वायरस सार्स-सीओवी-2 का बदलता स्वरूप और वैक्सीन

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उगता भारत ब्यूरो

नोएडा । वायरस लगातार अपना रूप परिवर्तित करते रहते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आनुवंशिक सामग्री की प्रति बनाने के वक्त कई बार कुछ त्रुटियां रह जाती हैं। कुछ त्रुटियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कुछ वायरस को कम टिकाऊ बनाती हैं। कुछ इसे और अधिक सुसाध्य बनाती हैं जिसका मतलब है कि वायरस जीवित तो रहेगा लेकिन इससे बीमारी नहीं होगी। यहां जिन त्रुटियों पर नजर रखी जानी है वे ऐसी त्रुटियां हैं जो वायरस को ज्यादा संक्रामक बनाती हों या प्रतिरक्षा तंत्र से बच निकलने में बेहतर ढंग से सक्षम हो जाएं।

कोविड-19 के लिए जिम्मेदार वायरस सार्स-सीओवी-2 भी अलग नहीं है। जितनी बार यह विभाजित होता है या रूप बदलता है उतनी बार यह नया जोखिम पैदा करता है जिससे वायरस का और गंभीर स्वरूप सामने आ सकता है। यह कहीं भी, किसी भी वक्त हो सकता है। इसलिए वायरस के प्रकारों पर नजर रखना और यह देखना जरूरी है कि क्या यह व्यक्ति से व्यक्ति में आसानी से फैल रहा है, मामूली या ज्यादा गंभीर बीमारी फैला रहा है, मौजूदा जांचों में उसका पता लगाने में दिक्कत तो नहीं हो रही या मौजूदा इलाजों का उसपर असर नहीं हो रहा है। दरअसल सबसे बड़ी चिंता का विषय है सुरक्षा कवच को भेदने वाला संक्रमण, जहां टीकों की सभी खुराक ले चुके व्यक्ति को भी कोविड हो जा रहा है।

वायरस के दूसरे स्वरूप का पता लगने के बाद, उसे या तो दिलचस्पी के स्वरूप या चिंताजनक स्वरूप या उच्च परिणाम वाले स्वरूप के तौर पर वर्गीकृत किया जाता है। राहत की बात है कि हमारा सामना उच्च परिणाम वाले किसी स्वरूप से अब तक नहीं हुआ है जिसपर मौजूदा चिकित्सा उपाय सभी काम नहीं करेंगे। लेकिन हमारे पास चिंता के कारण वाले कम से कम चार स्वरूप हैं। वायरस के किसी प्रकार के इस वर्गीकरण का मतलब है कि उनके ज्यादा फैलाव, ज्यादा गंभीर बीमारी करने, एंटीबॉडीज का उनपर घटता प्रभाव या टीकों एवं इलाजों का कम असर दिखाने वाले साक्ष्य हैं। इनमें बी117 (पहली बार ब्रिटेन में मिला), बी1351 (दक्षिण अफ्रीका में पहली बार पहचाना गया), पी 1 (पहली बार ब्राजील में मिला) और बी16172 (पहली बार भारत में पहचाना गया) स्वरूप शामिल हैं। ऐसे साक्ष्य हैं ये सभी ज्यादा फैलने वाले हैं और ऐसा क्यों है इसे समझने के लिए बेहतर आणविक समझ उपलब्ध है। अधिक प्रसार को महामारी विज्ञान की दृष्टि से (जनसंख्या में) देखा जा सकता है लेकिन एक लैब में भी इसकी पुष्टि करना आवश्यक है कि कोई खास चिंताजनक स्वरूप तेजी से क्यों फैल रहा है। मानवीय कोशिकाओं के रिसेप्टर एसीई2 से चिपक जाने वाला वायरस का हिस्सा, स्पाइक प्रोटीन इन सभी चिंताजनक स्वरूपों में बदला है और इनमें से कुछ में से इस बदलाव को एसीई2 से जुड़ जाने की वायरस की बढ़ी हुई क्षमता के रूप में देखा जा सकता है।

