एक क्रांतिकारी जिसने जेल में कील और कोयले से लिखी 10000 पंक्तियां

veersavarkar

राजस्थान की वर्तमान काँग्रेस सरकार ने पिछली भाजपा सरकार के कई निर्णयों को बदल दिया है, जैसे— योग दिवस का निषेध और इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में व्यापक फेर-बदल। कक्षा 10 की इतिहास की पाठ्यपुस्तक में विनायक दामोदर सावरकर की जीवनीवाले हिस्से में बदलाव इसी का परिणाम है। तीन साल पहले भाजपा सरकार के दौरान तैयार पाठ्यक्रम में विनायक दामोदर सावरकर को वीर, महान् देशभक्त और महान् क्रान्तिकारी बताया गया था। किन्तु अब नये सिरे से तैयार स्कूली पाठ्यक्रम में उन्हें वीर नहीं, बल्कि जेल की यातनाओं से परेशान होकर ब्रिटिश सरकार से माफ़ी माँगनेवाला बताया गया है।

किसी राजनीतिक दल द्वारा किसी अन्य दल के प्रेरणा-स्रोत महापुरुष का अनादर, दुर्भावना से प्रेरित है। दलीय विचारधारा अपनी जगह होती है और उसके लिए राष्ट्रीय महापुरुष को नीचा नहीं दिखाना चाहिये। यह हरकत अन्य राजनीतिक दलों को काँग्रेसी स्वाधीनता सेनानियों को नीचा दिखाने के लिए प्रेरित करती है।

विनायक दामोदर सावरकर निर्विवाद रूप से एक महान् स्वाधीनता सेनानी थे। जैसे बाल गंगाधर तिळक को ‘लोकमान्य’, लाला लाजपत राय को ‘पंजाब केसरी’ और मालवीय जी को ‘महामना’ की उपाधि दी गई थी, वैसे ही सावरकर को स्वातन्त्र्यवीर की उपाधि से नवाज़ा गया था। सावरकर, हिंदू महासभा के बड़े नेता थे और उसके अध्यक्ष भी रहे थे। अण्डमान की सेल्युलर जेल में 50 वर्ष के कालेपानी की सज़ा उनको मिली थी। असंख्य क्रान्तिकारियों के वह प्रेरणा-स्रोत थे। उनकी लिखी पुस्तक ‘सन् 1857 का प्रथम स्वातन्त्र्य समर’, क्रान्तिकारियों के लिए भगवद्गीता के समान पूजनीय थी। सावरकर ने अनेक क्रान्तिकारियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिलवाकर अनेक अंग्रेज़ों का वध करवाया था। वह राजनीति के हिंदूकरण तथा हिंदुओं के सैनिकीकरण के प्रबल पक्षधर थे। इसीलिए काँग्रेस और महात्मा गाँधी से उनके मतभेद थे। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि सावरकर की देशभक्ति संदिग्ध है। इतिहास में उचित स्थान न देकर उनकी देशभक्ति संदिग्ध अवश्य कर दी गयी। यहाँ इस लेख में हम देखेंगे कि विनायक दामोदर सावरकर ने देश के लिए कितना बड़ा योगदान दिया था।

महान् क्रान्तिकारी, सिद्धस्त लेखक, दार्शनिक, भाषाविद्, ओजस्वी वक्ता और समर्पित समाजसुधारक विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 को नासिक जिले के भगूर ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम दामोदर पंत सावरकर और माता का नाम राधाबाई था। दामोदर पंत अंग्रेज़ी के अच्छे जानकार थे। लेकिन वह अपने बच्चों को अंग्रेज़ी के साथ-साथ रामायण, महाभारत, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी आदि महापुरुषों के प्रसंग भी सुनाया करते थे। सावरकर का बचपन भी इन्हीं बौद्धिक वातावरण में बीता। सावरकर अल्पायु से ही निर्भीक होने के साथ-साथ बौद्धिक रूप से भी संपन्न थे। 1892 में नौ वर्ष की आयु के थे जब माता का स्वर्गवास हो गया। 1898 में पिता भी नहीं रहे। 1901 में यमुनाबाई (1888-1963) से उनका विवाह हुआ।

शिक्षा :
विनायक सावरकर ने शिवाजी हाईस्कूल, नासिक से 1901 में मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की। 1902 में उन्होंने पूना के फग्र्युसन कॉलेज़ में दाखि़ला लिया। दिसम्बर, 1905 में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तिळक की अनुशंसा पर 1906 में उन्हें श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृत्ति मिली। जून, 1906 में वह वकालत की पढ़ाई के लिए लन्दन गये। वहाँ उन्होंने बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण की, किन्तु इंग्लैण्ड के सम्राट् की शपथ लेने से इनकार कर दिया, जिसके कारण उनको प्रैक्टिस करने से अनुमति नहीं मिली।

