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खान मार्केट गैंग अर्थात अर्बन नक्सल

खान मार्केट गैंग / अर्बन नक्सल


स्वतंत्र भारत में पीढ़ियों से एक विशेषाधिकारी वर्ग केंद्रीय सत्ता का दरबारी, सहयोगी और चहेता रहा है। उसी को कभी लुटियन तो कभी खान-मार्केट ‘गिरोह’ कहा जता है। सोशल मीडिया में उन्हें और भी नाम दिए जाते हैं। इसी वर्ग की प्रतिनिधि शोभा डे और तवलीन सिंह ने चुनाव नतीजों के बाद कई महत्वपूर्ण बातें स्वीकार की हैं। उन्होंने माना कि अब ‘इंडिया’ वाला राज्यतंत्र अंतिम रूप से ‘हिंदुस्तान’ के हाथों में जा चुका है। इसका आरंभ मई 2014 में हुआ और मई 2019 में मुकम्मल हो गया। विशेषाधिकारी अंग्रेजी-भाषी, अहंकारी बौद्धिक-राजनीतिक वर्ग की खानदानी सत्ता सदा के लिए चली गई। उसका स्थान साधारण पृष्ठभूमि वाले, भारतीय भाषा-भाषी और आम जन-गण से जुड़े लोगों ने ले लिया है। इस विस्थापन में नेता, बुद्धिजीवी और पत्रकार सभी शामिल हैं।

तवलीन सिंह जोर देकर कहती हैं कि यह उनका प्रत्यक्ष आजीवन अनुभव है कि इस सुविधाभोगी विशेषाधिकारी वर्ग का हर चीज पर संपूर्ण नियंत्रण था, “हम राजनीति, सरकार, व्यापार, विदेश नीति, पुलिस, सेना और मीडिया सब कुछ पर नियंत्रण करते थे। यह इसलिए संभव हुआ कि जबसे अंग्रेज गए तभी से कमोबेश हम सब नेहरू-गांधी परिवार के दरबारी थे। हम जानते थे कि उनका सोशलिज्म और सेक्युलरिज्म उतना ही झूठा था जितना उनका आइडिया ऑफ इंडिया।” तमाम बड़े पदों और मीडिया में केवल अंग्रेजी-प्रवीण लोग आगे बढ़ाए जाते थे। अंग्रेजी कोई भाषा नहीं, बल्कि एक विशेषाधिकारी वर्ग की परिभाषा थी। संसद में भी भारतीय-भाषी किसी तरह बर्दाश्त किए जाते थे और वह भी नाक-भौं सिकोड़ते हुए, मानो वे किसी प्राइवेट क्लब में अनुचित घुस गए हों। इसी वर्ग ने कांग्रेस नेतृत्व को भी खानदानी बनाने का विचार दिया। यह स्वीकारोक्ति स्वतंत्र भारत की बौद्धिकता का सबसे केंद्रीय सत्य है।

दशकों से हमारे बड़े-बड़े बौद्धिक सुख-सुविधा एवं विशेषाधिकारों के लोभ में जानबूझ कर झूठी बातें और नारे फैलाते रहे। इसे पहले भी राज थापर, अरुण शौरी, सीताराम गोयल जैसे सत्यनिष्ठ लेखकों ने रेखांकित किया, मगर उनकी बातें दबाई जाती रहीं, पर अब हिंदुस्तान से अंग्रेजी-भाषी, विशेषाधिकारी, मतवादी बौद्धिकता का प्रभाव लुप्त हो रहा है। वर्तमान जनादेश इसका भी संकेत है। वस्तुत: यह एक लंबी प्रक्रिया की परिणति है जिसमें हमारे प्रभावी बुद्धिजीवियों की विश्वसनीयता गिरती चली गई। अयोध्या आंदोलन के बाद से ही बार-बार दिखने लगा कि कई बड़ी राष्ट्रीय समस्याओं, घटनाओं पर नामी संपादकों, लेखकों, प्रोफेसरों, स्टार एंकरों द्वारा भर्त्सना या अनुशंसा के बावजूद जन-साधारण पर उसका प्रभाव नहीं पड़ रहा था।

इस चुनाव ने यह अंतिम रूप से तब स्थापित कर दिया जब तमाम नामी लोगों की आशाएं धूल-धूसरित हो गईं। उन्होंने मई 2014 को दुर्घटना भर समझा था और तबसे अपना रुतबा घटने को अपवाद व्यवधान मानकर इंतजार कर रहे थे। दशकों से सत्ताधारियों तक उन की सीधी पहुंच रहती थी।

वस्तुत: 2014 के बाद सबसे बड़ा नुकसान लिबरल बौद्धिकों का ही हुआ। इसीलिए वे लगातार मोदी सरकार पर संकीर्ण टिप्पणियां करते रहे। उनकी बातें उन अखबारों और टीवी चैनलों पर ही आती थीं जिनसे आम लोग अधिकाधिक दूर होते गए हैं। आम चुनाव में उन्होंने अनधिकारी भाजपा को हटाकर पारंपरिक, खानदानी, नामदारों के फिर काबिज होने की कल्पना कर रखी थी। मोदी को हिंदुत्व के भोंड़े नेता, सर्वसत्तावादी, संस्थाओं को खत्म करने वाला आदि चित्रित करके वे आश्वस्त थे कि उन्हें हरा दिया जाएगा। मोदी की तुलना में राहुल गांधी को भला और उपयुक्त दावेदार दिखाने का प्रयास हुआ।

