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उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा हाईकमान ‘अलर्ट’

अजय कुमार

योगी नहीं समझ पा रहे थे, लेकिन केन्द्र की आंखें नहीं बंद हैं। उसे पता है कि योगी के मंत्री कुछ नहीं कर रहे हैं। कोरोना महामारी के समय जब मंत्रियों को जनता के बीच होना चाहिए तब प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री तक 15 दिनों तक कहीं दिखाई नहीं दिए।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता के ग्राफ में तेजी आई गिरावट ने भारतीय जनता पार्टी आलाकमान के माथे की शिकन बढ़ा दी है, जो योगी अपनी कार्यशैली की वजह से देश के नंबर वन मुख्यमंत्री गिने जाने लगे थे। जिन्हें बीजेपी ने अपना ‘ब्रांड एम्बेसडर’ बना लिया था। किसी भी राज्य में चुनाव होते थे तो प्रचार के लिए मोदी-शाह के बाद योगी की सबसे अधिक डिमांड हुआ करती थी, यूपी में तो गुंडे-बदमाश योगी के नाम से कांपते ही नहीं थे प्रदेश छोड़कर भाग खड़े हुए थे। उन्हीं योगी से अब यदि अपना ही प्रदेश नहीं संभल रहा है तो बीजेपी के ‘थिंक टैंक’ का चिंतित होना लाजिमी ही है। कोरोना की दूसरी लहर जिस तरह से उत्तर प्रदेश में अनियंत्रित हुई उससे जनता का गुस्सा तो योगी सरकार के खिलाफ बढ़ा ही, कोरोना की पहली लहर को नियंत्रित करके योगी ने अपनी जो छवि चमकाई थी, वह भी तार-तार हो गई।

सबसे दुखद पहलू यह रहा कि जब कोरोना महामारी के चलते जनता त्राहिमाम कर रही थी तो योगी के कथित विश्वासपात्र नौकरशाह मुख्यमंत्री के सामने ‘सब कुछ ठीकठाक चल रहा है’ का झुनझुना बजा रहे थे। इस झुनझुने की ‘धुन’ पर योगी को कदमताल करते देखना किसी को भी अच्छा नहीं लगा। विपक्ष तो योगी सरकार पर हमलावर था ही जनता और पार्टी से जुड़े लोगों का भी सरकार के प्रति विश्वास डगमगाने लगा, लेकिन नौकरशाह मस्त थे। जब सड़कों पर ऑक्सीजन के लिए और अस्पतालों के बाहर एक अदद बैड के लिए तड़प-तड़प कर लोग दम तोड़ रहे थे, तब नौकरशाही सीएम को रिपोर्ट कर रही थी किं ऑक्सीजन की कहीं कमी नहीं है। अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में बिस्तर खाली हैं। सबको इलाज मिल रहा है। सरकार को बदनाम करने के लिए विपक्ष और कुछ मीडिया चैनल और अखबार वाले दुष्प्रचार कर रहे हैं। योगी कभी टीम-11 तो कभी टीम-09 की रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश का आकलन करने में लगे हैं, इसलिए उन्हें सब कुछ ठीकठाक ही लग रहा था। यहां तक की पंचायत चुनाव में ड्यूटी के दौरान करीब डेढ़ हजार शिक्षकों की मौत पर तो नौकरशाही ने ऐसी गुलाटी खाई की सैंकड़ों शिक्षकों की मौत का आंकड़ा उसने तीन शिक्षकों की मौत पर सिमटा दिया। फिर भी योगी को नौकरशाही की हकीकत नहीं समझ में आई।

खैर, योगी नहीं समझ पा रहे थे, लेकिन केन्द्र की आंखें नहीं बंद हैं। उसे पता है कि योगी के मंत्री कुछ नहीं कर रहे हैं। कोरोना महामारी के समय जब मंत्रियों को जनता के बीच होना चाहिए तब प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री तक 15 दिनों तक कहीं दिखाई नहीं दिए अन्य नेताओं की तो बात ही अलग है। उधर, योगी के नौकरशाही के अति झुकाव के कारण पार्टी के सांसद, विधायक, सभासद और अन्य नेताओं ने अपने आप को घरों में कैद कर लिया। नौकरशाही की वजह से ही गुजरात के पूर्व आईएएस और अब उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य अरविंद शर्मा को हाशिये पर डाल दिया गया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश की बेलगाम नौकरशाही पर लगाम लगाने के लिए ही अपने सबसे विश्वास पात्र और सफल नौकरशाह अरविंद शर्मा को यूपी लाए थे ताकि नौकरशाहों की लगाम कसी जा सके, लेकिन नौकरशाहों ने योगी को समझा दिया कि केन्द्र पूर्व आईएएस ‘पंडित’ अरविंद शर्मा के सहारे यूपी में समानांतर सत्ता चलाना चाहती है। बस बाबा योगी जी की ठकुराई जाग गई और वह अड़ गए। नतीजा यह हुआ कि अरविंद शर्मा जिनके आते ही उन्हें दिनेश शर्मा की जगह नया डिप्टी सीएम बनाए जाने की चर्चा चलने लगी थी, पार्टी और सरकार के बड़े-बड़े नेता शर्मा जी से आशाीर्वाद लेने पहुंच रहे थे, उन शर्मा जी को डिप्टी सीएम बनाना तो दूर अदनी-सी भी जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई, लेकिन शर्मा जी हार मान कर नहीं बैठ गए थे। वह लगातार पार्टी आलाकमान को रिपोर्ट कर रहे थे कि किस तरह से नौकरशाही के चक्कर में फंस कर योगी जी अपनी ही नहीं पार्टी का भी नुकसान कर रहे हैं। पूर्व नौकरशाह ने टीम मोदी को कुछ ऐसे ब्यूरोक्रेट्स के नाम भी बता दिए थे जो बीजेपी से अधिक समाजवादी पार्टी के प्रति वफादार रहे थे और आज भी सपा के प्रति उनका नरम रवैया रहता है, जिसके चलते पंचायत चुनाव मे बीजेपी को काफी नुकसान उठाना पड़ा, जिसका समाज और बीजेपी के वोटरों में बहुत गलत मैसेज गया।