क्रान्तिकारी गतिविधियों में योगदान :
वीर सावरकर भारत और भारतेतर देशों में रह रहे असंख्य क्रान्तिकारियों के प्राण-प्रेरक थे। पूना में पढ़ने के दौरान भी वह राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत ओजस्वी भाषण देते थे। उन्होंने ‘मित्र मेला’ नामक एक गुप्त क्रान्तिकारी संगठन बनाया था। पहली बार नवम्बर, 1905 में उन्होंने ही पूना में विदेशी वस्त्रों की होली जलायी। 10 मई, 1907 को सावरकर ने इंडिया हाउस, लन्दन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाई। इस अवसर पर उन्होंने अपने ओजस्वी भाषण में प्रमाणों सहित 1857 के संग्राम को ‘ग़दर’ नहीं, अपितु भारत का प्रथम स्वातन्त्र्य संग्राम सिद्ध किया। लन्दन में रहने के दौरान सावरकर की मुलाकात महान् क्रान्तिकारी और पत्रकार लाला हरदयाल (1884-1939) से हुई। 01 जुलाई, 1909 को लन्दन में मदनलाल धींगरा (1883-1909) ने वीर सावरकर की ही प्रेरणा से कर्जन वाइली का वध किया था। धींगरा को फांसी दिए जाने के बाद उन्होंने ‘लन्दन टाइम्स’ में भी एक लेख लिखा था। उन्होंने धींगरा के लिखित बयान के पर्चे भी बांटे थे।

अण्डमान में कालेपानी की सज़ा :
सन् 1909 में नासिक के कलेक्टर ए.एम.टी. जैक्सन का वध, क्रान्तिकारी अनन्त कान्हेरे (1892-1910) द्वारा सावरकर की प्रेरणा से हुआ था। इस घटना में उनकी संलिप्तता जानकर ब्रिटिश सरकार ने 13 मार्च, 1910 को उन्हें लन्दन के विक्टोरिया स्टेशन पर गिरफ़्तार कर लिया। वह समुद्री मार्ग से ‘मोरिया’ नामक जहाज से भारत लाए जा रहे थे कि तभी 8 जुलाई, 1910 को उन्होंने फ्रांस के मार्सेलिस बन्दरगाह से जहाज से समुद्र में छलांग लगा दी थी। किन्तु दुर्भाग्य से वह पकड़ लिए गये और उनपर हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा चला। 1911 में मात्र 27 वर्ष की आयु में, उन्हें दो आजन्म कारावास (कुल 50 वर्ष) की सज़ा हुई थी। ब्रिटिश साम्राज्य के इतिहास में वह एकमात्र व्यक्ति थे, जिसे दो बार आजीवन कारावास की सज़ा दी गई थी। सजा मिलने के बाद उनका जवाब था कि ‘ब्रिटिश सरकार ने हिंदुत्व के पुनर्जन्म के सिद्धान्त को तो माना’। उनको अण्डमान के 698 कमरों की सेल्युलर जेल में 13.5 गुणा 7.5 फीट की कोठरी-नंबर 52 में रखा गया। जेल में पहुँचने पर जेलर ने उनका यह कहकर स्वागत किया कि ‘50 सालों के बाद तुम यहाँ से मरकर ही बाहर निकलोगे’। तब सावरकर ने कहा था कि ‘क्या अगले पचास साल तक अंग्रेज़ भारत पर शासन कर सकेंगे?’ (उल्लेखनीय है कि सावरकर की इस भविष्यवाणी के 36 साल के बाद देश स्वाधीन हो गया था)। अण्डमान की जेल में 1911 से 1921 तक सावरकर ने 11 वर्ष कठोर कारावास में बिताए। उसी जेल में उनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर (1879-1945) भी बन्द थे। जेल में उन्हें भयंकर यातनाएँ दी गयीं। कोल्हू में जोतकर तेल निकालना, नारियल कूटना, कोड़ों की मार, भूखे-प्यासे रखना, कई दिन तक लगातार खड़े रखना, हथकड़ी और बेड़ी में जकड़ना-जैसी यातनाएँ इन्हें हर दिन ही झेलनी पड़ती थीं। विनायक सावरकर ने अण्डमान में पचास वर्ष व्यतीत करके जीवन नष्ट करना व्यर्थ समझा और यह विचार किया कि जेल से बाहर रहकर ही देश के लिए कुछ सार्थक किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने अंग्रेज़ सरकार को क्रान्तिकारी और राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने के झूठे आश्वासन की कूटनीतिक चाल चली। फलस्वरूप 21 मई, 1921 को अंग्रेज़ों ने उन्हें अण्डमान से मुक्त करके भारत की मुख्य भूमि में वापस भेज दिया। भारत पहुँचकर भी वह अलीपुर, यरवदा और रत्नागिरि की जेलों में रखे गये। 1924 में उन्हें यरवदा जेल से मुक्त कर दिया गया। वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के 6 बार अध्यक्ष चुने गये। काँग्रेस की अहिंसा-नीति के वह कठोर आलोचक थे।

