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संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा

हिन्दुत्व का पराक्रमी वीर सम्राट पृथ्वीराज चौहान

पृथ्वीराज चौहान भारतीय त्याग, तपस्या, साधना और पौरूष का प्रतीक है। वह अपने गुणा- अवगुणों से तत्कालीन हिंदू राजाओं में से कई के लिए ईष्र्या और द्वेष का कारण बन गया था। कई इतिहासकारों ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान के एक से अधिक विवाहों के होने का उल्लेख किया है। अत: थोड़ी सी असावधानी से एक नही कई ‘जयचंद’ उसके लिए उत्पन्न हो गये थे। उन ‘जयचंदों’ ने अपनी राष्ट्रविरोधी भूमिका का निर्वाह किया, तो भी पृथ्वीराज चौहान के विषय में एक निर्विवाद सत्य है कि वह एक वीर, प्रतापी और पराक्रमी सम्राट था। पृथ्वीराज ने कभी भी विदेशी शत्रुओं से और भारत की स्वाधीनता के भक्षकों से अपने सम्मान के या राष्ट्र के स्वाभिमान के प्रश्न पर कोई समझौता नही किया वह एक ऐसा शासक है जिसे बाहरी और भीतरी शत्रुओं से एक साथ जूझना पड़ा, परंतु उसने अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी अपना साहस नही खोया।
जिस समय पृथ्वीराज चौहान भारत का पराक्रमी नेतृत्व कर रहा था उस समय कुछ राजाओं के चाल, चरित्र और आचरण पतित हो गये थे और भारतीय क्षात्र धर्म कलह और कटुता की चक्की के दो पाटों में पिसकर पतित हो रहा था। इसीलिए हम उस काल को भारत के पराक्रम के भटकाव का काल मानते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप हमारे हिंदू शासक ही अपने सम्राट पृथ्वीराज चौहान के विरूद्घ विदेशी शत्रुओं से सहायता ले रहे थे और उन्हें भारत को ही पराजित कराने में आनंद आने लगा था। भारत के पराक्रम को अपनी कुचालों, कलह और कटुताओं से विदीर्ण करने वाले देशी राजाओं के षडयंत्रों की उपेक्षा कर भारत को पराक्रमी नेतृत्व देने और उसकी स्वाधीनता के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले पृथ्वीराज चौहान का नाम इतिहास में आज तक समादरणीय है।
पृथ्वीराज चौहान के विषय में यह प्रसिद्घ है कि उसने मौहम्मद गोरी को युद्घों में 17 बार परास्त किया था। कई इतिहासकारों ने उसके इन 17 बार के युद्घों पर प्रश्नचिन्ह भी लगाया है कि इन युद्घों की कोई सही जानकारी उपलब्ध नही होती तो अधिकांश ने इन युद्घों की इसी संख्या को बार-बार दोहराया है, जिससे सिद्घ होता है कि गोरी को पृथ्वीराज चौहान ने एक दो बार नही, अपितु अनेकों बार परास्त किया था। पृथ्वीराज चौहान के लिए गोरी भारत की स्वतंत्रता और संस्कृति का भक्षक था, इसलिए पृथ्वीराज चौहान भारत की स्वतंत्रता का रक्षक बनना अपने लिए आवश्यक मान रहा था।
इतिहासकारों का कुचक्र
भारत के कुछ इतिहासकारों ने गोरी के भारत पर किये गये आक्रमणों को भारत पर लगभग एक उपकार के रूप में महिमामंडित करने का प्रयास ये कहकर किया है कि उसके आक्रमणों का उद्देश्य मुहम्मद की पवित्र शिक्षाओं का भारत में प्रचार प्रसार करना था। इतिहासकारों की इस तुष्टिकरण की नीति के विषय में संभवत: उन्हें भी पता न होगा कि इससे जहां भारत के प्राचीन वैदिक ज्ञान की सर्वोच्चता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है, वहीं पृथ्वीराज चौहान जैसे पराक्रमी शासकों के पराक्रम पर भी प्रश्नचिनह लग जाता है। इस प्रवृत्ति के लेखकों का प्रतिनिधित्व डा. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव की ‘दिल्ली सुल्तानेट 711 ई.’ नामक पुस्तक की यह टिप्पणी करती है-”एक पक्के मुसलमान होने के नाते गोरी ने भारत में मूर्ति पूजा का विध्वंस कर पैगंबर मुहम्मद के उपदेशों का प्रचार करना अपना पवित्र कत्र्तव्य समझा।”
