सांप्रदायिक राजनीति के सामने असहाय होता जा रहा भारत का चुनाव आयोग

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नरेंद्र नाथ

देश की राजनीति में धर्म का दखल नया नहीं है और न ही इसके आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिश या इसे चुनावी लाभ-हानि से जोड़ने की परंपरा नई है। फिर भी इस बार पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान जिस तरह से धर्म का बेपर्दा इस्तेमाल देखा गया, ऐसा शायद ही पहले कभी हुआ हो। इसमें कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं रहा। इनकी तीखी बयानबाजियों के बीच कई बार चुनाव आयोग बेबस नजर आया। इस बार असम, केरल और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में धर्म के नाम पर जमकर वोट मांगे गए। पश्चिम बंगाल में तो यह सिलसिला अभी चल ही रहा है। हालांकि जानकारों के अनुसार इन तीनों राज्यों में धर्म के आधार पर विभाजन पहले से ही रहा है, जिसे राजनीतिक दल अपने पक्ष में लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।

चुनाव में हेट स्पीच जैसी चीजों को रोकने में चुनाव आयोग अभी तक असमर्थ ही रहा है। इसका बड़ा प्रतिकूल परिणाम यह है कि तात्कालिक लाभ लेने की सियासी दलों की कोशिश समाज में दरार को और बढ़ाने का काम कर रही है। असम और केरल में विधानसभा चुनाव समाप्त हो चुका है, तो पश्चिम बंगाल में आठ चरणों के चुनाव में चार चरण पूरे हो चुके हैं। आयोग के सामने इन राज्यों से इस बार धर्म और हेट स्पीच से जुड़ी तीन सौ से अधिक शिकायतें आईं। सीएम से लेकर सीनियर केंद्रीय मंत्री तक इसके दायरे में आए। पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी को धर्म के आधार पर भड़काऊ बयान देने के आरोप में चुनाव प्रचार करने से रोका गया, तो हेट स्पीच के मामले में असम और पश्चिम बंगाल में कई नेताओं को नोटिस दिया गया। लेकिन आयोग की यह कार्रवाई नेताओं को रोकने के बजाय सियासी आरोप-प्रत्यारोप में ही फंस कर रह गई।

चुनाव में धर्म का दुरुपयोग और हेट स्पीच रोकने के लिए कानून तो हैं, चुनावी आचार संहिता में भी इसे रोकने के प्रावधान है लेकिन ये कभी ढंग से लागू नहीं हो पाते। नेता इनका तोड़ निकाल लेते हैं। सांप्रदायिक आधार पर वोट देने की अपील करने पर साल 1999 में चुनाव आयोग ने बाल ठाकरे को छह सालों के लिए वोट देने और चुनाव लड़ने से बैन भी कर दिया था। लेकिन अब ऐसी राजनीति करने वाले और उन्हें सपोर्ट करने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है, जो खतरनाक है। इतना ही नहीं, सत्ता के शीर्ष से लेकर नीचे तक के नेताओं पर इसका आरोप लगता रहा है। जानकारों के अनुसार हमारे देश में धर्म जिंदगी में इतना घुला हुआ है कि हर काम को धर्म के साथ जोड़ देते हैं। लेकिन अगर कानून दृढ़ इच्छाशक्ति से लागू किया जाए, तो राजनीति में धर्म के दुरुपयोग को कम किया जा सकता है।

वहीं लोग धार्मिक कट्टरता के ग्लोबल स्तर पर बढ़ते ट्रेंड को भी इसके लिए जिम्मेदार बता रहे है। इसके लिए फ्रांस की मिसाल देते हैं। फ्रांस ने 1905 में ही धर्म को राजनीति से अलग करने का कानून बना दिया था। अन्य देशों के मुकाबले वहां यह सबसे इफेक्टिव भी है। वहां हर व्यक्ति को पता है कि उनका धर्म राजनीति में नहीं जा सकता। लेकिन हाल के बरसों में वहां राजनीति में धर्म का प्रवेश फिर दिखने लगा है। दरअसल धर्म और राजनीति का घालमेल सामाजिक दिक्कत भी है और निर्वाचन व्यवस्था की भी दिक्कत है। अभी जो लोग चुनकर आते हैं, वे ऐसे होते हैं जिनके पक्ष के बजाय विरोध में ज्यादा वोट पड़े होते हैं। इससे अभी 15-20 पर्सेंट वोट बैंक बना कर कोई भी चुनाव जीतना लगभग सुनिश्चित कर लेता है। धर्म-जाति के नाम पर वोट बैंक बनाए जाते हैं। बीच में चुनाव सुधार के क्रम में यह मांग उठी थी कि 50 पर्सेंट से ज्यादा वोट मिलने पर ही जीत मानी जाए। इसके पीछे सोच यह थी कि 15-20 फीसदी वोट नाकाफी साबित होने पर नेताओं को समझ आ जाएगा कि जाति-धर्म के आधार पर राजनीति नहीं चल सकती है। लेकिन व्यावहारिक रूप से इस मांग को सही नहीं माना गया।

चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान भी कई गाइडलाइंस बनाईं। इसके तहत बताया गया कि जाति या धर्म के आधार पर कोई भड़काऊ बयान नहीं देंगे, या इस आधार पर वोटरों के ध्रुवीकरण करने की कोशिश नहीं करेंगे। यह भी कहा गया कि किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप या उसके चारित्रिक हनन की कोशिश नहीं करेंगे। शिष्टता तोड़ने की कोशिश भी अपराध की श्रेणी में आएगी। नियम है कि अगर कोई किसी इलाके में सार्वजनिक कार्यक्रम करने की अनुमति लेगा, तो उससे पहले उसे लिखित शर्तों पर हस्ताक्षर करने होंगे, और ऐसे कार्यक्रमों की अनुमति देने वाला जिला प्रशासन उस पर विडियो रिकॉर्डिंग के जरिए कड़ी नजर रखेगा। इससे ऐसी भड़काऊ बातों पर काबू रखा जा सकेगा। लेकिन इसके बाद भी यह हकीकत है कि आयोग अधिकतर मौकों पर तभी कोई एक्शन तब लेता है, जब उस बारे में सियासी विवाद होता है।

वहीं सोशल मीडिया ने इस मामले में आयोग के सामने और बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। हाल में चुनाव प्रचार के दौरान सोशल मीडिया का उपयोग बड़े पैमाने पर होने लगा है। अधिकतर धार्मिक नफरत और इस नाम पर बंटवारे की बात इसी माध्यम से होने लगी है। हालांकि पिछले कुछ चुनावों से आयोग ने सोशल मीडिया की भी निगरानी शुरू की है, लेकिन हर अकाउंट पर नजर रखना और उसके कंटेंट को फिल्टर करना आयोग के लिए बहुत कठिन है। सभी राजनीतिक दलों ने सोशल मीडिया पर बड़ी फौज खड़ी कर रखी है। तय नियम के अनुसार सभी दलों को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकांउट और उनके एडमिन के बारे में जानकारी देना अनिवार्य है, लेकिन कई गैर आधिकारिक अकाउंट इनके दायरे में नहीं आते हैं। ये अकाउंट हेट स्पीच और नफरत के सबसे बड़े वाहक बन गए हैं, जिनका इस्तेमाल राजनीतिक दल करते रहते हैं।

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