सिद्धहस्त लेखक और इतिहासकार :
सावरकर ने बचपन में ही कविताएँ लिखनी शुरू कर दी थीं। वह अंग्रेज़ी एवं मराठी के सिद्धहस्त कवि, उपन्याकार और इतिहासकार थे। उन्होंने मराठी में 10,000 से अधिक और अंग्रेज़ी में 1,500 से अधिक पृष्ठ लिखे। ‘इण्डियन सोशियोलॉजिस्ट’ और ‘तलवार’ में उन्होंने अनेक लेख लिखे, जो बाद में कलकत्ते के ‘युगांतर’ में भी छपे। सावरकर दुनिया के ऐसे पहले कवि थे जिन्होंने अंडमान के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएं लिखीं और फिर उन्हें याद किया। इस प्रकार याद की हुई 10 हजार पंक्तियों को उन्होंने वर्षों तक स्मरण रखा और जेल से छूटने के बाद पुनः लिखा। 15 अप्रैल, 1938 को वह ‘मराठी साहित्य सम्मेलन’ के अध्यक्ष चुने गये। ‘हिंदुत्व’ नामक पुस्तक लिखकर सावरकर ने ही हिंदू राष्ट्रवाद को पारिभाषित किया। उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं: ‘मेरा आजीवन कारावास’, ‘कालापानी’, ‘मोपला’, ‘गोमान्तक’, ‘अंतज्र्वाला’, ‘हिंदूपदपादशाही’, ‘हमारी समस्याएँ’, इत्यादि।

वीर सावरकर ने भारतीय इतिहास पर अनेक मौलिक ग्रंथ लिखे। 1908 में सन् 1857 के युद्ध के 50 वर्ष व्यतीत होने के पश्चात् उन्होंने मराठी-भाषा में ‘1857 का भारतीय स्वातन्त्र्य समर’ नामक खोजपूर्ण पुस्तक लिखी थी। अंग्रेज़ी में यह पुस्तक ‘द इण्डियन वॉर ऑफ़ इण्डिपेंडेंस’ शीर्षक से प्रकाशित हुई, जिसमें लेखक का नाम था- ‘एन इण्डियन नेशनलिस्ट’। इस पुस्तक को उसके प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबन्धित कर दिया गया था। 1946 तक यह पुस्तक प्रतिबन्धित रही। इसी प्रकार उन्होंने ‘भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ’ नामक एक श्रेष्ठ ग्रंथ लिखा। सावरकर का सम्पूर्ण साहित्य ‘सावरकर समग्र’ शीर्षक से 10 खण्डों में प्रकाशित हुआ है।

भाषाविद् और शब्दस्रष्टा :
सावरकर भाषाशुद्धि के प्रबल समर्थक थे और मराठी में उर्दू, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी के शब्दों के घोर विरोधी थे। उन्होंने ‘दिनांक’, ‘क्रमांक’, ‘उपस्थित’, ‘मध्यंतर’, ‘दिग्दर्शक’, ‘चित्रपट’, ‘नगरपालिका’, ‘महापालिका’, ‘महापौर’, ‘हुतात्मा’, ‘विशेषांक’, ‘दूरदर्शन’, ‘दूरध्वनि’, ‘क्रीड़ांगण’, ‘प्राचार्य’, ‘मुख्याध्यापक’, ‘प्राध्यापक’, ‘परीक्षक’, ‘स्थानक’, ‘सेवानिवृत्त’, ‘वेतन’, इत्यादि अनेक नये शब्दों का निर्माण करके मराठी शब्द-भण्डार को भरा। उनके दिए शब्द हिंदी में भी व्यवहृत होते हैं।