योगी पर कोरोना महामारी की दूसरी लहर से निपटने की नाकामयाबी का दाग इतना गहरा हो गया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना महामारी के कारण त्राहिमाम कर रहे अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी की जनता का बचाने के लिए योगी की नौकरशाही से अधिक पूर्व आईएएस अरविंद शर्मा पर भरोसा जताया। शर्मा ने भी अपने मोदी को निराश नहीं किया। वाराणसी में कोरोना महामारी पर न केवल लगाम लगी, बल्कि मोदी ने कई बार इसके लिए पूर्व आइएएस अरविंद शर्मा की तारीफ भी की। यह बात भले ही यूपी की नौकरशाही को रास नहीं आई हो, लेकिन जो हालात नजर आ रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि केन्द्र ने योगी की टीम में अपने हिसाब से बड़ा बदलाव करने का मन बना लिया है। कुछ नौकरशाहों के पर कतरे जा सकते हैं तो कुछ मंत्रियों को भी अंदर बाहर किया जाना तय है। सबसे बड़ी गाज डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा पर गिर सकती है। दिनेश शर्मा को हटाने से जो नुकसान होगा, वह अरविंद शर्मा के मंत्रिमंडल में शामिल होने के पूरा हो सकता है। नौकरशाह से नेता बने अरविंद को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से गृह विभाग की जिम्मेदारी सौंपी जाती है तो यह तय माना जाएगा कि अरविंद के माध्यम से केन्द्रीय आलाकमान नौकरशाही को नियंत्रित करने की कोशिश करने जा रहा है जिस पर योगी का कोई खास नियंत्रण नहीं रह गया दिखता है। वैसे कहा यह भी जा रहा है कि पंचायत चुनाव में निराशाजनक नतीजे आने के बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह को भी हटाए जाने का मन बीजेपी आलाकमान ने बना लिया है। इसकी जगह प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य एक बार फिर केन्द्र की नई पसंद बन सकते हैं। प्रदेश अध्यक्ष रहते मौर्य का कामकाज भी अच्छा रहा था। उनके रहते बीजेपी ने कई चुनावों में शानदार जीत हासिल की थी।

लब्बोलुआब यह है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व 2022 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भले ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को नहीं हटाए, लेकिन अब योगी उतनी आजादी से काम नहीं कर पाएंगे जैसे अभी तक करते चले आ रहे थे। अब केन्द्र योगी सरकार के कामकाज की समीक्षा करेगा और जरूरत पड़ने पर मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को निर्देश देने से भी नहीं हिचकिचाएगा। बताते चलें वैसे काफी समय से पार्टी के शाीर्ष स्तर पर योगी सरकार और संगठन में फेरबदल करने के लिए मंथन चल रहा है। इसे लेकर नई दिल्ली में भाजपा व संघ नेताओं की बैठक भी हो चुकी है। सूत्रों की मानें तो कोरोना महामारी का प्रकोप थोड़ा कम होते ही अगले महीने संगठन व सरकार में फेरबदल हो सकता है। फेरबदल से कौन सबसे अधिक प्रभावित होगा, इसकी बात की जाए तो यह मान कर चला जा रहा है कि पंचायत चुनाव में भाजपा को जिन क्षेत्रों और जिलों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिला है, वहां के क्षेत्रीय और जिला पदाधिकारियों को हटाया जा सकता है।

महामारी के दौरान उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन न करने वाले मंत्रियों को भी हटाया जा सकता है या विभाग बदले जा सकते हैं। मंत्रिमंडल के तीन सदस्यों की संक्रमण से मौत हो चुकी है। उसकी भी भरपाई करनी है। कुल मिलाकर अब योगी सरकार और उसके नौकरशाह हर समय केन्द्र की ‘निगरानी’ में रहेंगे। केन्द्र पल-पल यूपी पर नजर रखेगा क्योंकि उसे पता है कि 2014 हो या फिर 2019 के लोकसभा चुनाव यदि यूपी में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं होता तो केन्द्र में मोदी सरकार नहीं बन सकती थी। यही बात 2024 के लोकसभा चुनाव में भी महत्व रखेगी। फिर योगी केन्द्र के लिए इसलिए भी कोई बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव बीजेपी ने योगी के चेहरे पर नहीं मोदी के चेहरे पर जीता था। तमाम किन्तु-परंतुओं के बाद भी यदि योगी के पक्ष में कोई बात जाती है तो वह है उनकी ईमानदार छवि, जिस पर कभी कोई उंगली नहीं उठा सका है।

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