हमें संसार के स्वामी ईश्वर की वेदाज्ञाओं का पालन करना चाहिए

हम परमात्मा के बनाये हुए इस संसार में रहते हैं। इस संसार के सूर्य, चन्द्र, पृथिवी सहित पृथिवी के सभी पदार्थों, वनस्पतियों एवं प्राणी जगत को भी परमात्मा ने ही बनाया है। हमारा जन्मदाता, पालनकर्ता तथा मुक्ति सुखों सहित सांसारिक सुखों का दाता भी परमात्मा ही है। यह सिद्धान्त सत्य वैदिक सिद्धान्त है जिसका अध्ययन कर प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। इस सिद्धान्त को जान लेने के बाद सभी मनुष्यों का कर्तव्य होता है कि वह अपने सभी कार्य व आचरण ईश्वर द्वारा वेदों में की गई परमात्मा की शिक्षाओं, प्रेरणाओं व आज्ञाओं के अनुसार करें। ऐसा करने पर ही मनुष्य सुखी रहकर जीवन के उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति तथा बल प्राप्ति सहित जन्म व मरण के बन्धनों से मुक्ति को प्राप्त हो सकता है। मनुष्य यदि परमात्मा की वेदाज्ञाओं के विपरीत आचरण करता है तो वह परमात्मा की व्यवस्था से दण्ड प्राप्ति का अधिकारी होता है। यह दण्ड दुःख व रोग सहित भावी जन्मों में मनुष्य योनि के स्थान पर नाना पशु, पक्षी आदि योनियों में जन्म के रूप में भी हो सकता है। अतः मनुष्य को इस संसार के स्वामी परमात्मा की मनुष्यों को की गई आज्ञाओं का अध्ययन करने हेतु वेद व वेदानुकूल ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, चतुर्वेद भाष्य, पंचमहायज्ञविधि, व्यवहारभानु आदि हमें परमात्मा की वेदाज्ञाओं से परिचित कराते हैं। वेद व प्रामाणिक वेदभाष्यों सहित उपनिषद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति आदि ग्रन्थों का अध्ययन कर भी ईश्वर की आज्ञाओं को जाना जाता है। इसके लिए सरलतम व सुलभ साधन तो सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन ही प्रतीत होता है। इसका कारण इस ग्रन्थ का आर्यभाषा हिन्दी में होना तथा इसके अनेक भाषाओं में अनुवादों का उपलब्ध होना भी है।

वेद मनुष्यों को ज्ञान प्राप्ति तथा सद्कर्म करने की प्रेरणा करते हैं। ज्ञान प्राप्ति वेद, उपनिषद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि एवं ऋषि दयानन्द ऋग्वेद एवं यजुर्वेद भाष्य के अध्ययन से मुख्यतः होती है। मनुष्य को पुरुषार्थ एवं तप से युक्त जीवन व्यतीत करना चाहिये। वेदों के आधार पर मनुष्यों के मुख्य पांच कर्तव्य बताये गये हैं। मनुष्य का प्रथम कर्तव्य स्वाध्याय व विद्वानों के उपदेशों से ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानना तथा वेद व ऋषियों द्वारा प्रवृत्त उपासना पद्धति से उपासना करना होता है। उपासना में ईश्वर के सत्य गुणों, कर्मों व स्वभावों के अनुरूप स्तुति तथा प्रार्थना आदि करना सम्मिलित होता है। स्वाध्याय एवं ईश्वर की स्तुति से मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है तथा उसके अभिमान व अहंकार में कमी आती है। उपासना से मनुष्य निरभिमानी बनता है। ईश्वर स्वयं अहंकार से रहित है अतः उनकी सन्तान होने के कारण हमें भी अभिमान से सर्वथा रहित होना चाहिये। ईश्वर में अनन्त गुण व कर्म हैं। इन गुणों का विचार व चिन्तन करने से हमारे गुण, कर्म व स्वभाव भी सुधरते व ईश्वर के गुणों के अनुरूप बनते हैं। मनुष्य के गुण, कर्म व स्वभाव का सुधरना ईश्वर की स्तुति तथा प्रार्थना का महत्वपूर्ण लाभ होता है। ईश्वर की प्रतिदिन प्रातः व सायं स्तुति, प्रार्थना व उपासना करने से मनुष्य ईश्वर का सच्चा उपासक बन जाता है। वह बिना ईश्वर की उपासना के रह नहीं सकता। उसमें उपासना की प्रवृत्ति उत्पन्न व प्रबल हो जाती है। उपासना में उसका मन लगने लगता है। ऐसा करने से वह अपकर्मों व पाप कर्मों से बचता भी है जिससे उसे वर्तमान व भावी जीवन में दुःख नहीं होते।

ईश्वर की उपासना करना मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य इसलिए भी होता है कि ईश्वर ने संसार व इसके सभी पदार्थ जीवों के सुख व उपभोग के लिए ही बनाये हैं। यदि ईश्वर संसार को न बनाता और हमें मानव शरीर न देता तो हम आत्मा को प्राप्त होने वाले सभी सुखों से वंचित होते। इतना महान उपकार ईश्वर ने हम पर अपनी अहेतुकी कृपा से किया है। हमसे कुछ लिया नहीं और न ही वह हमसे कुछ अपेक्षा करता है। ऐसा ईश्वर वस्तुतः अपने महान गुणों व उपकारों के कारण सब मनुष्यों का स्तुत्य व उपासनीय होता है। अतः कृतघ्नता से बचने व उपासना के लाभों को प्राप्त करने के लिए सभी मनुष्यों को प्रतिदिन प्रातः व सायं ईश्वर की उपासना अवश्य करनी चाहिये। इसे करने से मनुष्य को सत्यधर्म, शुद्ध अर्थ, पवित्र कामनाओं व मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष की प्राप्ति ही जीवात्मा का मुख्य उद्देश्य होता है। मोक्ष में जीवात्मा जन्म व मरण के बन्धनों, सभी दुःखों वा बार बार के आवागमन से मुक्त हो जाता है। जीवात्मा मोक्ष में ईश्वर के सान्निध्य में रहकर पूर्ण आनन्द का भोग करते हुए 31 नील वर्षों से अधिक अवधि तक आनन्द व सुख भोगता है। अतः सभी मनुष्यों को ऋषियों के अनुसार अपना जीवन बनाकर उपासना को महत्व देना चाहिये और अपना भविष्य सुधारना चाहिये।

