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धर्म-अध्यात्म

“निराले दयानन्द – युग प्रवर्तकों में”

देव दयानन्द योगी तो थे ही साथ ही उच्च कोटि के वेदों के विद्वान भी थे। इसलिए वेदविरुद्ध प्रत्येक बात उन्हें हस्तामलकवत दीखती थी। वह संपूर्ण क्रांति के संदेशवाहक थे। इसीलिए उनके सुधारवादी कार्यक्रमों में स्त्रीशिक्षा, अछूतोद्धार, परतंत्रता निवारण, विधवारक्षण, अनाथपालन, सबके लिए शिक्षा की अनिवार्यता, जन्मगत जाति के स्थान पर गुण कर्मानुसार वर्ण व्यवस्था, विश्व के समस्त मानवों के लिए वेदाध्ययन के द्वारों का उद्घाटन, अज्ञान, ढोंग, पाखंड, छल-प्रपंच आदि के विरुद्ध आंदोलन, सब मनुष्यों की एक जाति मानना, सह शिक्षा का विरोध, समानता की जन्मदात्री गुरुकुल प्रणाली का प्रचलन, सदाचार तथा ब्रह्मचर्य पर बल, पठनीय तथा अपठनीय ग्रंथों का विवेचन, आर्यावर्त्त को विश्व का शिरोमणि बताकर उसका गौरववर्धन, हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा का स्थान, देश में कलाकौशल तथा विज्ञान पर बल, कृषक को राजाओं का राजा कहकर हरितक्रांति का संदेश, गौ का आर्थिक महत्व सिद्ध कर पशु मात्र की रक्षा पर बल, नशामुक्ति का उपदेश, परमेश्वर की उपासना एवम् पञ्च-महायज्ञों का विधान, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की प्रेरणा, मिथ्या मतमतांतरों का खण्डन, स्वर्णिम वैदिक काल के पुनरागमन की कल्पना आदि उनके कार्यक्रम के अंग थे। शरीर, आत्मा तथा समाज की उन्नति का पूर्ण कार्यक्रम लेकर आए थे वे। उन्होंने थेगली लगाने के स्थान पर नया वस्त्र बुन कर दिया जो काल के प्रवाह से अछूता है, युग भी जिसे धूमिल न कर पाएगा। जो शाश्वत है, नित्य है तथा अजर है।

निराले दयानन्द – मरने वालों में
प्रत्येक व्यक्ति यात्री है। उसे अपनी जीवन यात्रा पूरी करके चल देना है अगले पड़ाव के लिए। प्रायः लोग मरते समय रोते हैं। यह मृत्यु जिसे ब्राह्मणग्रंथ ‘मुच्य’ सब कुछ छुड़ाने वाली कहते हैं, है तो रुलाने वाली ही। सब कुछ छोड़ना क्या सरल है ? यह वियोगिनी सबको रुलाती ही है। जाने वालों को भी, रहने वालों को भी। यह मनुष्य के जीवन भर के कार्यों की परीक्षा का दिन है। संसार के सभी दुःखों से मृत्यु दुःख सर्वाधिक कष्टप्रद है। किन्तु महर्षि ने मृत्यु के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया अपितु वे उससे लड़े और लड़े भी वीरतापूर्वक। डॉक्टर भी आश्चर्यचकित थे कि हम अपने जीवन में पहला व्यक्ति देख रहे हैं जो इतने कष्ट में भी जीवित है और आह भी नहीं करता। मृत्यु उनके पास भिक्षुक बनकर आई। महर्षि मुस्कुराए, मुख पर अमिट आभा तैर आई। जगन्माता की गोद में जाते समय महर्षि दयानन्द के मुख पर हर्ष और शांति की अनुपम आभा थी। सारी आयु लोगों को निराश न लौटाने वाले दयानन्द मौत को भी क्यों निराश करते ? मृत्यु रूपी भिक्षुक को निर्मल चादर सौंपने से पूर्व गुरुदत्त सा दीप जलाकर तथा विषदाता को अभयदान दे उसके जीवन की रक्षा कर के एक अन्य भी अनोखापन दिखा गए ऋषि। वे बैठे, ईश्वर का स्मरण किया और कहा – ‘ईश्वर ! तेरी इच्छा पूर्ण हो, तूने बड़ी लीला की’ और प्राण को महाप्राण में विलीन कर दिया। न वेदभाष्य के अधूरे रहने का दुःख और न आर्यसमाज रूपी पौधे का। आजीवन प्रभु के आदेश पर चलने वाला आज उसका आदेश पाकर चल दिया अनन्त के मार्ग पर, जहां न सुख है न दुःख है। देव दयानन्द तेरी मृत्यु भी निराली थी।

