदी है और न ही उसकी जीवन रेखा खरीफ फसल को बोने बखरने हेतु नगदी है. यद्दपि मोदी सरकार ने निर्धन परिवारों को निःशुल्क राशन, आयुष योजना व अन्य माध्यमों से सुरक्षित रखने की अनेक योजनाओं की झड़ी लगा दी है तथापि निर्धन, छोटे व सीमान्त किसानों का एक बड़ा वर्ग अब भी संकट में है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. निस्संदेह कोविड 19 ने जब समूचे अर्थतंत्र को दुष्प्रभावित कर दिया है तब किसान भी इससे अछूता नहीं रहा है बल्कि कृषक वर्ग तो इकोनामिक बैकअप न होने के कारण बेहद असहाय, निर्बल व लाचार हो गया है. देश की केंद्र व प्रदेश सरकारों ने यदि कृषि तंत्र को महंगाई,बेरोजगारी व लॉकडाऊन के इस भीषण दौर में अपना सहारा नहीं दिया तो केवल कृषक समाज नहीं अपितु समूचे देश को इसके दुष्परिणाम भुगतने होंगे.
पिछले वर्ष जब कोरोना महामारी ने भारत में पाँव पसारें थे तब संपूर्ण भारत का उत्पादन तंत्र सिमट गया था व् बड़े ही निराशाजनक परिणाम मिले थे किंतु कृषि एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जिसने जीवटता पुर्वक आशाओं से कहीं बहुत अच्छा उत्पादन करके देश की आर्थिक व्यवस्था को संबल प्रदान किया था.
बारिश अच्छी, समय पर  व पर्याप्त होने की संभावनाओं के आ जाने के बाद स्वाभाविक ही है कि किसान खरीफ फसल बोने हेतु अत्यधिक उत्सुक व उत्साहित है. किंतु संकट भी है कि इस वर्ष बीज बहुत महँगा रहने की संभावना है. खरीफ की प्रमुख फसल धान, सोयाबीन  व मक्का के बीज मूल्य तो किसान की पहुँच से बाहर होते जा रहे हैं. देशव्यापी लाकडाऊन के कारण उर्वरकों का उत्पादन व विपणन तंत्र गड़बड़ा गया है अतः उर्वरकों के मूल्य भी बढ़ रहे हैं. अन्तराष्ट्रीय मूल्य तंत्र के कारणों से भी मोदी सरकार उर्वरकों के मूल्य तंत्र को संभालने में असफल रही किंतु आभार है इस संवेदनशील सरकार का कि उसने उर्वरकों पर सरकारी सहायता (सब्सिडी) बढ़ाकर उर्वरकों की मूल्यवृद्धि को निष्प्रभावी कर दिया है. केंद्र सरकार ने डीएपी खाद पर सब्सिडी 140 प्रतिशत बढ़ा दी है, इस हेतु 1475 करोड़ रूपये की अतिरिक्त सबसिडी जारी कर देश भर के कृषकों को एक बड़ी समस्या से बचा लिया है. निस्संदेह यदि केंद्र की संवेदनशील मोदी सरकार समय पर डीएपी के संदर्भ में यह सटीक निर्णय नहीं लेती तो देश में बुआई का रकबा और खरीफ उपज अवश्य ही प्रभावित हो जाती. प्रधानमंत्री मोदी जी ने किसान सम्मान निधि की आठवीं किश्त के रूप में अक्षय तृतीया के शुभ दिन को 19 हज़ार करोड़ रुपए 10 करोड़ किसानों के खाते सीधे ट्रांसफर करके भी एक बड़ा आर्थिक संबल का वातावरण बना दिया है. महामारी के कठिन समय में ये राशि इन किसान परिवारों के बहुत काम आ रही है. इस योजना से अब तक 1 लाख 35 हज़ार करोड़ रुपए कृषकों के खाते में सीधे पहुंच चुके हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इस राशि में से सिर्फ कोरोना काल में ही 60 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक किसानों को मिल गए हैं. मोदी सरकार ने कोरोना काल को देखते हुए, KCC ऋण के भुगतान या फिर नवीनीकरण की समय सीमा को बढ़ा दिया गया है. ऐसे सभी किसान जिनका ऋण बकाया है, वो अब 30 जून तक ऋण का नवीनीकरण कर सकते हैं. इस बढ़ी हुई अवधि में भी किसानों को 4 प्रतिशत ब्याज पर जो ऋण मिलता है, जो लाभ मिलता है, वह यथावत रहेगा.
भारत की केंद्र सरकार द्वारा किये जा रहे सतत  कृषि उन्नयन के प्रयासों का ही परिणाम है कि इतनी विपरीत परिस्थितियों के बाद भी गत वर्ष की अपेक्षा खरीफ का रकबा 16.4% बढ़ने की संभावना बताई जा रही है. कृषि मंत्रालय ने आशा जताई है कि “पिछले साल अच्छी बारिश होने की वजह से इस बार जमीन में नमी मौजूद है और यह फसलों के लिए बहुत बेहतर स्थिति है. पिछले 10 साल के औसत की तुलना में इस बार देश के जलाशय 21 प्रतिशत तक अधिक भरे हुए हैं. हमें उम्मीद है कि इस बार देश में बंपर कृषि उपज हो सकती है. गतवर्ष की अच्छी वर्षा, जलस्त्रोतों में जल की उपलब्धि व भूमि में उपलब्ध नमी का लाभ उठाने हेतु शासन कृषि क्षेत्र को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराये ईटीओ किसान भी देश के गोदामों को अनाज से लबालब भरने में सक्षम हो सकता है.
ग्‍लोबल रेटिंग एजेंसी फिच सॉल्यूशंस ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नए संकट आने के संकेत दिए हैं.  इसका असर आर्थिक विकास दर पर पड़ेगा और वित्‍त वर्ष 2021-22 में भारत का वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद  9.5% हो सकता है. ऐसी स्थिति में निश्चित ही जीवटता व जिजीविषा से लबालब किसान वर्ग ही भारतीय अर्थव्यवस्था को अपने उत्पादन से एक बड़ा संबल प्रदान कर सकता है. आवश्यकता है कि भारत का शासन प्रशासन भारतीय कृषक के प्रति संवेदनशील रहे।

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