मनुष्यों का वेदनिहित दूसरा प्रमुख कर्तव्य देवयज्ञ अग्निहोत्र का प्रातः व सायं अनुष्ठान करना होता है। ऐसा वायु, जल, अन्न व ओषधियों की शुद्धि के लिए किया जाता है। हम जानते हैं कि मनुष्य श्वास व प्रश्वास द्वारा दूषित वायु का त्याग करता है। मल मूत्र के त्याग से भी वायु, जल व भूमि में प्रदूषण होता है। चैका चक्की आदि के कार्यों से भी वायु प्रदुषण होता है। वायु व जल आदि की अशुद्धि से रोग उत्पन्न होते व स्वयं व अन्य मनुष्यों व प्राणियों को भी दुःख होता है। इस दोष के निवारणार्थ ऋषियों ने देवयज्ञ अग्निहोत्र करने का विधान किया है। देवयज्ञ में हम सुगन्धित गोघृत सहित ओषधियों, अन्न, मिष्ट व पुष्टिकारक पदार्थों की अग्नि में वेदमन्त्रों के उच्चारण के साथ आहुतियां देते हैं जिससे वायु एवं जल का शोधन होता है। वायु व जल के शोधन से अन्न भी उत्तम कोटि का उत्पन्न होता है। इन सब कार्यों से मनुष्य को स्वयं व दूसरे प्राणियों को भी सुखों की प्राप्ति होती है। देवयज्ञ करना पुण्य कर्म होता है। पुण्यकर्म वह होते हैं जिससे हम दूसरे प्राणियों को लाभ पहुंचाते हैं। ऐसा करने से हमें पुण्य मिलता व परमात्मा की व्यवस्था से जन्म-जन्मान्तर में सुख मिलने के साथ हमारे भावी जन्म व जीवन सुधरते व मृत्यु होने पर जीवात्मा को उत्तम योनियां प्राप्त होती हैं। अतः हमें पंचमहायज्ञों के अन्तर्गत दूसरे देवयज्ञ का सेवन भी पूर्ण श्रद्धा व निष्ठा से जीवन भर करना चाहिये। ऐसा करने से हमें उपासना से होने वाले लाभों की भांति ही अनेक लाभ प्राप्त होंगे। यज्ञ पर अनेक अनुसंधान हुए हैं। इनसे विदित होता है कि यज्ञ करने से मनुष्य को रोग नहीं होते हैं और यज्ञ का अनेक रोगों पर रोगनिवारक प्रभाव भी होता है। मनुष्य का शरीर ही नहीं अपितु उसके मन, बुद्धि, चित्त व आत्मा भी स्वस्थ होते हैं।

पंचमहायज्ञों में तीसरे, चौथे तथा पांचवें कर्तव्यों में पितृ-यज्ञ, अतिथि-यज्ञ तथा बलिवैश्वदेव-यज्ञ करने का विधान है। इसका उल्लेख एवं विस्तृत वर्णन सत्यार्थप्रकाश एवं पंचमहायज्ञ विधि आदि ग्रन्थों में मिलता है। पितृ यज्ञ में श्रद्धापूर्वक माता, पिता व वृद्ध जनों की सेवा की जाती है। अतिथि यज्ञ में देश व समाज के विद्वानों की अपने निवास पर आने पर माता, पिता आदि के समान श्रद्धापूर्वक सेवा की जाती है और उनके देश व समाज हितकारी कार्यों में यथाशक्ति सहायता की जाती है। पांचवें वैदिक कर्तव्य बलिवैश्वदेव यज्ञ में पशु, पक्षियों को चारा व दाना खिलाया जाता है। इस कर्म से भी मनुष्य को पुण्य अर्जित होता है। पशु व पक्षी आदि भोग योनियां होती हैं। इन योनियों में जीवात्मा मनुष्य जीवन में अपने कुछ पाप कर्मों का फल भोगते हैं। यह योनियां एक प्रकार से परमात्मा की जेल होती हैं जहां रहकर जीवात्मा का सुधार होता है और भोग पूरे होने पर उन्हें पुनः मनुष्य योनि प्राप्त होती है। वर्तमान जेलों में अपराधी मनुष्यों को भी भोजन व अन्य सुविधायें प्राप्त होती है। अतः हम ज्ञान व बल सम्पन्न मनुष्यों को भी परमात्मा के इन सुधार गृहों की उत्तम व्यवस्था करनी चाहिये और प्रतिदिन कुछ मात्रा में पशु व पक्षियों को भोजन कराने सहित उनके प्रति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वा सबमें एक समान आत्मा के होने का भाव रखना चाहिये।

वेदों में गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि पर्यन्त मनुष्यों के सत्य कर्म व कर्तव्यों का विधान है। यह विधान सृष्टि के स्वामी परमात्मा ने किये हैं। मनुष्यों को वेदों का अध्ययन कर उन वेद विधानों का पालन करना चाहिये। ऐसा करने से ही मनुष्य का जन्म व जीवन सफल होता है तथा उसकी सांसारिक तथा पारलौकिक उन्नति होती है। इन्हीं शब्दों के साथ हम लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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