वैदिक संस्कारों में रुचि रखते थे डॉक्टर अंबेडकर

 

कुशलदेव शास्त्री

स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज की वेदनिष्ठा तो जाहिर है। आर्यसमाज का तीसरा नियम है-’वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परमधर्म है।‘ आर्यसमाजों में समस्त संस्कार वैदिक पद्धति से ही सम्पन्न होते हैं। कुछ अन्य भी ’सनातन‘ संगठन हैं, जो वैदिक संस्कारों के प्रति अनन्य आस्था अभिव्यक्त करते हैं।

माननीय डॉ0 अम्बेडकर के ’बहिष्कृत भारत‘ नामक साप्ताहिक मराठी समाचार पत्र के 12, अप्रैल-1929 के अंक में पृष्ठ सात पर यह संक्षिप्त समाचार प्रकाशित हुआ था -’समाज-समता-संघ का नया उपक्रम।‘ महार समाज में वैदिक विवाह पद्धति सुदृढ़ की जाएगी-स्मरण रहे इसी महार कुल में डॉ0 अम्बेडकर का जन्म हुआ था। उपरोक्त चर्चित अंक के ही पृष्ठ 8 पर, एक सम्पन्न वैदिक विवाह संस्कार की चर्चा करते हुए यह स्पष्ट किया गया था कि- ”यह विवाह हिन्दू मिशनरी सोसाइटी के संस्थापक श्री गजानन भास्कर वैद्य (1856-1921) की संकलित वैदिक पद्धति से सम्पन्न किया गया। उक्त समाचार के अन्त में यह शुभकामना की गई है कि अस्पृश्य समाज वैदिक पद्धति का प्रचलन कर उन पर लगाये गये अस्पृश्यता के कलंक को नष्ट करने में समर्थ हो।“ यह जानकर आश्चर्य होता है कि 29 जून, 1929 को वैदिक पद्धति से सम्पन्न श्री केशव गोविन्दराव आड़रेकर के विवाह में डॉ0 अम्बेडकरजी अपनी सहधर्मिणी के साथ उपस्थित थे। यह विवाह ’समाज-समता-संघ‘ के तत्त्वाधान में तथा आचार्य-पुरोहित श्री सुन्दररावजी वैद्य की देख-रेख में सम्पन्न हुआ था। वर-वधू के माता-पिता रूढ़िवादी होते हुए भी माननीय डॉ0 अम्बेडकर के सुधार सम्बन्धी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर ही वैदिक पद्धति से विवाह करवाने के लिए तैयार हुए थे। यह विवाह परल (मुम्बई) स्थित दामोदर मूलजी ठाकरसी हॉल में सम्पन्न हुआ था। श्री सुरवाडे के अनुसार ‘दलित समाज में वैदिक पद्धति से सम्पन्न यह पहला विवाह था।‘ अम्बेडकर-दम्पत्ति के अतिरिक्त इस विवाह में श्री रा0 ब0 बोले, डॉ0 सोलंकी, श्री कमलाकर चित्रे आदि गणमान्य सज्जन समुपस्थित थे। डॉ0 अम्बेडकरजी के 6, सितम्बर-1929 के ’बहिष्कृत भारत‘ में यह समाचार भी प्रकाशित हुआ था कि ’मनमाड़ के महारों (दलितों) ने श्रावणी मनायी।‘ 26 व्यक्तियों ने यज्ञोपवीत धारण किये। यह समारोह मनमाड़ रेल्वे स्टेशन के पास डॉ0 अम्बेडकरजी के मित्र श्री रामचन्द्र राणोजी पवार नांदगांवकर के घर में सम्पन्न हुआ था। इन समाचारों से स्पष्ट है कि माननीय डॉ0 अम्बेडकरजी का अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में उपनयन-विवाह आदि वैदिक संस्कारों की ओर भी यत्किंचित् झुकाव अवश्य ही रहा और अपने पत्रों में भी वे वैदिक संस्कार विषयक समाचारों को प्रकाशनार्थ स्थान अवश्य देते थे।

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