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भारत में अंग्रेजों के तलवे चाटने की आत्मघाती नीति

भारत में अभ्यास हो गया है कि हम अपनी भाषा और क्षेत्र बिलकुल नहीं देखते हैं। केवल यही देखते और समझते हैं कि अंग्रेजों ने क्या लिखा है। अपनी तरह भारतीयों को भी विदेशी सिद्ध करने के लिये सिन्ध में खुदाई कर उसके मनमाने अर्थ निकाले। आज तक नयी नयी कल्पनायें हो रही हैं। केवल महाराष्ट्र नाम और उसके विशेष शब्दों अजिंक्या, विट्ठल आदि पर ध्यान दिया जाय तो भारत का पूरा इतिहास स्पष्ट हो जायगा। इन शब्दों का मूल समझा जा सकता है पर यह क्यॊं महाराष्ट्र में ही हैं यह पता लगाना बहुत कठिन है। जो कुछ हमारे ग्रन्थों में लिखा है, उसका ठीक उलटा हम पढ़ते हैं। इन्द्र को पूर्व दिशा का लोकपाल कहा है, उसके बारे में अब कहते हैं कि यह आर्यों का मुख्य देवता था जो पश्चिम से (अंग्रेजों की तरह) आये थे। कहानी बनायी है कि पश्चिम उत्तर से आकर आर्यों ने वेद को दक्षिण भारत पर थोप दिया। पर पिछले ५००० वर्षों से भागवत माहात्म्य में पढ़ते आ रहे हैं कि ज्ञान विज्ञान का जन्म दक्षिण से हुआ और उसका उत्तर में प्रसार हुआ।

अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ। ज्ञान वैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ॥४५॥
उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥
तत्र घोर कलेर्योगात् पाखण्डैः खण्डिताङ्गका। दुर्बलाहं चिरं जाता पुत्राभ्यां सह मन्दताम्॥४९॥
वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी। जाताहं युवती सम्यक् श्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम्॥५०॥
(पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)
यह समझने पर भारत और वैदिक परम्परा के विषय में समझा जा सकता है। सृष्टि का मूल रूप अव्यक्त रस था। ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी) में इसका रूप अप् (जल जैसा) हुआ। तरंग-युक्त अप् सलिल या सरिर (शरीर, पिण्ड रूप) है। निर्माण-रत अप् को अम्भ कहते हैं, इसके साथ चेतन तत्त्व शिव मिलने से साम्ब (स + अम्भ)-सदाशिव है। भारत में दक्षिण समुद्र तट से ज्ञान का आरम्भ हुआ। द्रव से उत्पन्न होने के कारण यह द्रविड़ हुआ। सृष्टि का आरम्भ आकाश से हुआ, पर भाषा का आरम्भ पृथ्वी से हुआ। कर्म और गुण के अनुसार ब्रह्मा ने नाम दिये थे, इन अर्थों का आकाश (आधिदैविक) और शरीर के भीतर (अध्यात्म) में विस्तार करने से वेद का विस्तार हुआ। आगम की २ धारा हैं। प्रकृति (निसर्ग) से निकला ज्ञान वेद निगम है। उसका प्रयोग गुरु से सीखना पड़ता है, वह आगम है। अतः निगम वेद श्रुति कहा है। श्रुति का अर्थ है शब्द आदि ५ माध्यमों से प्रकृति के विषय में ज्ञान। इसका ग्रहण कर्ण से होता है, अतः जहां भौतिक अर्थों का आकाश और अध्यात्म में विस्तार हुआ वह क्षेत्र कर्णाटक है। ब्रह्म की व्याख्या के लिये जो लिपि बनी वह ब्राह्मी लिपि है। इसमें ६३ या ६४ अक्षर होते हैं क्योंकि दृश्य जगत् (तपः लोक) का विस्तार पृथ्वी व्यास को ६३.५ बार २ गुणा करने से मिलता है (आधुनिक अनुमान ८ से १८ अरब प्रकाश वर्ष)। इस दूरी ८.६४ अरब प्रकाश वर्ष को ब्रह्मा का दिन-रात कहा है। ध्वनि के आधार पर इन्द्र और मरुत् ने इसका वर्गीकरण किया वह देवनागरी लिपि है। इसमें क से ह तक के ३३ वर्ण ३३ देवों का चिह्न रूप में नगर (चिति = city) है। १६ स्वरों को मिलाने पर ४९ मरुत् हैं। ध्वनि रूप में लिपि का प्रचार का दायित्व जिस पर दिया गया उसे ऋग्वेद (१०/७१) में गणपति कहा है। इस रूप में वेद का जहां तक प्रभाव फैला वह महाराष्ट्र है। महर् = प्रभाव क्षेत्र। उसके बाद गुजरात तक वेद का प्रचार हुआ। कालक्रम में लुप्त हो गया था। भगवान् कृष्ण का अवतार होने पर पुनः उत्तर भारत से प्रचार हुआ। वर्तमान रूप कृष्णद्वैपायन व्यास द्वारा निर्धारित है।
महर् = प्रभाव क्षेत्र दीखता नहीं है। पृथ्वी दीखती है पर इसका गुरुत्व क्षेत्र नहीं दीखता है। अतः महः को अचिन्त्य कहा है। महाराष्ट्र में अचिन्त्य = अजिंक्या नाम प्रचलित है। उसका केवल भाव हो सकता है, अतः भाऊ सम्मान सूचक सम्बोधन है।
पश्चिम दिशा के स्वामी वरुण को अप्-पति कहा है अतः पश्चिमी भाग महाराष्ट्र में अप्पा साहब सम्मान सूचक शब्द है। विट् = विश् या समाज का संगठन जहां होता है वह विट्-स्थल = विट्ठल है। विश् का पालन कर्त्ता वैश्य है।
✍🏻अरुण उपाध्याय

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