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कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में आखिर इतनी बेचैनी क्यों बढ़ती जा रही है

रमेश सर्राफ धमोरा

जी-23 के नेताओं का कहना है कि कांग्रेस पार्टी में संगठन के चुनाव होने चाहिए जिससे पार्टी में व्याप्त मनोनयन करने की प्रवृत्ति समाप्त हो ताकि आंतरिक पारदर्शिता बहाल हो सके। जी-23 में देश के विभिन्न प्रदेशों के वो वरिष्ठ नेता हैं जो कभी कांग्रेस पार्टी के कर्ताधर्ता होते थे।

कांग्रेस पार्टी इन दिनों अपने ही असंतुष्ट नेताओं की बगावत से जूझ रही है। देश में लगातार कांग्रेस का प्रभाव कम होता जा रहा है। कुछ दिन पूर्व पुडुचेरी में कांग्रेस की सरकार गिर गई थी। उससे पहले भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के विधायकों में बगावत करवा कर कर्नाटक व मध्य प्रदेश की सरकारों को गिरा कर वहां भाजपा की सरकारें बनवा दी थीं। ऐसे में गिरते जनाधार को रोकने में नाकाम रही कांग्रेस में व्याप्त आंतरिक संकट पार्टी को और अधिक कमजोर करेगा।

कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने गुलाम नबी आजाद के अध्यक्षता में जी 23 नाम से एक मोर्चे का गठन किया है जिसमें शामिल नेता कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की कार्यप्रणाली से सहमत नहीं हैं। ये सभी नेता खुलकर कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करने की मांग कर रहे हैं। जी-23 के नेताओं का कहना है कि कांग्रेस पार्टी में संगठन के चुनाव होने चाहिए जिससे पार्टी में व्याप्त मनोनयन करने की प्रवृत्ति समाप्त हो ताकि आंतरिक पारदर्शिता बहाल हो सके। जी-23 में देश के विभिन्न प्रदेशों के वो वरिष्ठ नेता हैं जो कभी कांग्रेस पार्टी के कर्ताधर्ता होते थे। मगर अब पार्टी में अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

इस ग्रुप में गुलाम नबी आजाद के साथ पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पृथ्वीराज चौहान, एम. वीरप्पा मोइली, राजिंदर कौर भट्ठल, केंद्र सरकार में मंत्री रहे कपिल सिब्बल, शशि थरूर, मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, पीजे कुरियन, रेणुका चौधरी, मिलिंद देवड़ा, मुकुल वासनिक, जितिन प्रसाद, सांसद विवेक तंखा, अखिलेश प्रसाद सिंह, पूर्व सांसद संदीप दीक्षित, राज बब्बर, अखिलेश प्रसाद सिंह, कुलदीप शर्मा, योगानंद शास्त्री, अरविंदर सिंह लवली और अजय सिंह शामिल हैं। इनमें शशि थरूर व मनीष तिवारी लोकसभा तथा आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, अखिलेश प्रसाद सिंह, विवेक तंखा राज्यसभा सदस्य हैं। भूपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। मुकुल वासनिक कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं। बाकी सभी नेता कांग्रेस में साइड लाइन किए जा चुके हैं।

गुलाब नबी आजाद का हाल ही में राज्यसभा का कार्यकाल पूरा होने के कारण उनको राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से भी हटना पड़ा, जिसका उन्हें गहरा मलाल है। उनका मानना है कि कांग्रेस पार्टी को उनकी सेवाओं के बदले समय रहते किसी दूसरे प्रांत से उन्हें राज्यसभा में भेजा जाना चाहिए था। मगर पार्टी नेतृत्व ने पहले तो उनको उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के प्रभारी महासचिव पद से हटाकर हरियाणा जैसे छोटे प्रदेश का प्रभारी बनाया था। उसके बाद पिछले दिनों कांग्रेस संगठन में किए गए पुनर्गठन में उन्हें पार्टी महासचिव पद से भी हटा दिया गया था। आज वह कांग्रेस में किसी बड़े पद पर नहीं हैं।

कांग्रेस में बनाये गये जी-23 ग्रुप में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के अलावा कोई जनाधार वाला नेता नहीं है। इसमें शामिल अधिकांश पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व सांसद व अन्य वरिष्ठ नेताओं की मतदाताओं पर पकड़ नहीं रही है। स्वयं गुलाम नबी आजाद 1980 व 1984 में महाराष्ट्र के वाशिम के अलावा कहीं से भी चुनाव नहीं जीत सके। ऐसे में उनको पार्टी लगातार लंबे समय तक राज्यसभा के जरिए संसद में भेजती रही। जब भी केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी तो उनको मंत्री बनाया। इसके अलावा पार्टी ने उनको जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री भी बनाया। मगर उन सब बातों को भुलाकर आजाद आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर तारीफ कर अपनी पार्टी लाईन का उल्लंघन कर रहे हैं।