अब ऐसे इतिहास लेखकों से उचित रूप से पूछा जा सकता है कि यदि गोरी भारत में पैगंबर की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए ही आया था और आप उसके आक्रमणों का महिमामण्डन इसी प्रकार करना उचित मानते हो तो पृथ्वीराज चौहान जैसे पराक्रमी शासकों की प्रतिरोध और प्रतिशोध की भावनाओं को आप क्या नाम देंगे? वस्तुत: ऐसे छद्म इतिहास लेखकों के कारण ही हमारे अनेकों ‘पृथ्वीराज चौहान’ आज तक इतिहास में अपना समुचित और सम्मानजनक स्थान प्राप्त नही कर सके हैं।
चौहान बना : सर-ए-हिंद सरहिंद का संरक्षक
गोरी से पृथ्वीराज चौहान के भिडऩे का इतिहास भी बड़ा रोमांचकारी है। पृथ्वीराज चौहान ने ऐसा कोई भी अवसर जाने नही दिया जब उसे लगा कि भारत की स्वाधीनता पर कहीं से संकट आ रहा है, तो वह संकट के स्थान पर बिना बुलाये भी जा खड़ा हुआ। बस, यही उसका अद्भुत पराक्रम था।
ऐसा एक उदाहरण पी.एन. ओक की पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम सुल्तान’ से हमें मिलता है। ओक महोदय हमें बताते हैं कि गौरी ने 1191 ई. में अपने सैन्य दल के साथ सरहिंद (भटिण्डा) में प्रवेश किया। दुर्ग में थोड़े ही सैनिक थे, परंतु वे गोरी के सैन्य दल पर भूखे शेर की भांति टूट पड़े। गोरी की सेना को भारत के मुट्ठी भर हिंदू वीरों ने भगवे ध्वज की अस्मिता की रक्षार्थ अपने प्राणों को संकट में डालते हुए अपमानजनक पराजय की स्थिति तक पहुंचा दिया था। तब उस स्थिति से बचने के लिए गोरी ने कपट का मार्ग अपनाया। उसने दुर्ग की टुकड़ी के समक्ष स्वयं के लौट जाने का प्रस्ताव रख दिया। उसने दुर्ग रक्षकों से यह भी निवेदन पहुंचा दिया कि वे शांति-संधि नियमों पर वार्तालाप हेतु उसके शिविर में आ सकते हैं।
क्या ही अच्छा होता कि हमारे पराक्रमी दुर्ग रक्षक विदेशी शत्रु की इस चाल को समझ लेते और उसके शिविर में न जाकर स्वयं उसे ही अपने शिविर में बुला लेते। हमारे भोले पराक्रमी भाई गोरी की चालों में फंस गये, और गोरी के प्रस्ताव को स्वीकार कर उसके शिविर में पहुंच गये। शिविर में पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तब गोरी ने सरहिंद के शेष सैनिकों के पास सूचना प्रेषित की कि या तो वो आत्मसमर्पण कर दें या फिर अपने अधिकारियों के कटे हुए सर ले जायें। नई अप्रत्याशित परिस्थिति को देखकर अंत में ‘सरहिंद’ ने आत्मसमर्पण कर दिया।
‘सरहिंद’ में गोरी की जीत कूटनीति या भारत की परंपरागत युद्घ नीति के अनुसार मिली जीत नही थी। ऐसी जीत को भारत की परंपरागत युद्घनीति में सदा से ही घृणास्पद माना गया है। अत: इस घृणास्पद छलनीति से सर-ए-हिंद =सरहिंद की पराजय का समाचार जैसे ही पृथ्वीराज चौहान को मिला, तो भारत की स्वाधीनता के सर्वप्रमुख रक्षक के रूप में वह बड़े वेग से सरहिंद की ओर देश के स्वाभिमान पर लगे कलंक को धोने के लिए फुंकारता हुआ चल दिया।
पृथ्वीराज चौहान ने सरहिंद पहुंचकर नगर के दुर्ग को घेर लिया। पृथ्वीराज चौहान ने भारत के सम्मान को पुनस्र्थापित करने के लिए तथा शत्रु को उसकी दुष्टता का उचित पुरस्कार देने के लिए सरहिंद पर अपने 11 वर्षीय शासन के तेरह माहों का (सरहिंद के किले का घेरा डालकर) अमूल्य समय दिया और उसे 13 महीने के घेरे के पश्चात पुन: विजय करके ही सांस ली। आज तक सरहिंद की पावन धरती पृथ्वीराज चौहान के सम्मान में कीर्तिगान कर रही है। पूरा सरहिंद भारत के इस स्वाभिमानी शासक का पावन स्मारक बना खड़ा है। क्योंकि यही वह स्थान है, जहां विदेशी शत्रु को उसके षडयंत्र और छल का उत्तर हिंदुस्तान के पौरूष के प्रतीक पृथ्वीराज चौहान ने अपने पराक्रम से दिया था।
