भारतीय किसान आंदोलनों के दो बड़े नायकों को दी गई वर्चुअल श्रद्धांजलि

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बिजोलिया किसान आंदोलन जोकि भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम सफल सत्याग्रह के रूप में जाना जाता है। इस किसान आंदोलन के प्रणेता विजय सिंह पथिक एवं भारतीय किसान आंदोलन से लेकर मुख्यमंत्री व उपप्रधानमंत्री तक का सफर तय कर आजीवन गाँव, ग़रीब, किसान और मजदूर के हितों के लिए संघर्ष करने वाले चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि पर एक वेबीनार का आयोजन किया गया।

शनिवार दिनांक 29 मई 2021 की प्रातः 11 बजे से लेकर दोपहर 3 बजे तक चले इस वेबीनार में भारतीय किसान आंदोलनों के इन दो बड़े नायकों को वर्चुअल श्रद्धांजलि दी गई। यंग सोशल साइंटिस्ट असोसिएशन एवं पथिक शोध संस्थान के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस राष्ट्रीय वेबीनार में देश के लगभग 6 राज्यों से श्रोताओं एवं वक्ताओं ने भाग लिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता मुजफ्फरनगर से वरिष्ठ समाजशास्त्री डा. कलम सिंह ने की वहीं मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान राज्य अभिलेखागार के निदेशक डा. महेंद्र खगड़ावत रहें। वेबीनार के मुख्यवक्ताओं में जयपुर से वरिष्ठ लेखक, पत्रकार एवं पथिक जी अध्येता डा. विष्णु पंकज तथा पथिक सेना संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष महावीर पोसवाल के साथ विजय सिंह पथिक शोध संस्थान के चेयरमैन राजकुमार भाटी और युवा समाजशास्त्री डा. राकेश राणा उपस्थित रहें।

कार्यक्रम की शुरुआत डा. तनवी भाटी के द्वारा की गई उन्होंने भारत के इन दो महान विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए
उनकी गौरवगाथा का वर्णन किया साथ ही सभी वक्ताओं का परिचय देते हुए श्रोताओं को वेबीनार के विषय से परिचित कराया और सभी का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन युवा पर्यावरणविद डा. देवेंद्र नागर एवं स्वतंत्र पत्रकार लोहित बैंसला ने किया जहाँ सर्वप्रथम वक्ता के रूप में श्री राजकुमार भाटी ने उद्बोधन प्रस्तुत किया।

गूगल मीट के माध्यम से देश के दो महान किसान नेताओं को वर्चुअल श्रद्धांजलि देने जुटे लोगों को संबोधित करते हुए श्री भाटी ने कहा ‘पथिक जी ने जो सपना देखा था उसे चौधरी चरण सिंह जी ने आगे बढ़ाया। पथिक एवं चौधरी साहब के जीवन एवं नेतृत्व की समानताओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इन दोनों महापुरुषों के विचार गाँव, गरीब, मजदूर एवं किसानों के शोषण के विरुद्ध थे। वहीं साहित्यक दृष्टि देखें तो पथिक जी ने 6 बड़े अखबारों का सम्पादन किया और 32 किताबें भी लिखी। 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस अधिवेशन में जो गीत गाया गया ” प्राण मित्रों भले गवाना, झण्डा ये तिरंगा कभी न झुकाना ” इस गीत के रचेता भी विजय सिंह पथिक ही थे। इस प्रकार के सैकड़ो गीत, कविता, आज़ादी के नारे पथिक जी ने लिखे।

चौधरी साहब पर बोलते हुए उन्होंने कहा वे क़ानून से स्नातक थे और आर्थिक मामलों में उनकी गहरी पकड़ थी। राम मनोहर लोहिया की तरह वे जो आंकड़े प्रस्तुत करते थे तथ्यों के साथ अपनी बात रखते थे जिसके चलते उन्होंने सदन में सरकारी आकड़ो को झूठा साबित कर दिया था जिसमें प्रति व्यक्ति आय 16 आना दिखाई गई जबकि उन्होंने इसे 4 आने साबित किया था। वहीं जमींदारी उन्मूलन प्रस्ताव को लाने में चौधरी साहब का बड़ा योगदान है। दोनों महान नेताओं ने किसानों के लिए जो कार्य किए उन्हें जाती वर्गों में नहीं बांटा जा सकता है।’ अंत में दोनों नेताओं को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने अपनी बात पूरी की।

