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पंजाब के स्थानीय निकाय चुनावों में बाजी मारकर भाजपा चौका सकती है सबको

राकेश सैन

पंजाब में केवल दलित ही नहीं बल्कि अरोड़ा व महाजन सिख भी ‘जट्टवाद’ से पीड़ित रहे हैं। दिल्ली की सीमा पर चल रहे किसान आंदोलन के अधिकतर आंदोलनकारी जट्ट समाज से ही हैं जो कृषि मांगें मनवाने की बजाय अपने जातिवादी अहं की पुष्टि करते नजर आने लगे हैं।

पंजाब में 14 फरवरी को स्थानीय निकाय चुनाव होने जा रहे हैं। 8 नगर निगमों व 109 नगर परिषदों में होने वाले चुनावों को अगर 2022 के विधानसभा चुनावों का सेमिफाइनल कहें तो यह कोई पांडित्यपूर्ण कथन नहीं होगा। राज्य में होने वाले इन चुनावों में वैसे तो कुछ नया नहीं परंतु ऐसी संभावना बनती दिख रही है कि भारतीय जनता पार्टी राज्य में राजनीतिक पंडितों को चौंका सकती है क्योंकि एक ओर जहां किसान आंदोलन के चलते राजनीतिक परिदृश्य भाजपा बनाम शेष बन रहा है वहीं कट्टरपंथियों द्वारा भाजपा पर किए जा रहे हमलों से जनता की सहानुभूति इस दल के साथ होती दिखाई दे रही है। किसान आंदोलन के चलते पंजाब में भाजपा के ‘जट्टवाद’ के खिलाफ आवाज बन कर उभरने से दलित वर्ग में भी इस पार्टी के प्रति आकर्षण पैदा होता दिख रहा है। उक्त कारणों से भाजपाईयों में पैदा हुए उत्साह का ही परिणाम है कि राज्य में भाजपा 60 प्रतिशत सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार चुकी है जो अकाली दल बादल से संबंध विच्छेद के चलते सबसे उच्च आंकड़ा है। अकाली दल से गठबंधन के कारण अभी तक भाजपा केवल 20 प्रतिशत वार्डों पर ही उम्मीदवार उतारती रही परंतु पार्टी के प्रदेश सचिव डॉ. सुभाष शर्मा के अनुसार, अब यह आंकड़ा रिकार्ड स्तर तक पहुंच चुका है और पार्टी 2308 में से 1235 वार्डों में अपने घोषित व समर्थित उम्मीदवार उतार चुकी है।

सिख गुरुओं ने चाहे जातपात का प्रबल विरोध किया परंतु इसके बावजूद भी पंजाब जातिवाद से मुक्त नहीं हो पाया। जातिवाद के चलते ही यहां ‘जट्टवाद’ बनाम ‘दलित सम्मान’ की प्रतिद्वंद्विता हर क्षेत्र में देखी जा सकती है। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक बाबू काशी राम के मन में ‘तिलक तराजू और तलवार’ के खिलाफ जो राजनीतिक वैमनस्य था वह इसी ‘जट्टवाद’ का प्रतिकार कहा जा सकता है क्योंकि बाबूजी पंजाब के ही मूल निवासी थे और कहीं न कहीं इसी जातिवादी अहं से प्रताड़ित भी। पंजाब में केवल दलित ही नहीं बल्कि अरोड़ा व महाजन सिख भी ‘जट्टवाद’ से पीड़ित रहे हैं। दिल्ली की सीमा पर चल रहे किसान आंदोलन के अधिकतर आंदोलनकारी जट्ट समाज से ही हैं जो कृषि मांगें मनवाने की बजाय अपने जातिवादी अहं की पुष्टि करते नजर आने लगे हैं। जिस तरीके से केंद्र की भाजपा सरकार का इस आंदोलन के प्रति रुख रहा है उससे जट्टवाद से पीड़ित वर्गों विशेषकर दलितों को लगने लगा है कि भाजपा ही इस जातिगत अहंकार से लोहा ले सकती है।

जट्टवाद के खिलाफ ही 1992 में दलितों को बहुजन समाज पार्टी में आसरा दिखाई दिया, जिसके चलते बसपा 105 सीटों पर चुनाव लड़ी और 17.59 प्रतिशत मत हासिल कर 9 सीटें जीतने में सफल रही। 1996 के लोकसभा चुनाव के दौरान दलितों ने बसपा को 3 सांसद भी दिए परंतु पार्टी हाईकमान द्वारा समय-समय पर कभी अकाली दल तो कभी कांग्रेस पार्टी के घोषित-अघोषित समर्थन के चलते दलितों का बसपा से विश्वास उठने लगा जो आज अपने निम्नतम स्तर पर है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को केवल 1.59 प्रतिशत मतों पर संतोष करना पड़ा और नेतृत्व के अभाव में दलित फिर से बिखरे-बिखरे दिखाई दिए।