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव मुकुल वासनिक को भी चुनाव जीते बरसों बीत चुके हैं। रेणुका चौधरी का तो अपना कोई जनाधार ही नहीं है। वह पहले तेलुगू देशम में फिर कांग्रेस में आकर सांसद व मंत्री बनती रहीं। अब लगातार चुनाव हार जाने के बाद उनको पार्टी की चिंता सताने लगी है। जबकि उनके कार्यक्षेत्र तेलंगाना, आंध्र प्रदेश में कांग्रेस समाप्त-सी हो गई है। एम. वीरप्पा मोइली कभी कर्नाटक में मुख्यमंत्री व केंद्र में मंत्री हुआ करते थे मगर अब वो प्रभावहीन हो गए हैं। राजेंद्र कौर भट्ठल का पंजाब व पृथ्वीराज चौहान का महाराष्ट्र के मतदाताओं पर प्रभाव नहीं रहा है।

आनंद शर्मा अभी राज्यसभा में पार्टी के उपनेता हैं। वह मनमोहन सिंह की दोनों सरकारों में प्रभावशाली मंत्री रह चुके हैं। पार्टी ने उनको कई बार राज्यसभा में भेजा। कांग्रेस ने पिछली बार तो उनका राजस्थान से राज्यसभा का 6 महीने का कार्यकाल बाकी रहने के बावजूद भी उनको राजस्थान की सीट से इस्तीफा दिलवा कर हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनवाया गया था। क्योंकि उनके राजस्थान से पुनः निर्वाचित होने की संभावना नहीं थी। आनंद शर्मा ने अपने जीवन में कभी कहीं से वार्ड मेंबर का भी चुनाव नहीं लड़ा है। इसके बावजूद भी वह कांग्रेस में राष्ट्रीय नेता बने हुए हैं।

लगातार विवादों में घिरे रहने के बावजूद भी शशि थरूर को पार्टी लोकसभा का टिकट भी देती है और सरकार बनने पर मंत्री भी बनाती है। इसके बावजूद भी वह पार्टी से असंतुष्ट हो रहे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रयासों से मनीष तिवारी लोकसभा का चुनाव जीत पाए थे। मनमोहन सिंह की सरकार में उनको सूचना प्रसारण मंत्री भी बनाया बनाया गया था। कपिल सिब्बल के लोकसभा चुनाव हार जाने के बावजूद उनको उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में भेजा गया था। माना कि वह देश के एक बड़े वकील हैं मगर उनके बयानों से पार्टी को खासा नुकसान भी उठाना पड़ता है। मध्य प्रदेश के विवेक तंखा को भी पार्टी ने पिछले दिनों राज्यसभा में भेजा था। आज वही पार्टी से असंतुष्ट हो रहे हैं।

शीला दीक्षित के पुत्र होने के कारण संदीप दीक्षित दो बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। अब उनका कोई राजनीतिक वजूद नहीं बचा है। अरविंदर सिंह लवली दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार में मंत्री व दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं। दल बदल कर वो भाजपा में शामिल हो गए थे। मगर वहां तवज्जो नहीं मिलने के कारण फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए। मगर यहां आकर असंतुष्ट गुट के साथ जुड़े हुए हैं। जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद कांग्रेस के बड़े नेता थे। पिता के नाम के सहारे ही कांग्रेस में उनको आगे बढ़ने का मौका मिला था। मगर दो बार लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद उनका जनाधार खत्म हो गया है। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी के सक्रिय होने के बाद वह खुद को कांग्रेस की राजनीति में अनफिट महसूस कर रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव से पूर्व उनके पार्टी छोड़ने की चर्चा भी चली थी। मगर अभी तक वह पार्टी में बने हुए हैं।

मिलिंद देवड़ा महाराष्ट्र से एकमात्र राज्य सभा सीट से सांसद बनना चाहते थे। मगर राहुल गांधी ने अपने निकटस्थ राजीव सातव को राज्यसभा में भेज दिया। उसके बाद मिलिंद देवड़ा पार्टी से नाराज चल रहे हैं। ग्रुप-23 के सभी नेताओं ने हाल ही में जम्मू में एक दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया था। जिसमें ग्रुप के सभी 23 नेता शामिल हुए थे। वहां उन्होंने मीडिया के सामने खुलकर कांग्रेस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि हम चाहते हैं कि कांग्रेस पार्टी में मौजूदा कार्यप्रणाली में बदलाव किया जाये ताकि पार्टी फिर से मजबूत हो और जनता में खोया अपना जनाधार हासिल कर सकें। कुल मिलाकर कांग्रेस के बागी नेता कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व पर दबाव बना कर अपना प्रभाव बनाये रखना चाहते हैं।

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