महान् समाजसुधारक :
सावरकर जी जाति-पाँति और छुआ-छूत के घोर विरोधी थे। जातिवाद और अश्पृश्यता का जैसा विरोध वीर सावरकर ने किया था, वैसा तो कॉंग्रेस और महात्मा गाँधी ने भी नहीं किया। सावरकर जी ने सवर्ण एवं दलित— दोनों के लिए लिए फरवरी, 1931 में बम्बई में ‘पतितपावन मन्दिर’ की स्थापना की, जिससे सभी एक स्थान पर साथ-साथ पूजा कर सकें। पतितपावन मंदिर का उद्घाटन स्वयं शंकराचार्य श्री कुर्तकोटि के हाथों से हुआ एवम् उनकी पाद्यपूजा चमार नेता श्री राज भोज द्वारा की गयी थी। सावरकर जी ने घोषणा की कि इस मन्दिर में समस्त हिंदुओं को पूजा का अधिकार है और पुजारी पद पर गैर-ब्राह्मण की नियुक्ति होगी। मन्दिर-स्थापना के साथ सावरकर जी ने सवर्णों के अछूतों के साथ बड़े-बड़े सहभोज और पूजा-पाठ जैसे आयोजन किए, जिनसे अस्पृश्यता-निवारण को काफ़ी बल मिला। 25 फरवरी, 1931 को उन्होंने बॉम्बे प्रेसीडेंसी अस्पृश्यता उन्मूलन सम्मेलन की अध्यक्षता की। 26 अप्रैल, 1931 को वह पतितपावन मंदिर के परिसर में सोमवंशी महार परिषद् के अध्यक्ष बनाए गये। 1934 में मालवान में सावरकर जी की अध्यक्षता में अछूत बस्ती में चायपान, भजन-कीर्तन, अछूतों को यज्ञोपवीत संस्कार, विद्यालय में समस्त जाति के बच्चों को बिना किसी भेदभाव के बैठाना, सहभोज आदि हुए। 1937 में रत्नागिरि से जाते समय सावरकर जी के विदाई समारोह में समस्त भोजन अछूतों द्वारा बनाया गया जिसे सभी सवर्णों-अछूतों ने एकसाथ ग्रहण किया था।

सावरकर जी ने हिन्दू समाज में व्याप्त सात बन्दियों का विरोध किया और उनके उन्मूलन में अपना जीवन खपा दिया : 1. स्पर्शबंदी (निम्न जातियों का स्पर्श तक निषेध, अस्पृश्यता), 2. रोटीबंदी (निम्न जातियों के साथ खानपान निषेध), 3. बेटीबंदी (ख़ास जातियों के संग विवाह-सम्बन्ध निषेध), 4. व्यवसायबंदी (कुछ निश्चित व्यवसाय निषेध), 5. सिंधुबंदी (सागरपार यात्रा, व्यवसाय निषेध), 6. वेदोक्तबंदी (वेद के कर्मकाण्डों का एक वर्ग को निषेध) और 7. शुद्धिबंदी (किसी को वापस हिन्दूकरण पर निषेध)

अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा :
सावरकर ने मु. अली जिन्ना (1876-1948) के द्विराष्ट्रवाद का घोर विरोध किया था। 15 अगस्त, 1947 को उन्होंने ‘सावरकर सदन’ में भारतीय तिरंगा एवं भगवा, दो-दो ध्वजारोहण किये। इस अवसर पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने पत्रकारों से कहा कि ‘‘मुझे स्वराज्यप्राप्ति की प्रसन्नता है, परन्तु वह खण्डित है, इसका दुःख है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘राज्य की सीमाएँ नदी तथा पहाड़ों या सन्धि-पत्रों से निर्धारित नहीं होतीं, वे देश के नवयुवकों के शौर्य, धैर्य, त्याग एवं पराक्रम से निर्धारित होती हैं।’’

मई, 1952 में पूने की एक विशाल सभा में उन्होंने ‘अभिनव भारत सोसायटी’ संगठन को उसके उद्देश्य (भारतीय स्वतन्त्रताप्राप्ति) पूर्ण होने पर भंग कर दिया। 10 मई, 1957 को नयी दिल्ली में आयोजित हुए, 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के शताब्दी समारोह में वह मुख्य वक्ता रहे। 08 अक्टूबर, 1956 को पूना विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘डी.लिट्.’ की मानद उपाधि से अलंकृत किया।

अन्तिम दिन
सितम्बर, 1965 में उन्हें तेज ज्वर ने आ घेरा और वह गम्भीर रूप से बीमार पड़ गये। 1 फरवरी, 1966 को उन्होंने आमरण अनशन करने का संकल्प लिया और 26 फरवरी, 1966 को प्रातः 10:30 बजे 83 वर्ष की आयु में देह त्याग दिया। उनके देहावसान के बाद संघ के 2,500 पूर्ण गणवेशधारी स्वयंसेवकों ने उनको ‘गार्ड ऑफ़ ऑनर’ दिया था।

आज विनायक दामोदर सावरकर हमारे मध्य नहीं हैं, किन्तु अपनी प्रखर राष्ट्रवादी सोच से वह हमेशा हमारे मध्य रहेंगे। यह सावरकर की ही देन है कि ‘हिंदुत्व’, ‘हिंदुस्थान’, ‘हिंदू राष्ट्र’-जैसे शब्द आज देश के करोड़ों भारतवासियों के दिलों में जीवित हैं।
(साभार)

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