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आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव ने कबूली सच्चाई, कहा- किसान आंदोलन शुद्ध राजनीतिक आंदोलन है, इसका उद्देश्य है प्रधानमंत्री मोदी को हराना

2014 में मोदी सरकार द्वारा लिए जा रहे किसी भी निर्णय को जन-विरोधी बताकर हंगामा करना, धरने एवं प्रदर्शन कर मोदी विरोध की सच्चाई आन्दोलनजीवी योगेंद्र यादव ने कबूल कर ली। संभव है कि अब जनता कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अकाली दल और आन्दोलनजीवियों द्वारा अपनी रोटियां सेकने के लिए मोदी विरोधी किस तरह जनता को भ्रमित कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी, जब से 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में आए, वामपंथी समूहों से लेकर पूरे विपक्ष ने उनके प्रति लगातार घृणा और आक्रोश का एक खतरनाक चक्रव्यूह रचा है। जिसका अक्सर समापन हिंसा के रूप में होता आया है। इसी कड़ी में ताजा घटनाक्रमों का चक्र तथाकथित किसानों के विरोध के रूप में जारी है। जो केंद्र सरकार द्वारा तीन कानूनों को पारित करने के बाद भड़क गया था या सुनियोजित रूप से भड़काया गया था। वैसे तीनों कानून वास्तव में किसानों को लाभान्वित करेंगे और उन्हें बिचौलियों की घातक जकड़ से मुक्त करेंगे।
जबकि किसान आंदोलन के नाम पर कॉन्ग्रेस, कम्युनिस्ट संगठनों और दलों, खालिस्तानियों और यहाँ तक ​​कि भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप कर यहाँ के आम लोगों को भड़काने में लगे असामाजिक तत्वों की भी ज़बरदस्त भागीदारी देखने को मिल रही थी। हालाँकि, सबसे लंबे समय तक इसे देश के अन्नदाताओं द्वारा जारी विरोध प्रदर्शनों का दावा करते हुए, इस आंदोलन को ऑर्गेनिक और गैरराजनितिक बताने की कोशिश भी लिबरल्स की दूरगामी विध्वंशक योजना का हिस्सा ही है।

अब किसानों के विरोध प्रदर्शन के लगभग 4 महीने बाद और गणतंत्र दिवस की हिंसा के एक महीने बाद, यह प्रायोजित आंदोलन, अपने पुराने ढकोसलों से बाहर आता हुआ नजर आ रहा है। ‘आन्दोलनजीवी’ प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव, जो संभवतः हर आंदोलन में इच्छाधारी प्रदर्शनकारी नेता के रूप में अलग-अलग किरदार में मौजूद रहते हैं, ने यह खुलकर स्वीकार किया है कि किसानों का यह विरोध, वास्तव में राजनीतिक है। इसका एक मात्र उद्देश्य मोदी सरकार को सत्ता से हटाना और हराना है।

योगेंद्र यादव ने द प्रिंट में एक लेख लिखा जिसका हेडलाइन है, ”Farmers’ movement can’t and shouldn’t be apolitical. That’s not a democracy” अर्थात “किसानों का आंदोलन गैरराजनीतिक नहीं हो सकता, होना भी नहीं चाहिए। यह लोकतंत्र नहीं है या ऐसा लोकतंत्र में नहीं होता।

                                     ‘द प्रिंट’ में छपा योगेंद्र यादव का लेख

लेख में, योगेंद्र यादव स्पष्ट रूप से दावा करते हैं कि किसानों का विरोध गैरराजनीतिक नहीं है। वह आगे यह भी दावा करते हैं कि इसे गैरराजनीतिक होना भी नहीं चाहिए और इसका गैरराजनीतिक होना लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।
लेख को संयुक्त किसान-मोर्चा (एसकेएम) के उस राजनीतिक निर्णय के बचाव करने के स्पष्ट इरादे के साथ लिखा गया है। जिसका उद्देश्य है कि अब तथाकथित ‘अराजनीतिक’ किसान चुनावी राज्यों में भाजपा के खिलाफ चुनावी मोर्चाबंदी करते नजर आएँगे। तथाकथित देश के अन्नदाता चुनावी राज्यों में वोटबैंक की राजनीति करते नजर आएँगे। इसका मतलब और उद्देश्य जो भी है वो आपको साफ नजर आ रहा होगा कि अब ये किसकी भूमिका बनाने की कोशिश हो रही है।

