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प्रवासी मजदूरों का पलायन भाग- 2

मोहम्मद शहजाद

इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन कोरोना के सबब समय का पहिया इतनी जल्दी उल्टा घूमेगा, इसका शायद ही किसी को ठीक-ठीक अंदाजा था। एक साल के अंदर जब कोविड-19 की दूसरी लहर ने दस्तक दी, तो इसके साथ ही प्रवासी मजदूरों का महापलायन-2 भी शुरू हो गया। इस फर्क के साथ यह सिलसिला जारी है कि इस बार प्रवासी मजदूर सड़कों पर पैदल चलते नहीं दिख रहे हैं।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई समेत देश के तमाम बड़े शहरों के रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर प्रवासी मजदूरों की भीड़ देखी जा रही है जो पिछले साल की तरह ही अपने घरों को पहुंचने के लिए बेताब हैं। दिल्ली सरकार ने पहले वीकेंड पर कर्फ्यू और फिर छह दिन के संपूर्ण कर्फ्यू की घोषणा की, जिसके बाद दिल्ली के रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर प्रवासी मजदूर उमड़ पड़े। गाजियाबाद प्रशासन के अनुसार हफ्तेभर के लॉकडाउन की घोषणा के एक दिन के अंदर 1500 से अधिक बसों में लगभग 77000 मजदूरों को भरकर उनके शहरों तक भेजा गया। इस आंकड़े से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हफ्ते भर में अकेले दिल्ली से ही कितने प्रवासी मजदूर पलायन कर चुके होंगे। फिर दिल्ली में लॉकडाउन बढ़ाए जाने की उनकी आशंका सच भी साबित हुई।

दिल्ली का जब यह हाल है तो मुंबई का क्या आलम होगा? 2011 की जनगणना के अनुसार अकेले मुंबई में 80 लाख प्रवासी मजदूरों की तादाद है। महाराष्ट्र में देश के दूसरे हिस्सों की तुलना में कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप भी पहले शुरू हुआ। स्थानीय प्रशासन ने जैसे ही आंशिक लॉकडाउन लगाया, महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों में रहने वाले प्रवासी मजदूरों के दिमाग में पिछली खौफनाक यादें ताजा हो गईं। इसलिए महाराष्ट्र के हर बड़े शहर के रेलवे स्टेशनों पर अपने गांवों के लिए कूच करते प्रवासी मजदूरों का हुजूम दिखाई दे रहा है। एक अंदाजे के मुताबिक पिछले महीने भर में लगभग 11 लाख 50 हजार मजदूर यहां से पलायन कर चुके हैं। इनमें अधिकतर बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के हैं।

मजदूरों के पलायन का यह सिलसिला कोई एक-दो शहरों तक सीमित नहीं है। पंजाब के खेत-खलिहानों में लगभग 8 लाख प्रवासी मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे शहरों से आकर काम करते हैं। ये मजदूर यहां गेहूं की कटाई से लेकर धान की रोपाई तक रहते हैं, लेकिन आंशिक लॉकडाउन के चंद दिनों में लगभग 30 हजार मजदूर वापस चले गए। इससे वहां की गेहूं की कटाई पर संकट आ गया है। वहीं कोलकाता, हैदराबाद और कर्नाटक के कई शहरों से भी प्रवासी मजदूरों का कूच जारी है। इस बार उनके ठेकेदार और मालिक भी कोई मदद नहीं कर रहे हैं। इसके पीछे उनकी दलील है कि महीनों तक चले पिछले लॉकडाउन ने उनकी हालत पतली कर दी है। इन्हीं ठेकेदारों और मालिकों ने अपने ठप पड़े कामकाज को गति देने के लिए कुछ महीने पहले मजदूरों को एसी बसों की व्यवस्था करके वापस बुलवाया था।

पिछले लॉकडाउन में देश ने विभाजन के बाद अब तक का सबसे बड़ा पलायन देखा। अकेले कौशल विकास मंत्रालय के डेटाबेस के अनुसार 6 राज्यों के 116 जिलों से 67 लाख प्रवासी मजदूरों की घर वापसी हुई। कुल 6 करोड़ प्रवासी मजदूरों के रिवर्स-माइग्रेशन का अंदाजा लगाया गया था। पिछली बार इतनी बड़ी तादाद में मजदूरों की घर वापसी के बावजूद सरकारों ने इस बार उनके रहने, खाने-पीने और लौटने की कोई व्यवस्था नहीं की।

चिंता की बात यह भी है कि अधिकतर राज्यों ने प्रवासी मजदूरों के लिए बनाए गए कोविड सेंटर, क्वारंटीन सेंटर और उनकी जांच की व्यवस्थाओं को खत्म कर दिया है। बाकायदा एक आयोग बनाकर मजदूरों का डेटाबेस तैयार कराने और उनको स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के लंबे-चौड़े दावे करने वाली उत्तर प्रदेश सरकार भी उनके लिए कोई ठोस व्यवस्था करने में नाकाम रही। पिछली भूलों से सबक लेते हुए दूसरी लहर में अब महज कुछ कैश ट्रांसफर और अनाज देने के बजाए सरकार को प्रवासी मजदूरों की व्यथा दूर करने के लिए एक व्यापक पॉलिसी बनानी चाहिए।

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