पंजाब की राजनीति व राजनीतिक दल सदैव जट्टवाद से प्रभावित रहे हैं। राज्य में जट्ट होना मुख्यमंत्री बनने की अघोषित रूप से पहली शर्त माना जाता है। यही कारण है कि आज पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष चौधरी सुनील कुमार जाखड़ हिंदू जाट, मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, आम आदमी पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष स. भगवंत सिंह मान, अकाली दल बादल के अध्यक्ष स. सुखबीर सिंह बादल व अधिकतर सांसद व मंत्री जाट सिख हैं। भाजपा अपने ‘सबका साथ-सबका विकास’ सिद्धांत पर चल कर न केवल प्रदेश वैकल्पिक नेतृत्व दे रही है बल्कि जट्टवादी अहंकार से लोहा लेती भी दिख रही है और यही बात दलितों को आकर्षित कर रही है। दिल्ली में आंदोलनकारी किसानों से वार्ता के दौरान केंद्र सरकार का नेतृत्व करने वालों में केंद्रीय कृषि मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर, रेल मंत्री श्री पीयूष गोयल के साथ-साथ केंद्रीय राज्य मंत्री श्री सोमप्रकाश भी शामिल रहते हैं जो पंजाब की सुरक्षित लोकसभा सीट होशियारपुर के सांसद हैं और पंजाब का दलित चेहरा हैं। किसान वार्ताकारों की जिद्द पंजाब में दलित सम्मान से टकराती भी दिखती है और इसके चलते अगर दलित भाजपा के पाले में एकजुट हों तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए।

गणतंत्र दिवस को लाल किले पर राष्ट्रीय अपमान और किसान आंदोलन के चलते पंजाब में हुए हुड़दंग के कारण भी शहरी मतदाता आंदोलनकारियों के साथ-साथ इसके समर्थक कांग्रेस व अकाली दल से नाराज दिखाई दे रहे हैं। आंदोलन के नाम पर किस तरह कई महीनों से राज्य में रेल सेवा प्रभावित हुई, रास्ते रोके गए, मोबाइल टावर तोड़े गए, लोगों के कामकाज ठप हुए, भाजपाईयों के कार्यक्रमों में व्यावधान डाले गए आदि घटनाएं शहरी मतदाताओं में गुस्सा पैदा कर रही हैं। अगर भाजपा इन मुद्दों को उठाती है तो इन चुनावों में वह वास्तव में चौंका सकती है।

विश्लेषक चाहे अकाली दल-भाजपा के तलाक को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ के राजनीतिक नुकसान के रूप में आंक रहे हों परंतु धरातल की वास्तविकता तो यह है कि भाजपा का काडर इससे खुश है क्योंकि गठजोड़ के चलते पंजाब भाजपा की हालत सौतेले भाई से भी बदतर हो चुकी थी। गठजोड़ के चलते राज्य के बड़े हिस्से में भाजपाई नेताओं को चुनाव लडऩे का अवसर नहीं मिलता था और न ही उनकी सुनवाई होती थी। राजनीतिक हिस्सेदारी के नाम पर भाजपा पंजाब में लोकसभा की तीन और विधानसभा की 23 सीटों पर सिमट गई। लेकिन अब पंजाब भाजपा के लिए उड़ने को खुला आसमान है और यही कारण है कि स्थानीय निकाय चुनाव के लिए 60 प्रतिशत सीटों पर पार्टी ने अपने प्रत्याशी खड़े कर दिए हैं। पार्टी ने यह कारनामा तब कर दिखाया है जब कथित किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा भाजपाईयों को हर स्तर पर डराया-धमकाया जा रहा है। चुनाव के परिणाम चाहे कुछ भी हो परंतु अब सही मायने में पूरे प्रदेश में भाजपा का संगठन सक्रिय हुआ है जो भविष्य के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है। सक्रिय संगठन में राजनीतिक स्पर्धा शुरू हो चुकी है जो किसी भी लोकतांत्रित दल का प्राणाधार मानी जाती है। स्वाभाविक है कि स्थानीय निकाय चुनावों के प्रदर्शन के आधार पर भविष्य में विधानसभा व लोकसभा चुनावों के लिए प्रत्याशियों का भविष्य तय होने वाला है और यही कारण है कि पार्टी में कार्यकर्ताओं की लामबंदी होती दिख रही है। बदली हुई परिस्थितियों में अगर भाजपा सबको चौंकाती है तो बहुत बड़ा आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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