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भारतीय संस्कृति

वैदिक व्यवस्था और भारतीय राजनीति

माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: और भारत की राजनीति

भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति ने वेद और वैदिक संस्कृति को अछूत बनाकर रख दिया है । संविधान भी वेद की छाया से दूर रखने का हरसंभव प्रयास किया गया है। जिससे पता चलता है कि भारत की संविधान सभा में भी ऐसे लोग नहीं थे जो वेद को सृष्टि का आदी संविधान मानते थे , उन लोगों का चिंतन वैदिक नहीं था । राष्ट्र और राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्यों की हमारे संविधान में ऐसी विशद और सुन्दर विवेचना या व्यवस्था नहीं की गई जिससे लोग मुमूर्षु के स्थान पर मुमुक्षु बनने का प्रयास करते और सृष्टि के संचालन में अपने स्थान पर खड़े होकर महत्वपूर्ण और सकारात्मक सहयोग प्रदान करते।

देश के शासन की उल्टी चाल और उल्टी दिशा पकड़ लेने से धर्मनिरपेक्षता नाम का एक ऐसा महारोग देश में पैदा किया गया, जिसने देश की सामाजिक ,राजनीतिक और आर्थिक अवस्था का सत्यानाश कर दिया । अथर्ववेद के मन्त्र 12 /1 / 12 “ माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: ” के अर्थ को हमने न तो समझा और न उसके अनुसार अपने राष्ट्रीय जीवन स्वरूप को कोई दिशा प्रदान की। जिससे हम सभी देशवासियों का अपने राष्ट्र, भारत माता, राष्ट्रवाद, पृथ्वी और पृथ्वी पर रहने वाले जीवधारियों के प्रति वह समरस संबंध स्थापित नहीं हो पाया जिसकी सृष्टि के आदि संविधान वेद ने हमसे अपेक्षा की थी। यही कारण है कि आज सारे भूमंडल की व्यवस्था गड़बड़ा चुकी है । हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि भारत के सुधरने से विश्व सुधरेगा और भारत के बिगड़ने से विश्व बिगड़ेगा ।
वेद का सन्देश है- “यत् ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं, यास्ते ऊर्जस्तन्व: संबभूवु:, तासु नो धे”
यभि न: पवस्व, माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:, पर्जन्य: पिता स उ न: पिपर्तु”, अर्थात “हे पृथ्वी, यह जो तुम्हारा मध्यभाग है और जो उभरा हुआ ऊधर्वभाग है, ये जो तुम्हारे शरीर के विभिन्न अंग ऊर्जा से भरे हैं, हे पृथ्वी मां, तुम मुझे अपने उसी शरीर में संजो लो और दुलारो कि मैं तो तुम्हारे पुत्र के जैसा हूं, तुम मेरी मां हो और पर्जन्य का हम पर पिता के जैसा साया बना रहे।”
अपनी धरती माता को हमने राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया ।इसका अभिप्राय है कि संपूर्ण वसुधा ही हमारे लिए राष्ट्र है। राष्ट्र की इतनी उत्कृष्ट और उत्तम परिभाषा संसार के किसी भी संविधान या वेद से इतर किसी ग्रंथ में उपलब्ध नहीं होगी। जिसमें संपूर्ण वसुधा को मातृवत सम्मान दिया जाए और अपने आपको प्रत्येक व्यक्ति उसका पुत्र समझकर प्रस्तुत कर दे। स्वतंत्रता के पश्चात सत्ता जिन लोगों के हाथों में गई उन्होंने वेद की इतनी सहज ,सरल और निर्मल विचारधारा को भी सांप्रदायिक करार दे दिया और वेद की तथाकथित सांप्रदायिक शिक्षाओं से दूरी बनाने में ही देश ,समाज और संसार का भला समझा । अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का इससे अधिक निकृष्ट उदाहरण भारत से अलग संसार के किसी अन्य देश में मिलना असंभव है।
स्वतंत्रता के पश्चात सत्ता संभालने वाले हमारे तथाकथित राजनेता यह भूल गए कि भारत माता या धरती माता के प्रति ऐसा पवित्र संबंध रखने के कारण ही भारतवासियों ने दीर्घकाल तक विदेशी शत्रुओं के आक्रमणों का सामना किया था। उन्होंने यह कदापि उचित नहीं समझा था कि संसार के राक्षस लोग धरती माता और उसकी संतानों को परेशान करने का अधिकार पत्र प्राप्त करें और लोगों पर अत्याचार करें।
हमारे पूर्वजों ने हमेशा इस बात को ध्यान में रखा कि ईश्वर ने यह भूमि आर्यों को प्रदान की है और आर्यों का यह पवित्र जीवनव्रत है कि वे राक्षसों का संहार और सज्जनों का परिरक्षण करने के लिए संकल्पित हैं।
