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धर्म-अध्यात्म

धर्म के अनुशासन के बिना विज्ञान मानव जीवन के लिए अहितकारी है

ओ३म

आजकल विज्ञान की उन्नति ने सबको आश्चर्यान्वित कर रखा है। दिन प्रतिदिन नये नये बहुपयोगी उत्पाद हमारे ज्ञान व दृष्टि में आते रहते हैं। बहुत कम लोग जानते होंगे कि उनकी अनेक समस्याओं का कारण भी विज्ञान व इसका दुरुपयोग ही है। इसका मुख्य उदाहरण तो वायु, जल और पर्यावरण प्रदुषण का है। यह प्रदुषण विज्ञान व उसके आविष्कारों सहित औद्योगिक उत्पादों के बिना सोचे उपभोग के कारण व मनुष्य की दिनचर्या में आये बदलाव का परिणाम है। मनुष्य को वायु और जल शुद्ध न मिले तो यह अनेकानेक रोगो का कारण होने से मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए घातक होता है। यही आजकल सर्वत्र हो रहा है। इतना ही नहीं हम जो भोजन करते हैं उसे भी विज्ञान ने हमारे लिए अहितकार व अनेकानेक रोगों का उत्पादक बना दिया है जिससे मनुष्य दुःखी रहते हैं और कालकवलित होते रहते हैं। वर्तमान में हमें जो खाद्य पदार्थ बाजार से मिलते हैं उसमें रासायनिक खादों व कीटनाशकों के प्रयोग ने उन्हें स्वास्थ्य के अहितकर व हानिप्रद बना दिया है। अनेक अन्न, खाद्य पदार्थ व सब्जियां मल-मूत्र को खाद के रूप में प्रयोग कर पैदा की जाती है जो स्वास्थ्य व मनोविकारों को जन्म देती हैं। इस ओर देश व समाज का बहुत कम ध्यान है और विज्ञान भी चुप है जबकि हमारे ऋषि-मुनियों को इसका ज्ञान था और इसी कारण उन्होंने मल-मूत्र के संसर्ग से उत्पन्न अन्न आदि पदार्थों के सेवन को निषिद्ध किया था।

विज्ञान के नाम पर आज आम मनुष्य की क्षमता से भी कहीं अधिक खर्चीली चिकित्सा पद्धति देश में आई है जिसमें न केवल जीवन भर की पूंजी कुछ ही दिनों में छोटे-मोटे रोगों के उपचार में स्वाहा हो जाती है अपितु वह कर्जदार होकर शेष जीवन नरक के समान व्यतीत करता है। बहुत से लोग तो धनाभाव के कारण अपना उपचार करा ही नहीं पाते और मृत्यु का वरण कर लेते हैं। अनेक चिकित्सक और पैथोलोजी लैब भी रोगियों को स्वेच्छा से लूटती हैं जिसके अनेक उदाहरण सामने आ चुके है और जो कम नहीं हो रहे हैं। स्वार्थ के कारण कुछ व अनेक चिकित्सक रोगियों को महंगी व कई अनावश्यक दवायें भी लिख देते हैं जिसका असर रोगी की आर्थिक स्थिति व स्वास्थ्य पर बुरा ही पड़ता है। इस ओर न तो सरकारों का ध्यान है और न ही देश के नागरिक ही सचेत हैं। इस क्षेत्र में सरकार व रोगी परिवारों के बीच किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति है। इसका कोई हल सामने नहीं आ रहा है। जिस प्रकार से संसार के विकसत व अर्धविकसित देश विज्ञान के उपयोग से नाना प्रकार के हानिकारक आयुद्ध आदि बना रहे हैं वह भी मानवता की सुख, समृद्धि व शान्ति के उपयों के विपरीत हैं। सौभाग्य से आज योग, प्राणायाम, आसन, व्यायाम व सन्तुलित भोजन के प्रति स्वामी रामदेव जी के प्रयासों से जागरुकता बढ़ी है। उन्होंने कम खर्चीली आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को भी विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाया है। इसे अपनाने वाले लोग इससे लाभान्वित हो रहे हैं परन्तु फिर भी विज्ञान प्रदत्त अन्य साधनों से कुल मिलाकर मनुष्यों को नानाविध हानियां हो रही है जिस पर विद्वानों व वैज्ञानिकों सहित सरकारों को भी ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। इसका प्रमुख कारण हमें धर्म के वास्तविक रूप को न समझना ही ज्ञात होता है। यदि मनुष्य धर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचित होकर सत्य व सरलता का प्राकृतिक व वैदिक मान्यताओं के अनुसार जीवन व्यतीत करें, जैसा कि उन्होंने महाभारतकाल तक व उससे पहले व्यतीत किया है, तो समाज में आज विद्यमान अनेकानेक समस्यायें न होती। आज भी यदि इस दिशा में विचार व आचरण किया जाये तो सामाजिक भलाई का बहुत कार्य किया जा सकता है।