कार्यक्रम में अगले वक्ता के रूप में बोलते हुए डा. महेन्द्र सिंह खगड़ावत ने कहा ‘यदि हम पथिक जी को नहीं पढ़ेंगे तो आज़ादी के आंदोलन का बड़ा हिस्सा छूट जाएगा। पथिक जी का आज़ादी की लड़ाई मे बड़ा योगदान है, उनकी उस वक़्त के गरम और नरम दोनों दलों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देश के बड़े स्वतंत्रता सेनानी उनसे सलाह और प्रेरणा लेते थे। महात्मां गाँधी जी के साथ उनके पत्राचार का वर्णन करते हुए कहा कि गाँधी जी भी आज़ादी के आंदोलन में उनके प्रति जवाबदेह थे। आज हिंदुस्तान के हर आदमी का पथिक जी पर समान अधिकार है उन्हें किसी जात या धर्म तक सीमित नहीं रखा जा सकता है। वहीं चौधरी साहब ने शिक्षा और स्वास्थ्य का ढांचा गाँव देहात में स्थापित करने की बात कहीं थी जिसकी कमी को बखूबी आज कोरोना काल में देखा गया है।

कार्यक्रम में अगले वक्ता के रूप में डा. विष्णु पंकज ने अपना अनुभव श्रोताओं के सम्मुख रखा। 85 वर्ष की आयु पार कर चुके डा. पंकज ने पथिक जी के समकालीन पत्रकार, आंदोलनकारी एवं नेताओं से रूबरू हुए। उनकी जुबानी पथिक जी के संघर्ष की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली रही जिसे उन्होंने अपनी किताबों में लिखा। वहीं उनके द्वारा साल 1965 में पथिक वाचनालय की स्थापना और पथिक जी के स्मृति ग्रंथों का प्रकाशन में आई परेशानियों का जिक्र किसी को भी भावुक कर देने वाला था।

उन्होंने कहा ‘कई भाषाओं के लेखक, कवि, पत्रकार, शिक्षक, किसान नेता, महान स्वतंत्रता सेनानी जैसी इतने गुण एक ही व्यक्तित्व में कम ही मिलते हैं। भारत के प्रथम सफल सत्याग्रह का श्रेय किसी को जाता है तो वे विजय सिंह पथिक हैं। एक बार गाँधी जी ने पथिक जी का जिक्र करते हुए कहा था ” पथिक जी के बारे में क्या कहूं उनसे मुझे प्रेरणा मिलती है। उन्होंने वह कर दिखाया जो मैं आज तक नहीं कर पाया हूँ ” पथिक जी की कार्यशैली, नेतृत्व और सीमित संसाधनों में भी कैसे लक्ष्य की प्राप्ति की जाये यह आजकल संगठन चलाने वालों को उनसे सीख लेनी चाहिए।’ अंत में दोनों महान आत्माओं को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने अपनी बात पूरी की।

बेबीनार में अगला उद्बोधन महावीर पोसवाल ने रखा जिसमें उन्होंने पथिक जी की 4 पीढ़ियों का वर्णन करते हुए आज़ादी के आंदोलन में उनके परिवार के बच्चे, औरतें और युवा किस तरह अपनी जिंदगी खफा गए सभी का बड़ा ही मार्मिक विवरण किया। श्री पोसवाल ने बंगाल में क्रांतिकारी संगठन से जुड़ने और उनके अध्ययन से लेकर दिल्ली के कनाट पैलेस पर बम फोडने तथा लाहौर में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु से मिलने तथा उनके मार्गदर्शन और उन्हें हथियार देने और जलियावाला बाग़ हत्याकांड का बदला लेने में संगठन की तरफ से सौंपे गए कार्य को किस तरह अंजाम दिया आदि का वर्णन किया।

इसके अलावा राजस्थान में भूमिगत कार्य करना जिसमें दिन में अध्यापक के रुप में बच्चों को शिक्षा देना वहीं रात्रिकालीन सभाओं की उन्होंने शुरुआत की जिसमें जो लोग क्रूर अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बोल भी नहीं सकते थे उन्होंने उन्हें 82 प्रकार के करों से मुक्ति दिलाने के लिए ठिकाने और अंग्रेजी सरकार के खिलाफ अहिंसक आंदोलन करने के लिए मजबूत किया और बिजोलिया में अंग्रेजी सरकार को किसानों के सामने घुटने टेकने पड़े। वहीं 1919 में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना भी उनके द्वारा की गई जिसका संचालन कार्य डा. हेगड़ेवार ने पथिक जी के निर्देशन में किया 1922 में पथिक जी पर मेवाड रियासत में मुकदमा चला जिसके बाद उन्होंने जज के सामने अपने मुकदमे की पैरवी खुद करी और उनकी लेखन कला के आगे जज को उन्हें बरी करने पर मजबूर होना पड़ा बाद में उनपर देशद्रोह का मुकदमा चला जहाँ उन्हें 5 साल की सजा हुए इसके बाद 1925 में डा. हेगड़ेवार ने राजस्थान सेवा संघ से प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। कार्यक्रम में चर्चा को रोचक बनाते हुए वाराणसी के जाने माने महाविधालय के मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ ओ. पी. चौधरी ने पथिक पीठ की स्थापना का सुझाव दिया और शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा पथिक जी विचारों को बनाने के लिए मिलकर प्रयास करने पर जोर दिया।