प्रयोगशाला के कुछ अध्ययनों में पाया गया कि मूल स्पाइक प्रोटीनों को निशाना बनाने वाली एंटीबॉडीज वायरस के चिंताजनक स्वरूपों के स्पाइक प्रोटीन को बेअसर करने में कम सक्षम हैं। लेकिन सबस अहम यह है कि तथाकथित वास्तविक दुनिया के आंकड़ों ने दिखाया है कि इसका वायरस के कुछ स्वरूपों के खिलाफ टीके के प्रभाव पर बड़ा असर नहीं पड़ता है। कतर का उम्मीद देने वाला एक अध्ययन दिखाता है कि फाइजर/ बायोटेक एन टीका बी117 के खिलाफ 90 प्रतिशत और बी1351 के खिलाफ 75 प्रतिशत प्रभावी है। एस्ट्राजेनेका टीका बी117 के खिलाफ 75 प्रतिशत असरदार है। ‘पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड’ ने खबर दी है कि दोनों फाइजर/बायोएनटेक और एस्ट्राजेनेका के टीके बी16172 के खिलाफ काफी असरदार हैं। फाइजर 88 प्रतिशत, तो एस्ट्राजेनेका 60 प्रतिशत प्रभावी है। यह अध्ययन इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि बी16172 प्रकार वैश्विक तौर पर प्रमुख स्वरूप बन सकता है। ये विश्लेषण संक्रमण के जोखिम से जुड़े हुए हैं। हालांकि, किसी प्रकार के टीके के सुरक्षा कवच को तोड़ने की आशंका के लिहाज से सबसे जरूरी सवाल है कि कोई संक्रमित होता है कि नहीं बल्कि यह है कि संक्रमण गंभीर बीमारी या मौत का रूप न ले ले।

टीके का काम गंभीर बीमारी को रोकना है और अब तक यह उचित अपेक्षा है कि प्रयोग में आने वाले मुख्य टीके वायरस के चिंताजनक स्वरूपों के खिलाफ ऐसा करने में सक्षम हों। ऐसा कुछ हद तक संभवत: इसलिए है क्योंकि प्रत्येक टीका मजबूत एंटीबॉडी प्रतिक्रिया पैदा कर रहा है। भले ही एंटीबॉडी की गुणवत्ता कम हो लेकिन मात्रा ज्यादा देकर इस कमी को पार किया जा सकता है। वे स्पाइक प्रोटीन पर चिपक सकती हैं और भले ही वे कम चिपचिपी हों लेकिन एंटीबॉडीज जितनी अधिक होंगी उतनी ज्यादा वे प्रोटीन पर जाकर चिपकेंगी। और भले ही एंटीबॉ़डीज की शक्ति हल्की भी हो जाए प्रतिरक्षा तंत्र के पास एक और मजबूत हथियार है टी कोशिकाएं। टी कोशिकाएं वायरस के कई हिस्सों की पहचान कर सकती हैं। वे दो तरीकों से काम करती हैं- बी कोशिकाओं को ज्यादा से ज्यादा एंटीबॉडीज बनाने में मदद कर सकती हैं या संक्रमित कोशिका को मार सकती हैं। संक्रमण शुरू होने के बाद टी कोशिकाओं की यह प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है। प्रकारों के खिलाफ टी कोशिकाओं के विफल होने की संभावना बहत कम होती है। इन सभी बातों से भरोसा जगता है कि टीके कितने प्रभावी हैं। सबसे आवश्यक है कि संभवत: स्पाइट प्रोटीन के साथ बूस्टर टीके लगाएं जाएं या चिंताजनक स्वरूपों से एमआरएनए लेकर खुराकों में डाला जाए और ऐसे कदम भी उठाए जा रहे हैं कि एक ऐसा टीका बने जो सभी प्रकार के कोरोना वायरसों के खिलाफ बचाव दे।

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