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पुस्तक समीक्षा : स्वप्नलोक

 

स्वप्नलोक पुस्तक के लेखक प्रदीप भारद्वाज दीप हैं । यह पुस्तक विभिन्न विषयों को लेकर लिखी गई कविताओं का संग्रह है । जिसमें कवि ने अपने साहित्य के चितेरेपन को बड़ी कुशलता से प्रकट किया है।


वास्तव में कविता के माध्यम से कवि को अपनी जिस व्यापक सोच और विशाल हृदयता के साथ-साथ कल्पना शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए वह सारा इस पुस्तक में स्वाभाविक रूप से समाविष्ट हो गया है। जिससे जनमानस को लोकोत्तर आनंद की अनुभूति होना स्वाभाविक है। इस पुस्तक के माध्यम से अपनी कुल 99 रचनाओं के द्वारा कवि ने अपने जीवन की गहरी अनुभूतियों को प्रकट करने का प्रयास किया है। उनका मानवतावादी उदार दृष्टिकोण और जमीनी समस्याओं से जुड़ाव इस पुस्तक के माध्यम से अपने आप ही प्रकट हो गया है।
‘तुम स्वप्न लोक में आ जाना’ – शीर्षक कविता की यह पंक्तियां बड़ी मनोहारी हैं :-

मेरा स्नेह निमंत्रण पाकर
स्वप्न लोक में आ जाना ।
मंद मंद मुस्कान लिए तुम
थोड़ा सा शर्मा जाना ।।

जहां कवि ने इन पंक्तियों के माध्यम से अपने हृदय की प्रेम पूर्ण पवित्रता का प्रदर्शन किया है ,वहीं वे अपनी कविता ‘संघर्ष’ के माध्यम से कुछ दूसरा ही संदेश देते दिखाई देते हैं :-

जीवन है संग्राम सरीखा
अपना युद्ध मुझे ही लड़ना।
अपनों के सपनों की खातिर
मुझको ही है आगे बढ़ना।।

कवि अपनी पुस्तक की भूमिका में ‘दिल की कलम से’ – शीर्षक के माध्यम से पुस्तक के विषय में बहुत कुछ स्पष्ट कर देते हैं। उनका मानना है कि कई वर्ष से उनके ह्रदय में कुछ काव्यांकुर पल्लवित हो रहे थे। मन के भावों के पौधों पर रिश्तो की सरसता की नमी से सिंचित होकर कुछ शब्द रूपी पुष्प उगे। यही पुष्प गुंफित होकर रचना के रूप में सामने आते रहे। जिन्हें मैं सहेज कर रखने लगा। मन की चेतन अवचेतन अवस्था में जागती सोती आंखों से जो देखा महसूस किया कागज पर उतार दिया । सहज भाव से सरल सरस भाषा में जो मेरे दिल से निकल कर आपके दिल से सीधे जुड़ जाएं। यह कविता संग्रह नहीं है, मां सरस्वती का प्रसाद है।
इन शब्दों में कवि ने अपने हृदय की पवित्रता, सहजता ,सरलता बहुत सरल शब्दों में प्रकट कर दी है। वास्तव में ऐसी संवेदनात्मक और हृदय की सरल अवस्था में ही कविता फूटती है। कविता का यह प्रस्फुटन एक झरना बन जाता है । जो सीधे दूसरों के हृदय को पवित्र करने लगता है। व्यक्ति इस झरने से गिरते अमृतोपम जल से जब स्नान करता है तो बहुत आनंदित हो उठता है।
ऐसे ही आनंद की वर्षा कवि प्रदीप भारद्वाज ‘दीप’ ने अपनी इस पुस्तक में प्रस्तुत की गई 99 कविताओं के माध्यम से की है। कवि की कविताओं का आनंद लीजिए :-

हौले हौले छम छम करती
मेरे दिल पर छा जाना,
मंद मंद मुस्कान लिए
तुम थोड़ा सा शर्मा जाना।।

एक कविता ‘मैं खुद से ही अनजानी हूं’ – में नायिका कहती है –
पल में रोती पल में हंसती
मैं मीरा सी दीवानी हूं,
एक मृगतृष्णा सी है मन में
मैं खुद से ही अनजानी हूँ ….

मां के विषय में कवि के यह शब्द बड़े सार्थक हैं :-

वह थकती नहीं थी वह झुकती नहीं थी ,
सदा चलती रहती थी रुकती नहीं थी,
कभी एक शिकन भी ना चेहरे पर लाना
वह मां का जमाना था, मां का जमाना।।

इस प्रकार यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी और संग्रहणीय है । जो पाठकों का विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन तो करेगी ही साथ ही काव्य की रसानुभूति कराने में भी सहायता करेगी ।
पुस्तक कुल 144 पृष्ठों में लिखी गई है। पुस्तक का मूल्य ₹200 है । पुस्तक के प्रकाशक साहित्यागार धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता जयपुर 302003 है ।पुस्तक प्राप्ति के लिए फोन नंबर 0141- 2310785 , 4022382 पर संपर्क किया जा सकता है।

-डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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