अंग्रेजी मीडिया में भले ही राहुल और प्रियंका को विशेष प्रचार मिला हो, पर समाज में एक गंभीर परिवर्तन चल रहा था। अंग्रेजी-भाषी नामी बौद्धिकों, पत्रकारों को पीछे छोड़ते हुए देसी भाषा-भाषी लोगों का प्रभाव बढ़ रहा था। शोभा डे लिखती हैं, “गत पांच साल हम वास्तविकता झुठलाते रहे। अपने अहंकार में सोचते रहे कि यह बीत जाएगा, मगर यह क्या चीज है जिसके बीत जाने की हमने आशा की थी? इसका कोई उत्तर नहीं मिलता।”

विशिष्ट बौद्धिक वर्ग से परे एक भरा-पूरा विशाल हिंदुस्तान है जो अपने अनुभव से कुछ और सबक निकाल रहा है। उसे मोदी की बातें, उनके काम गलत नहीं लगे। इसलिए उसने अपना मत देकर उस जगह को भर दिया, जिसे विशिष्ट वर्ग अपनी बपौती समझता रहा था।

एक असाधारण परिवर्तन हुआ है। वंशवादी सत्ताधारियों समेत पारंपरिक सुविधाभोगी, विशेषाधिकारी बौद्धिक वर्ग इतिहास की चीज बन रहे हैं। ये बौद्धिक वही लोग थे जिन्होंने इंदिरा द्वारा तमाम संवैधानिक संस्थाओं को चौपट करते जाने की कभी आलोचना नहीं की। सुप्रीम कोर्ट जजों को भी सत्ताधारी नेता के प्रति जबावदेह बनाने की कोशिश का उन्होंने विरोध नहीं किया। दरअसल उनके ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ में मुख्यत: अपने विशेषाधिकारों की ही चिंता थी। किसी योग्यता, न्याय और जनगण के अधिकारों का उसमें कोई विशेष ध्यान नहीं था। अब उन्हें लग रहा है कि वे पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं।

चुनाव परिणामों से उन्हें किसी प्रियजन की मृत्यु सा शोक हो रहा है। अभी भी उन घिसे-पिटे सेक्युलर, वामपंथी मुहावरों में लकीर पीट रहे हैैं, जो सच ढकने और झूठ सजाने के काम आते थे। उदाहरण के लिए प्रतापभानु मेहता आज देश को ‘घोर संकट-ग्रस्त’ मान रहे हैं, जहां अल्पसंख्यकों को अपदस्थ करके स्थायी रूप से ‘मेजोरिटेरियन’ राज्य बनाया जा रहा है। यह चुनाव ‘भय और घृणा की राजनीति’ की जीत है। धार्मिक समेत देश की सारी संस्थाएं एक ही व्यक्ति के गिर्द संकेंद्रित हो गई हैं। यद्यपि उन्होंने यह भी माना कि समाज में चुपचाप कोई गहरी उथल-पुथल हो रही है, जो चुनावी राजनीति से परे है।

देश में प्रचलित राजनीतिक मुहावरे बदल रहे हैं। विचार-विमर्श में ‘लिबरल’, ‘सेक्युलर’ आदि बुरे शब्दों में बदल गए हैैं, जिनका प्रयोग अब नहीं हो रहा। विरोधी दल भी अपने को लिबरल, सेक्युलर कहलाना नहीं चाहते। इन शब्दों का प्रयोग छोड़ देना मेहता और उनके जैसे अन्य लोगों के लिए मानो बेईमानी है, ‘जिन्हें फिर से प्रचलित कराने में लंबी बौद्धिक मेहनत करनी पड़ेगी।’ मेहता सरीखे लोग भूलते हैं कि उन विदेशी मुहावरों का देश की जमीनी सच्चाइयों से कभी संबंध नहीं रहा। मुख्यत: अंग्रेजी भाषा के अबूझ टोने-टोटके और सत्ता बल से उन्हें जैसे-तैसे विश्वसनीय बनाए रखा गया था। अब जब “इंडिया” के बदले “हिंदुस्तान” अपनी जगह ले रहा है तब वे मुहावरे और बेकार हो चुके हैं।

अच्छी बात यह है कि जाने-माने बड़े बौद्धिकों में से कुछ अपने पुराने, बने-बनाए विश्वासों, नारों पर पुनर्विचार कर रहे हैैं। क्या वे अपने ही नारों से भ्रमित हो गए थे या सत्ता-सुविधा की आदत ने उन्हें मानसिक रूप से बेईमान बना दिया था? इसका उत्तर जो भी मिले, इससे जुड़े सभी प्रश्नों का खुलकर सामना करना आज की जरूरत है। तभी न केवल हमारी राजनीति, बल्कि शिक्षा को भी मतवादी कैद से मुक्त कर भारतीय बौद्धिकता को स्वतंत्र और मौलिक बनाने की दिशा में बढ़ा जा सकता है।

  • डॉ. शंकर शरण (२८ मई २०१९)

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