योगेंद्र यादव ने संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के फैसले की बात करते हुए लेख में कहा कि चुनावी राज्यों में जाकर बीजेपी के खिलाफ हमें प्रचार करना चाहिए। वह लिखते हैं, “हमने बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी में मतदाताओं से अपील करने का निर्णय लिया है कि वे किसान विरोधी कानूनों के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को चुनावी तौर पर सज़ा दें। बीजेपी द्वारा आंदोलन को दबाने के लिए, अपने राज्य मशीनरी का उपयोग कर आंदोलन को ख़त्म करने या उसका अपराधीकरण और भाजपा के अतिरंजित अहंकार के लिए उसे दण्डित करें। अब यह मतदाताओं को तय करना है कि वे इस सजा को भाजपा को कैसे देना चाहते हैं। इसके लिए SKM आपको यह सुझाव नहीं दे रहा है कि आप किसे वोट दें।”

अनिवार्य रूप से, यहाँ ‘आन्दोलनजीवी’ योगेंद्र यादव यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि किसानों का राजनीतिकरण केवल ‘सही’ उद्देश्य के लिए किया जा रहा है, न कि उस बात के लिए पूरे आंदोलन को बदनाम किया जाना चाहिए। वे केवल बीजेपी को हराना चाहते हैं और उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है कि कौन जीतता है। यहाँ तक कि अब्बास सिद्दीकी के बंगाल जीतने पर भी वे खुश हैं। उनका दावा है कि जब तक मोदी और भाजपा को अनिवार्य रूप से सत्ता से बाहर रखा जाता है। तब तक ही सही मायने में लोकतंत्र है।

यह कहते हुए कि राजनेता किस तरह राजनीति को एक गंदा शब्द बना रहे हैं, यह माँग करते हुए कि किसानों को ‘अराजनीतिक’ होना चाहिए। इच्छाधारी आंदोलकारी योगेंद्र यादव कहते हैं कि किसान स्वयं अपने संगठनों को “अराजनीतिक” कहकर अपना नुकसान कर रहे हैं। वह आगे स्वीकार करते हैं कि अधिकांश किसान संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं और यह संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के लिए भी उतना ही सही है, जिसमें स्वयं के भीतर कई ऐसे संगठन हैं जो राजनीतिक दलों से संबद्ध हैं।

यहाँ दिलचस्प है यह जानना भी कि वह जो साफ-साफ़ उल्लेख करने से बच रहे हैं, यह भी हो सकता है कि वह यह मान कर चल रहे हों कि हर कोई उनके बारें में जानता होगा, क्योंकि वह खुद एसकेएम की समन्वय समिति के एक सदस्य हैं। यहाँ तक कि योगेंद्र यादव, स्वराज अभियान नामक एक राजनीतिक पार्टी भी चलाते हैं। बाकी अन्य किसान नेता भी कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट दलों से जुड़े हैं।

इसके अलावा, SKM द्वारा बनाए गए कानूनी सेल में 4 सदस्य हैं – कॉलिन गोंसाल्विस (Colin Gonsalves), दुष्यंत दवे (dushyant Dave), प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) और एच एस फूलका (SH Phoolka)।

ये लोग कौन हैं, कोई पूछ सकता है? प्रशांत भूषण एक ‘कुख्यात’ वकील हैं जो AAP के संस्थापकों में से एक थे। एचएस फूलका खुद AAP नेता हैं जिन्होंने हाल ही में पद छोड़ दिया है। दुष्यंत दवे खुद कई प्रसिद्द मामलों के वकील हैं, उनमें से एक राम जन्मभूमि पर हिंदू अधिकारों के खिलाफ लड़ने का मामला भी है और कॉलिन गोंसाल्विस एचआरएलएन के संस्थापक हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर जामिया में पुलिस कार्रवाई की न्यायिक जाँच की माँग की थी। यहाँ यह जान लेना भी महत्वपूर्ण है कि HRLN को जॉर्ज सोरोस ओपन सोसाइटी इंस्टीट्यूट से भी भारी मात्रा में धन प्राप्त होता है। यह PUCL और HRLN की संयुक्त जोड़ी अक्षय पात्र पर ‘सिविल सोसायटी’ के नाम पर हमले में भी शामिल था।