कार्यक्रम में अध्यक्षीय भाषण से पहले डा. राकेश राणा ने अपना वक्तव्य रखा जिसमें उन्होंने कहा ‘ आज तक सदन में जितने भी किसान हितेषी बिल पास हुए उनका सर्वाधिक श्रेय चौधरी चरण सिंह जी को जाता है। उनके शासन काल में जितने किसानों के हित में बिल आये आज तक कोई प्रधानमंत्री नहीं ला सका और जब तक किसान, गरीब और मजदूरों के बच्चे नीति-निर्माताओं के साथ भागीदारी नहीं करेंगे आगे यह संभव भी नहीं है। चौधरी साहब के विचारों को आज आगे बढ़ाने की जरूरत है। समकालीन राजनीतिक परिवेश में अजगर से आगे बढ़कर तमाम किसान और मजदूर वर्ग को लामबंध करके कोई काम होता नहीं हुआ। दुर्भाग्यवश चौधरी साहब के विचारों का दोहन किसान नेताओं ने केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया। वर्तमान समय में उनके विचारों को अजगर से आगे किस प्रकार तमाम किसान जातियों को एक साथ में लेकर आगे बढ़ा जाये यह विमर्श और काम को आगे बढ़ाने की जरूरत है।’

अपने अध्यक्षीय भाषण को शुरुआत में डा. कलम सिंह ने कार्यक्रम के सभी आयोजकों का आभार व्यक्त किया और जमींदारी प्रथा के साथ अपने निजी अनुभव साझा किए। डा. सिंह ने दोनों किसान नेताओं को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि ‘इन दोनों महानआत्माओं ने अंतरजातीय विवाह किए, कभी अपने को एक जाती से जोड़कर नहीं देखा, हमेशा किसान मजदूर वर्ग के लोगों की लड़ाई लड़ी तो हमें भी उन्हें किसी एक जात से नहीं जोड़कर देखना चाहिए।’ वर्तमान परिदृश्य में किसानों की दुर्दशा पर चिंतन करते हुए उन्होंने कहा ‘आज 56% किसान 14% जीडीपी पर गुजारा कर रहा है। किसानों की खरीदारी की शक्ति ना के बराबर है। जब उपभोक्ता नहीं बढ़ेगा तो उत्पादन नहीं बढ़ेगा और जब उत्पादन नहीं बढ़ेगा तो रोजगार और अर्थव्यवस्था कुछ नहीं बढ़ सकता है। इसके लिए किसानों को उनकी फ़सल का न्यायकारी मूल्य मिलना चाहिए ताकि उसकी खरीदारी शक्ति बढ़े। सरकार को इस बीच ईमानदार बिचौलिये की भूमिका निभानी चाहिए। आज जो लड़ाई किसान अपने हकों को लेकर लड़ रहें है यह लड़ाई स्वतंत्रता संग्राम से भी पुरानी है। किसानों के फ़सल मूल्य की पराधीनता जब तक दूर नहीं हो सकती हैं तब तक किसान नेता पथिकत्व और चरणसिहत्व का अनुसरण नहीं करेंगे। हमें ऐसे नेतृत्व का साथ देना चाहिए जिसमें पथिकत्व और चरणसिहत्व हो तभी किसानों की आवाज़ सुनी जा सकती है।’

कार्यक्रम के अंत में मंच संचालन कर रहें पत्रकार लोहित बैंसला ने सभी श्रोताओं एवं वक्ताओं का धन्यवाद किया साथ उन्होंने कहा आज पथिक जी जैसे महानायक जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में अपनी महत्पूर्ण भूमिका निभाई उन्हें उनका सम्मान जो केंद्र व राज्य सरकारों से मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पाया है जिसके वे हक़दार हैं। उनकी इस कदर अनदेखी की गई कि आज अधिकतम लोग उनके बारे में जानते तक नहीं, चौधरी चरण सिंह जी जैसे किसान नेताओं को हम इसलिए जान पाए हैं क्युकी हमने अपने स्कूल पाठ्यक्रम में उनको पढ़ा। आज हमें पथिक जी पर भी अपने राज्य सरकारों से स्कूल पाठ्यक्रम में कम से कम एक पाठ शामिल करवाना चाहिए ताकि उनके व्यक्तिगत से प्रेरणा लेकर भावी पीढ़ियां उन्हें अपने जीवन में चरितार्थ कर सकें। अंत में श्री बैंसला ने पथिक जी पर लिखी अपनी कविता सुनाकर सभी का आभार व्यक्त किया।

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