भाव से अति सूक्ष्म है ब्रह्मांड का ईशान

बिखरे मोती

भाव से अति सूक्ष्म है ,
ब्रह्माण्ड का ईशान।
चित्त का चिन्तन जानता,
परम पिता भगवान॥1465॥

व्याख्या:- पाठकों की जानकारी के लिए यहां यह बता देना प्रासंगिक होगा कि आत्मा चित्त में रहती है जबकि परमात्मा आत्मा में निवास करता है।हमारे चित्त में अति सूक्ष्म सद्भाव और दुर्भावना ते हैं किंतु परमपिता परमात्मा इन से भी अति सुक्ष्म है, जो भाव में भी निवास करता है। वह विराट इतना है कि समस्त ब्रह्माण्ड का ईशान है अर्थात् शासक है, अधिष्ठाता है ,सम्राट है ,राजाओं का राजा है। वह भाव से भी अधिक सूक्ष्म है,वह भाव में भी प्रवेश कर सकता है ।इसलिए वह चित्त रूपी मानसरोवर में उठने वाली और उर्मियों (लहरों) को अच्छी तरह जानता है।जिस प्रकार सीसीटीवी कैमरे की आंख से कोई बच नहीं सकता,ठीक इसी प्रकार चित्त में विद्यमान परमपिता परमात्मा की आंख से कोई जीव बच नहीं सकता। प्रत्येक जीव के चिंतन और कर्मों की रील निरंतर उसके चित्त में सृजित होती रहती है।इसी के आधार पर जीव की आयु ,योनि, भोग का निर्धारण होता है,और पुनर्जन्म मिलता है।इसलिए परमपिता परमात्मा की कृपा का पात्र बनना है तो चित्त की पवित्रता नितांत आवश्यक है। ध्यान रहे! कोई देखे या ना देखे ईश्वर देख रहा है।

ब्रह्यार्पण कर आय से,
होगा आत्मकल्याण।
लोक और परलोक में,
मंगल करें महान् ॥1466॥

व्याख्या:- व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी आमदनी में से कुछ राशि यथाशक्ति प्रसन्नता से परमपिता परमात्मा को अर्पण करें जैसे , यज्ञ – हवन के लिए, अनाथ ,असाहय बच्चों के लिए, रोगी ,अपंग ,दिव्यांगों ,बाढ़ पीड़ितों ,भूकंप पीड़ितों ,गरीबों, भूखा ,नंगे ,आश्रय विहीन, कीट- पतंगों ,पशु – पक्षियों के कल्याणर्थ अपने धन में से आहुती अवश्य डालें। ऐसा करने से परमपिता परमात्मा तो प्रसन्न होंगे ही साथ ही साथ स्वयं की आत्मा को संतुष्टि मिलेगी और आत्म कल्याण भी होगा ।यहां तक कि ऐसे व्यक्तियों का लोक और परलोक सुधरेगा, स्वर्ग में ऊंचे आसन पर आसीन होगा। इसलिए मनुष्य को अपनी आय में से ब्रह्मार्पण की आदत अवश्य डालनी चाहिए।
क्रमशः

 

प्रोफेसर विजेंद्र सिंह आर्य

मुख्य संरक्षक : उगता भारत

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