वैदिक धर्म की कुछ विशेषतायें हैं जिससे अनेक समस्याओं का निराकरण हो जाता है। वैदिक धर्म मनुष्यों को मानव जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य से परिचित कराता है और उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इसके उपयुक्त साधनों को करने के लिए बल देता है जिससे मनुष्य का यह जीवन व परजन्म सुख व शक्ति का संचय कर दीर्घायु हो और उसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त होकर दुःखों की सर्वथा निवृत्ति वा चिरकालीन मोक्ष रूपी स्वर्गीय सुखों व आनन्द की प्राप्ति हो। वैदिक धर्म वेदों का ज्ञान प्राप्त कर उसके अनुसार आचरण करने को कहते हैं। वैदिक जीवन में मनुष्य को अनिवार्य रूप से ईश्वरोपासना, ईश्वर का ध्यान, चिन्तन, मनन, अध्ययन वा स्वाध्याय, ऋषियों व विद्वानों की संगति व उनकी सेवा सत्कार, प्राणियों के प्रति अंहिसा व उनके हित की कामना, स्वयं व दूसरों के जीवन का सुधार व उन्नति, समाज को संगठित करना व उसका उच्च आदर्शों के अनुरूप निर्माण सहित परोपकार व दूसरों की सेवा के संस्कार व स्वभाव की प्राप्ति होती है। वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है जो मनुष्यों को सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा ऋषियों को प्राप्त हुआ था। इन चार ऋषियों ने ईश्वर से प्राप्त वेदों के ज्ञान को ब्रह्मा जी को दिया और इन ऋषियों द्वारा आदि सृष्टि के सभी स्त्री-पुरूषों को वेद ज्ञान से युक्त किया था। यहीं से वेदाध्ययन व प्रचार की परम्परा आरम्भ हुई थी जो अद्यावधि चली आई है।

वेद की सभी शिक्षायें अज्ञान से सर्वथा रहित व मानव जीवन सहित सभी प्राणियों की हितकारी है। यह मत-पन्थ-मजहब-सम्प्रदाय आदि से कहीं ऊपर व सर्चोच्च हैं। वेदों व वैदिक धर्म में सुख-सुविधा-विलासिता के भौतिक साधनों का न्यूनतम प्रयोग करते हुए भोगों से दूर रहकर त्याग पूर्ण जीवन व्यतीत करने का विधान है। शारीरिक उन्नति व आत्मिक उन्नति पर वैदिक धर्म में सर्वाधिक ध्यान दिया जाता है। वेदों के आधार पर उपनिषदों व दर्शनों में ऋषियों ने जो ज्ञान दिया है वह संसार भर के साहित्य में दुर्लभ है। इन सबका सेवन, आचरण व अभ्यास करते हुए वायु, जल व पर्यावरण की शुद्धि के लिये प्रयास करने की प्रेरणा की गई है, तभी मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेगा अन्यथा नहीं। वैचारिक व सत्य-असत्य के विवेचन के आधार पर चिन्तन करने पर भी यह विचारधारा प्राणिमात्र के हित को सम्पादित करने में सहायक व सत्य सिद्ध होती है। इसी कारण से हमारे प्राचीन ऋषि व पूर्वज वैदिक धर्म का न केवल स्वयं पालन करते थे अपितु समाज के सभी लोग उनसे उपदेश प्राप्त कर उनकी आज्ञाओं के अनुसार ही अपना त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। वैदिक धर्म मनुष्य के जीवन को अनुशासित कर उन्नति करते हुए जीवन के उद्देश्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष तक ले जाता है। दूसरी ओर उन्मुक्त वा अनुशासन रहित जीवन आर्थिक सुख-समृद्धि भले ही प्राप्त कराये, परन्तु यह मनुष्य को रोगी व अल्पायु बनाकर, उसे जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य से दूर कर जन्म-जन्मान्तरों में दुःख व कष्टों का कारण सिद्ध होता है।