जो लोग सांप्रदायिक थे उन लोगों ने देश का सांप्रदायिकता के आधार पर विभाजन कराकर अपना मनचाहा देश ले लिया। उसके पश्चात भी उनकी सांप्रदायिक राजनीति को सांप्रदायिक कहने का साहस कांग्रेस ,कम्युनिस्ट और सभी धर्मनिरपेक्ष दलों ने कभी नहीं किया । यही कारण है कि देश को तोड़ने वाली राजनीतिक शक्तियां आज भी सक्रियता के साथ काम कर रही हैं।
बात पश्चिमी बंगाल के चुनावों की करें तो वहां पर अब्बास सिद्दीकी और असदुद्दीन ओवैसी दोनों खुल्लम-खुल्ला मुस्लिमपरस्त राजनीति कर रहे हैं। इन दोनों मुस्लिमपरस्त राजनीतिज्ञों को जिस प्रकार तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल अपने -अपने पाले में लाने का प्रयास करते रहे हैं या कर रहे हैं उन सारी गतिविधियों और कार्यशैली की यदि छानबीन व पड़ताल करने पर पता चलता है कि ये सारे लोग देश विरोधी सोच को और भी अधिक हवा देने का कार्य कर रहे हैं।
हम सब यह जानते हैं कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का नाम ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन है। जिससे किसी भी प्रकार से ऐसी राजनीति की अपेक्षा नहीं की जा सकती जो पंथनिरपेक्ष हो और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती हो। असदुद्दीन ओवैसी के भड़काऊ बयान देश के समाचार पत्रों में अक्सर स्थान पाते रहते हैं । इसके अतिरिक्त वह अपने प्रत्याशी उन्हीं स्थानों पर उतारते हैं जहां पर मुस्लिम अधिक होते हैं, इससे भी स्पष्ट पता चलता है कि उनकी सोच पूर्णतया सांप्रदायिक है। अब्बास सिद्दीकी और असदुद्दीन ओवैसी जैसे लोग कभी भी वेद की उपरोक्त व्यवस्था के अंतर्गत भारत माता को माता मानने या इस देश की भूमि के साथ माता और पुत्र का संबंध स्थापित करने के समर्थक ना तो हैं और ना हो सकते हैं। क्योंकि राष्ट्रमाता के प्रति ऐसी सहज, सरल और निर्मल विचारधारा रखने में भी उनकी सांप्रदायिक मान्यताएं आड़े आ जाती हैं। ये लोग जिन्ना के वंशज हैं या कहिए कि उसके मानस पुत्र हैं । जिस कारण वह मां भारती के टुकड़े तो कर सकते हैं पर इसकी संतानों के साथ समन्वय बनाकर चलने की कभी पहल नहीं कर सकते। ये लोग ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ के समर्थक हो सकते हैं परंतु देश को जोड़ने वाले लोगों का साथ कभी नहीं दे सकते।
सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि देश को तोड़ने वाली शक्तियों के साथ कांग्रेस आज भी बड़ी निर्लज्जता के साथ खड़ी है और उसने इतिहास से कोई शिक्षा न लेकर पश्चिम बंगाल में पीरजादा सिद्दीकी के साथ समन्वय या गठबंधन करने को प्राथमिकता दी है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी अब देश में उन स्थानों को ढूंढने और चुनने लगे हैं जहां मुस्लिम अधिक हैं। राहुल गांधी यह जानते हैं कि देश की वर्तमान परिस्थितियों में देश का जनमानस उन्हें नकार चुका है। अभी हाल ही में गुजरात में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में कांग्रेस का लोगों ने जिस प्रकार सूपड़ा साफ किया है उससे इस बात में अब कोई संदेह नहीं रह गया है कि लोग स्थानीय स्तर पर भी कांग्रेस को नकार रहे हैं। ऐसे में अपनी राजनीति को बचाने के लिए कांग्रेस के नेता अपनी परंपरागत देश विरोधी सोच को स्पष्टता के साथ प्रकट करने लगे हैं।