दामोदर लाल गर्ग ने अपनी पुस्तक ‘भारत का अंतिम हिंदू सम्राट: पृथ्वीराज चौहान’ में चौहान को सच्चे अर्थों में मां भारती का सेवक और स्वाधीनता का पुरोधा कहकर अभिषिक्त किया है। सरहिंद में जब गोरी ने अपनी कपट पूर्ण नीति से आधिपत्य स्थापित किया और उसकी सूचना पृथ्वीराज चौहान तक पहुंची तो उस समय पृथ्वीराज चौहान ने जो कुछ कहा उसको श्री गर्ग ने अपनी उक्त पुस्तक में निम्नलिखित शब्दों में वर्णित किया :-”इन कमीनों की इतनी हिम्मत….शेर की मांद में हाथ डालने का साहस किया…..क्या गोरी गुजरात की मार भूल गया। (यहां पृथ्वीराज का गुजरात की वीरांगना रानी नायका और उसके अल्पवयस्क पुत्र की ओर संकेत है) जहां एक बालक से पिटकर अपनी खोह में जाकर छुप गया था…..इस तुर्क को दुस्साहस का दण्ड तो देना ही पड़ेगा………सरदारों…..तुरंत फौज का डंका बजवा दो……बगैर समय नष्ट किये हमें सीमा पर पहुंचना है।”
सरहिंद का यह युद्घ भटिण्डा के पास तरावड़ी नामक गांव में हुआ था। जिसे इतिहासकारों ने तराइन का नाम दे दिया है।
वीरांगना श्यामली की वीरता
हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान शत्रु दल पर शेर की भांति टूट पड़े। युद्घ का दृश्य पृथ्वीराज चौहान और उनकी पराक्रमी हिंदू सेना की वीरता का संदेश स्वर्ग में बैठे ‘शहीदों’ को प्रसन्नता प्रदान करने लगा। मां भारती की स्वतंत्रता के लिए लड़े जा रहे इस युद्घ को देखकर मानो देवता भी पुष्पवर्षा करने लगे, क्योंकि मां भारती की जय निश्चित होती जा रही थी, इसलिए स्वर्ग में विराजमान पुण्यात्माएं वैदिक संस्कृति के रक्षकों और भक्षकों के मध्य हो रहे इस संघर्ष पर संतोष और प्रसन्नता व्यक्त करने लगीं। युद्घ का परिणाम गोरी के लिए हताशा उत्पन्न करने वाला बनने लगा था। तभी उसके एक सैनिक ने अपना वेश परिवत्र्तित कर महाराज पृथ्वीराज चौहान की ओर छद्म राजपूती वेश में युद्घरत सैनिकों के मध्य बढऩा आरंभ कर दिया। कवि चंद्रबरदाई ने इस सैनिक की गतिविधियों पर ध्यान देना आरंभ किया। कवि चंद्रबरदाई अपने स्वामी पृथ्वीराज चौहान से कुछ दूरी पर ही शत्रुदल से युद्घ कर रहे थे। वह इस संदिग्ध सैनिक को शंकित दृष्टि से देखते जा रहे थे और युद्घ भी कर रहे थे।
पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक श्यामली नामक हिंदू वीरांगना भी शत्रुओं से युद्घरत थी। वह इस शत्रु सैनिक के उद्देश्य को ताड़ गयी और इससे पहले कि वह दुष्ट सैनिक हमारे हिंदू वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान पर अपनी ओर से हमला करता इस हिंदू वीरांगना ने उसे ‘जहन्नुम की आग’ में भेजकर उसकी आहुति युद्घ यज्ञ में देकर मां भारती को प्रसन्न कर डाला। पृथ्वीराज चौहान को युद्घ क्षेत्र में तो इस घटना का ज्ञान नही हुआ था परंतु युद्घोपरांत उन्हें इस घटना से जब अवगत कराया गया तो वह अत्यंत आनंदित हुए।
श्यामली ने कहा …..कुछ नही चाहिए
श्री दामोदरलाल गर्ग हमें बताते हैं कि जब पृथ्वीराज चौहान विजयी होकर अजयमेरू में प्रविष्ट हुए तो वहां राजदरबार में भव्य सभा का आयोजन किया गया।