अब आखिर बचता ही क्या है? बीकेयू के राकेश टिकैत, जिन्होंने खुद रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन अभी किसान नेता बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस के सहयोगी रहे, दर्शन पाल जो माओवादी पीडीएफआई के संस्थापक थे और योगेंद्र यादव जैसे ‘आन्दोलनजीवी’ तत्वों की भागीदारी। जब नेता पहले से ही कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी आदि से जुड़े थे तो तथाकथित किसानों का यह प्रायोजित विरोध शुरू से ही राजनीतिक रहा है।

जबकि योगेंद्र यादव का कहना है कि ‘राजनीतिक’ होना लोकतंत्र का एक हिस्सा है और इससे कोई भी सहमत होगा। यह भी सच है कि जब इस तरह के हर विरोध-प्रदर्शन में यही समान आन्दोलनजीवी तत्व दिखाई देते हैं। और जब वे इधर-उधर की फालतू बातें करते हुए खुलेआम झूठ बोलते हैं, दूसरे आम और मासूम लोगों को भड़काते हैं, तो यह उनका राजनीतिक एजेंडा है जो उनके किसी भी विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने का केंद्रीय कारण है न कि तथाकथित असंतोष या मूल्यों की लड़ाई। वो कोई भी झूठा दावा करें लेकिन मूल कारण राजनीति ही होती है। बाकी सभी मुद्दे उनके लिए महज राजनीतिक हथकंडा है।

एंटी-सीएए दंगों के दौरान भी आपने देखा होगा कि किस तरह से यही लोग यह झूठा दावा करते हुए नजर आते हैं कि यह कानून मुस्लिम विरोधी था। जबकि ऐसा कुछ नहीं था। किसानों के विरोध के दौरान भी वही तत्व फिर से यह दावा करते हैं कि किसान कानून किसानों के हितों के खिलाफ हैं। जबकि जिसने भी उन तीनों कानूनों को पढ़ा और जाना है उसमें किसानों के अहित की कोई बात नहीं है। दोनों ही मामलों में, वैश्विक वामपंथियों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भारत और विशेष रूप से, हिंदुओं और मोदी सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने में शामिल हो गया था। दोनों ही मामलों में राजधानी दिल्ली में हिंसा भड़क उठी थी।

योगेंद्र यादव यह कहते हुए गलत नहीं है कि हर विरोध और वास्तव में, प्रत्येक व्यक्ति की एक राजनीतिक प्राथमिकता होती है और वास्तव में लोकतंत्र का फायदे उठाते हुए निहित राजनीतिक हितों के लिए केंद्रित यह समूह देश को जलाना शुरू कर देता है क्योंकि वे सुनिश्चित करना चाहते हैं एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को हिंसा और प्रोपेगेंडा द्वारा सत्ता से बाहर कर दिया जाए। यह लोकतंत्र नहीं है बल्कि यह उन राजनीतिक दलों के राजनीतिक हित हैं, जिनकी वे सेवा करते हैं।

योगेन्द्र यादव जैसे लोगों का झूठ पर आधारित यह निहित राजनीतिक स्वार्थ है न कि यह लोकतंत्र, जो हिंसा और प्रोपेगेंडा के बल पर देश के आम लोगों को भ्रमित और भड़काकर एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाने के लिए ऐसे प्रायोजित विद्रोह का नेतृत्व कर रहे हैं। जिसमें देश-विरोधी वो तमाम ताकतें शामिल है जो भारत को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहतीं। यह निश्चित रूप से लोकतंत्र तो नहीं है।

द प्रिंट में लिखें इस ओपिनियन पीस के साथ, योगेंद्र यादव ने एक बात बहुत स्पष्ट कर दी है कि – तथाकथित किसानों का विरोध, जिसके दम पर एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार के खिलाफ विद्रोह और उसे अस्थिर करने का प्रयास किया गया और अब राज्यों के विधानसभा चुनावों में एक पार्टी यानी बीजेपी के खिलाफ जिस अभियान की बड़े पैमाने पर तैयारी की गई है। उसका कृषि कानूनों से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि यह लोकतान्त्रिक शक्ति को क्षीण कर हिंसा और प्रोपेगेंडा के बल पर न सिर्फ एक सरकार को बल्कि समूचे देश को अस्थिर और कमजोर करने की गहरी साजिश है। इसके लिए राष्ट्र-विरोधी ताकतें हर हथकंडा अपनाने को तैयार हैं।

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