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इतिहास के पन्नों से

डॉक्टर अंबेडकर और यज्ञोपवीत संस्कार

असुद्दीन ओवेसी और प्रकाश आंबेडकर (डॉ. आंबेडकर का वंश) मिलकर अनेक सभाएं ले रहे है जिसमे वे जनेऊधारी ब्राम्हणों को निशाना बना रहे है । अपनी राजनीतिक महत्वकांशा को पूरा करने के लिए ऐसी हरकतें कर रहे है । ५०० अंग्रेज सैनिक महारो ने मराठा पेशवा राज का बचाव करने वाले २८००० पेशवाओ को हराया का झूठा प्रचार कर जनता को भड़का रहे है । दलित नाम का जातिवादी परिवेश धारण कर दलितों को भ्रमित करते है। गौर करने लायक बात यह है कि इस हरकत की खबर पर सबसे अधिक वो उछल रहे हैं, जो अपने आपको डॉ अम्बेडकर का शिष्य बताते हैं।

वे यह भी भूल जाते हैं कि डॉ अम्बेडकर ने स्वयं से महारों (दलितों) का यज्ञोपवीत संस्कार करवाते थे। प्रमाण देखिये-

अम्बेडकर जी ने बम्बई में “समाज समता संघ” की स्थापना कि जिसका मुख्य कार्य अछूतों के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना तथा उनको अपने अधिकारोंके प्रति सचेत करना था। यह संघ बड़ा सक्रिय था। इसी समाज के तत्वाधान में ५०० महारों को जनेऊ धारण करवाया गया ताकि सामाजिक समता स्थापित की जा सके। यह सभा बम्बई में मार्च १९२८ में संपन्न हुई जिसमें डॉ अम्बेडकर भी मौजूद थे।

(डॉ बी आर अम्बेडकर- व्यक्तित्व एवं कृतित्व पृष्ठ ११६ -११७)

डॉ. अम्बेडकर जी के ६, सितम्बर १९२९ के ’बहिष्कृत भारत‘ में यह समाचार प्रकाशित हुआ था कि ’मनमाड़ के महारों (दलितों) ने श्रावणी मनायी।‘ २६ व्यक्तियों ने यज्ञोपवीत धारण किये। यह समारोह मनमाड़ रेल्वे स्टेशन के पास डॉ. अम्बेडकर के मित्र श्री रामचन्द्र राणोजी पवार नांदगांवकर के घर में सम्पन्न हुआ था।

डॉ अम्बेडकर ने जिस कार्य में अपनी श्रद्धा दिखाई। उसी कार्य का ये लोग परिहास कर रहे है।

ये लोग एक और तथ्य भूल जाते है। जिसका वर्णन डॉ अम्बेडकर ने अपनी लेखनी में किया है। डॉ जी लिखते है कि शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच अनवरत संघर्ष होते रहते थे और ब्राह्मणों को शूद्रों के हाथों अनेक कष्ट और अपमान सहने पड़े। शूद्रों द्वारा किये गये उत्पीड़न और पीड़ाओं से त्रस्त होकर ब्राह्मणों ने फलस्वरूप शूद्रों का उपनयन संस्कार सम्पन्न करवाना बंद कर दिया। उपनयन संस्कार से वंचित होने पर शूद्र जो क्षत्रिय थे उनका सामाजिक ह्रास हो गया।

(‘शूद्र कौन थे’ के सातवें संस्करण- २०१३ के प्राक्कथन का पृष्ठ ३ – ४)।

संस्कारों के न होने से कितनी हानि होती है। इसे डॉ अम्बेडकर भी स्वीकार करते है।
ब्राह्मण यज्ञोपवीत किस लिए रखते हैं ? यज्ञोपवीत केवल विद्या का एक चिह्न है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन वर्ण शिक्षित वर्ण है। इसलिए ये तीनों जनेऊ धारण करते है। शूद्र अशिक्षित वर्ण का नाम है। इसलिए वह जनेऊ धारण नहीं करता। मगर चारों वर्ण ब्राह्मण से लेकर शूद्र आर्य कहलाते है।

यज्ञोपवीत में तीन सूत्र होते है। तीनों सूत्र ऋषिऋण, पितृऋण और देवऋण। ऋषिऋण ब्रह्मचर्य धारण कर वेद विद्या के अध्ययन से, पितृऋण गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर उत्तम संतानोत्पत्ति से और देवऋण मातृभूमि की सेवा से निवृत होता हैं। संक्षेप में तीनों ऋणों से व्यक्ति को उसके कर्त्तव्य का बोध करवाया जाता है। इस प्रकार से यज्ञोपवीत कर्त्तव्य बोध का नाम है। वर्ण व्यवस्था के अनुसार कोई भी शूद्र ब्राह्मण बन सकता है और कोई भी ब्राह्मण शूद्र बन सकता है। इसलिए शूद्र शब्द को दलित कहना भी गलत है। यज्ञोपवीत संस्कार को जानकर ब्राह्मणवाद, मनुवाद के जुमले के साथ नत्थी कर अपनी हताशा ,निराशा का प्रदर्शन किया जा रहा हैं।

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