निराले दयानन्द – जीने वालों में
जीना एक कला है। कुछ लोग सब कुछ होने पर भी रोते रहते हैं पर कुछ लोग कुछ न होने पर भी हंसते हैं। देव दयानन्द जीने की कला जानते थे। वे विचित्र थे। वे अपने दुःखों में हंसते थे तथा पराए दुःख में रोते थे। एक विधवा अपने पुत्र की लाश जब बिना कफन के बहा चली थी तब वह कितना रोए थे। इसके विपरीत वह अपने दुःखों में न रोए और न घबराए अपितु सदा मुस्कुराते रहे। गाली देने वालों को कहते थे कि जब इनके पास हैं ही गालियां तो ये बेचारे और क्या देवें ? पत्थर मारने वालों को कहते कि जहां आज पत्थर फेंकते हैं कभी वहां फूल बरसेंगे तथा कभी हंस कर कहते कि कितने अच्छे लोग हैं, मैंने पत्थर पूजने के विषय में समझाया तो इन्होंने पत्थर फेंकने ही प्रारंभ कर दिए। अपने ऊपर मिट्टी फेंकने पर कहते थे कि उद्यान लगाते समय माली का धूल से सनना स्वाभाविक ही है – न गिला, न शिकवा, न शिकायत। एक ब्राह्मण ने पान में विष दे दिया। इनका भक्त सैयद मुहम्मद तहसीलदार जब अपराधी को उनके सामने लाया तो पूछा कि यही है आप की हत्या का प्रयत्न करने वाला पापी। कहो इसे क्या दंड दिया जाए ? दयालु दयानन्द ने कहा – इसे छोड़ दो। मैं संसार को कैद नहीं अपितु कैद से छुड़वाने आया हूं।
कितना व्यस्त था उनका जीवन। दो बजे रात्रि में उठकर सैर तथा ईश्वरआराधना, फिर लेखन, भाषण, शास्त्रार्थ तथा शंका समाधान। कहां से समय लाते होंगे इतने कार्यों के लिए ? सर चकरा जाता है सोचकर। दिनभर ज्ञान पिपासु घेरे रहते तथा दयानन्द वह महान था जिसके किनारे से कोई प्यासा नहीं जाता था। व्यस्त जीवन था परंतु प्रफुल्लतापूर्ण। हास्य की छटा मुख पर सदा विराजमान रहती। लोग चिढ़ाना चाहें पर वह हंसते रहते थे। एक व्यक्ति ने उन्हें चिढ़ाने की सोची। जा पहुंचा उनके पास और बोला कि महाराज जरा अपना कमंडलु देना मुझे शिवजी पर जल चढ़ाना है। सोचा चिढ़ेंगे और अपशब्द कहेंगे, बड़ा मजा आएगा। किंतु वहां चिढ़ने का क्या काम ? महर्षि जी कहने लगे कि अपने ही कमंडलु से जल चढ़ा दो। वह बोला कि यदि मेरे पास कमंडलु होता तो आप से मांगने ही क्यों आता ? महाराज बोले कि मुंह तो है उसमें पानी भरकर कुल्ला कर दो। आया था चिढ़ाने पर खिसिया कर चला गया। काशी शास्त्रार्थ में विद्वानों द्वारा छल से यह कहने पर कि दयानन्द हार गया, जन समुदाय ने ईंट पत्थर फेंक कर तथा कुवाक्यों से अपमानित करने में अपने मन की पूरी भड़ास निकाली। अन्य कोई होता तो क्षोभ के मारे उठता भी न। विशेषतया विद्वान पंडितों के कुटिल व्यवहार को देखकर। किन्तु रात्रि में दयानन्द से मिलने जब ईश्वरसिंह निर्मल पहुंचे तो देखा कि उनके मुख पर विषाद की एक रेखा भी नहीं। मानो कि कुछ हुआ ही न हो। हजारों घटनाएं हैं ऐसी पर दयानन्द सब में स्थिर और दृढ़ रहे। ऐसा होता क्यों न, दयानन्द जीवन दर्शन के विशेषज्ञ जो थे। वे स्थितप्रज्ञ योगी थे – मान अपमान से ऊपर उठे हुए। उनका सारा जीवन ही जीवन-कला का साक्षात निदर्शन है। वह जीने वालों में भी निराले थे।

स्त्रोत – निराले दयानन्द।
लेखक – डॉ सत्यव्रत ‘राजेश’।
प्रस्तुति – आर्य रमेश चन्द्र बावा।

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