विज्ञान के लाभ व हानि को जानने का प्रयास सभी मनुष्यों को करना आवश्यक है। विज्ञान के साधनों का उसी सीमा तक उपयोग उचित है जहां तक की उससे हमारा धर्म, स्वास्थ्य तथा स्वस्थ सामाजिक परम्परायें सुरक्षित रहें। विज्ञान व आधुनिकता से हमारा धर्म व संस्कृति कुप्रभावित नहीं होनी चाहिये। वायु-जल-अन्न के प्रदुषण के सभी कारको को दूर कर प्रदुषण निवारण के उपाय करने का प्रयास होना चाहिये जिनमें दैनिक देवयज्ञ अग्निहोत्र को सम्मिलित किया जाना चाहिये। यदि विज्ञान हमारे जीवन व स्वास्थ्य आदि का समुचित समाधान प्रस्तुत नहीं करता तो निश्चय ही हमें प्रदुषणकारक साधनों व उत्पादों को छोड़ना व इनका उपयोग नियंत्रित करना आवश्यक है। यातायात के साधन, वाहन, उद्योग तथा सीमेंट-कंक्रीट के बड़े बड़े भवन आदि वायु-जल-अन्न व पर्यावरण प्रदुषण के प्रमुख कारक हैं। निश्चय ही यह आज हमारे जीवन में ऐसे प्रविष्ट हो गये हैं कि इनके बिना जीवन व्यतीत करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मनुष्य विष मिश्रित अन्न का जिस प्रकार त्याग करता है वैसी ही कुछ स्थिति वर्तमान में विज्ञान व आधुनिक जीवन शैली ने बना दी है। हमें धर्म, अपने स्वास्थ्य एवं सुख व शान्ति को महत्व देना चाहिये जो वेद प्रतिपादित साम्प्रदायिकता रहित धर्म के आचरण से ही प्राप्त होती है। सत्य वैदिक धर्म को यदि संसार अपना ले और उसके अनुसार सभी मनुष्य ईश्वरोपासना, यज्ञ-अग्निहोत्र, योग, ध्यान, स्वाध्याय, सेवा, परोपकार, त्याग, प्राणिहित, अंहिसात्मक व्यवहार, स्वार्थ व लोभ पर नियंत्रण, अपरिग्रह आदि का सेवन करें तभी पर्यावरण बच सकेगा। वैदिक धर्म में प्रतिदिन प्रातः व सायं यज्ञ करने का जो विधान है वह अनेक लाभों सहित वायु, जल व अन्न के प्रदुषण को दूर करने के लिए होता है। इस ज्ञान व विज्ञान को विकसित कर प्रदुषण निवारण में इसका भी उपयोग किया जा सकता है। सरकार तथा वैज्ञानिकों को इस ओर ध्यान देना है। वैदिक धर्म का ज्ञान व उसका सभी मनुष्यों द्वारा आचरण आज संसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण व प्रासंगिक होने के कारण आवश्यक व अनिवार्य प्रतीत हो रहा है क्योंकि इसके द्वारा ही हम विश्व को सभी प्रकार के प्रदुषणों, अन्याय, शोषणों व अशान्ति से बचा सकते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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