याद रहे कि कांग्रेस भी देश के भूभाग को राष्ट्रमाता या भारत माता कहने में सदा संकोच करती रही है। इसका कारण केवल एक ही है कि कांग्रेस के नेता प्रारंभ से ही भारतीय और भारतीयता से असहमति और विरोध रखने वाले रहे हैं। उनसे वेद, वैदिक संस्कृति और वैदिक देश के बारे में सोचने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कांग्रेस के बारे में हमें यह भी याद रखना चाहिए कि वह कभी आंध्र प्रदेश में मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के साथ भी काम कर चुकी है। मजलिस ने 2012 में हैदराबाद में चारमीनार के निकट एक मंदिर के जीर्णोद्धार से असंतुष्ट होकर कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था। केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ भी कांग्रेस का गठबंधन है। जी हां , यह वही मुस्लिम लीग है जिसने कभी देश का विभाजन कराया था । कांग्रेस को इस मुस्लिम लीग के साथ भी गठबंधन करने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है, क्योंकि वह उसे आज भी धर्मनिरपेक्ष मानती है। राहुल गांधी पिछले लोकसभा चुनाव में जिस वायनाड सीट से लोकसभा चुनाव जीत कर आए हैं, वहां पर वह मुस्लिम लीग के समर्थन से ही अपनी जीत को साकार कर सके थे । ऐसे में राहुल गांधी के ऊपर मुस्लिम लीग का आशीर्वाद है – इससे इनकार नहीं किया जा सकता। जैसा काम मुस्लिम लीग के साथ मिलकर कांग्रेस कर रही है वैसा ही देश के कम्युनिस्ट भी करते रहे हैं और कर रहे हैं। वह भी तमिलनाडु में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ रहे हैं।
हमारे वेदों ने जिस प्रकार पृथ्वी से हम सभी पृथ्वी वासियों का रक्त संबंध स्थापित किया है, वह अपने आप में अनुपम और बहुत ही विलक्षण है। यह उतना ही पवित्र है जितना हमारे माता-पिता से हमारा संबंध पवित्र होता है । जैसे हम उनके प्रति अपने कर्तव्य धर्म से बंधे हुए हैं, वैसा ही कर्तव्य धर्म हमारे ऋषियों ने हमें अपनी पृथ्वी माता के प्रति सिखाया और बताया है। पृथ्वी माता के प्रति इसी अगाध श्रद्धा और रक्त संबंध से प्रेरित होकर हम कभी भी अपनी भारत माता का अपमान सहन नहीं करते। उसके प्रति हमारा आदर और सत्कार का यह भाव हमें सृष्टि के पहले दिन से प्राप्त हुआ है । जिसे अपने देश का मौलिक संस्कार स्वीकार कर हम आज तक भी अपने साथ बनाए हुए हैं। यद्यपि पिछले 70 -75 वर्ष में हमें इस अनुपम और विलक्षण सत्कार भाव से दूर रखने का हरसंभव प्रयास देश के धर्मनिरपेक्ष दलों के द्वारा शासकीय स्तर पर भी किया गया है।
12/01/09 “यस्यामाप: परिचरा समानी: अहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति, सा नो भूमिर्भूरिधारा पयोदुहा अथो उक्षतु वर्चसा” विद्वानों ने इस मंत्र का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा है कि ऋषि इस विचार से अभिभूत है कि कैसे इस भूमि पर दिन-रात जल की प्रभूत धाराएं बिना किसी प्रमाद के लगातार बहती रहकर उसे वर्चस्व से सम्पन्न कर रही हैं। सूक्त में ऋषि ने सचमुच भूमि के साथ मां का नाता जोड़ लिया है और उससे वैसे ही दूध की कामना कर रहा है जैसे कोई शिशु अपनी मां से दूध की कामना करता है-
“सा नो भूमिर्विसृजतां माता पुत्रय मे पय:” (१२.१.१०), अर्थात यह भूमि मेरे लिए वैसे ही दूध (पय:) की धारा प्रवाहित करे, जैसे मां अपने पुत्र के लिए करती है !
अब समय आ गया है जब राजनीति से उन लोगों को दूर किया जाए जो तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इस देश के टुकड़े करने की किसी भी प्रकार की सोच को या तो समर्थन देते हैं या समर्थन देने का अप्रत्यक्ष प्रयास करते हैं। केन्द्र सरकार को अब वेदों की शिक्षाओं को उनके सहज, सरल और निर्मल स्वरूप में विद्यालयों के माध्यम से भी बच्चों में राष्ट्रीय संस्कार स्थापित करने हेतु पढ़ाये जाने की व्यवस्था करनी चाहिए । जिससे राष्ट्र और भारत माता के प्रति बच्चों में संस्कार बचपन से ही स्थापित किये जा सकें और सिद्दीकी और ओवैसी जैसे लोग राजनीति में आकर अपनी राजनीतिक भाषा को शुद्ध कर सकें।
कांग्रेस, कम्युनिस्ट और सभी धर्मनिरपेक्ष दलों की कार्यशैली को सुधारकर सुव्यवस्थित करने के लिए भी यह आवश्यक है कि अब देश के नागरिक ही अपनी भारत माता के प्रति अपने कर्तव्य धर्म को समझते हुए उनका राजनीतिक बहिष्कार करें। यह कार्य तभी संभव होगा जब वेद की शिक्षाएं हमारे पाठ्यक्रमों में शामिल की जाएंगी।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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