तब सबने युद्घ में मिली विजय पर अपने अपने अनुभवों को बताया। परंतु श्यामली एक कोने में खड़ी चुपचाप राजदरबार के संचालन को देख रही थी। तब चंद्रबरदाई ने युद्घक्षेत्र में श्यामली ने उस संदिग्ध सैनिक को कैसे मार गिराया वह सब घटना पृथ्वीराज चौहान को सुनाई। महाराज एक क्षण के लिए गंभीर हुए और तब मुस्कराकर बोले-”अरे श्यामली! तैंने तो कुछ कहा ही नही…हमें तेरी वीरता पर बहुत गर्व है……. मांग….जो मांगेगी….वहीमिलेगा।” श्यामली ने नीची नजर कर हाथ जोड़ते हुए प्रार्थना की…अन्नदाता। इस दासी को भला क्या चाहिए? आपकी कृपा से सब मिला हुआ ही है…यदि कुछ देना ही चाहते हो तो…दासी को केवल आपके चरणों की सेवा…। चौहान ने कहा…”अरे पगली वह तो तू करती ही है,….मांग और कुछ मांग….वरना यह सिंहासन तेरा ऋणी ही रह जाएगा।” श्यामली कुछ गंभीर हो गयी, तब नेत्रों की कोरें भीग उठीं,…..अन्नदाता। यह दासी अंतिम समय तक आपके श्री चरणों की….बात..और कुछ…नही चाहती।”

यह था मां भारती की स्वतंत्रता के रक्षक उन वीर और वीरांगनाओं का रोमांचकारी जज्बा। सचमुच वंदन….सचमुच अभिनंदन के पात्र उन वीरों को इस देश का कोटि कोटि नमन है जिन्होंने अपनी वीरता से इस देश की स्वतंत्रता की मशाल जलाये रखी।
गोविंदराय ने किया गोरी को घायल
वीरांगना श्यामली की भांति ही पृथ्वीराज चौहान की सेना में गोविंदराय नामक वीर सेनानायक था, जो कि अपनी वीरता और पराक्रम को अब से पूर्व भी कई बार कई युद्घों में दिखा चुका था। ये वो लोग थे जो हिंदू सम्राट के विश्वासपात्र थे और पृथ्वीराज चौहान के एक संकेत मात्र पर अपना सर्वस्व मां भारती की सेवा के लिए समर्पित करने के लिए तत्पर रहते थे। जब पूरे देश में हिंदू शासकों के मध्य पारस्परिक ईष्र्या, वैमनस्य, द्वेषभाव एवं कलह-कटुता अपने चरम पर थी तब गोविंदराय जैसे महान योद्घाओं का अपने स्वामी और मां भारती के प्रति सेवा एवं त्यागभाव अत्यंत वंदनीय है, नमनीय है और अभिनंदनीय है।
इन जैसे वीर सेना नायकों ने पृथ्वीराज चौहान का साहस हर क्षण बढ़ाये रखा और मां भारती को इस बात के लिए सदा आश्वस्त किये रखा कि अभी उसकी गोद खाली नही है। वह वीर प्रस्विनी है और अपने इसी गौरवपूर्ण पद पर तब तक विराजमान रहेगी जब तक गोविंदराय जैसे लोगों की रगों में रक्त की एक बूंद भी शेष रहेगी।
इसी भाव और इसी उद्देश्य को लक्ष्यित कर गोविंदराय युद्घ में अपनी वीरता की कहानी लिख रहे थे। युद्घ का दृश्य बड़ा ही भयानक हो उठा था, गोरी की सेना का मनोबल निरंतर टूटता ही जा रहा था, यद्यपि गोरी अपने सैनिकों का मनोबल बनाये रखने के लिए उन्हें निरंतर प्रोत्साहित और प्रेरित कर रहा था। परंतु वीर हिंदू सैनिकों के समक्ष अंतत: कब तक शत्रु सैनिक अपना मनोबल बनाये रखते?
तभी गोविंदराय की दृष्टि गोरी पर पड़ी। भारत की परंपरा रही है कि यहां एक ही राशि के राम ने रावण को मारा तो कृष्ण ने कंस को मारा है। आज उसी परंपरा की एक और साक्षी बनानेे के लिए भारत के गोबिंद (कृष्ण) ने विदेशी आततायी कंस (गोरी) को मारने का संकल्प ले लिया। भारत तो अपने यज्ञों तक में ‘शिवसंकल्प’ धारण करने के लिए प्रसिद्घ रहा है। अत: भारत की अंतरात्मा ने गोविंद में प्रवेश किया और वह वीर अपने शत्रु को शांत करने के उद्देश्य से शत्रु से युद्घ करने लगा। श्यामली अपना काम कर चुकी थी, अब गोविंद राय की बारी थी। वीर गोविंद गोरी की ओर तेजी से लपका और कुछ समय के युद्घ में ही उस वीर ने गोरी पर प्राणघातक आक्रमण करते हुए उसे मां भारती के लिए ‘वंदेमातरम्’ बोलने के लिए मां के चरणों में पटक दिया। गोरी गोविंद के प्राणघातक हमले से घायल होकर अपने घोड़े से गिर पड़ा। गोविंद ने समझा कि शत्रु सदा के लिए शांत हो गया है, इसलिए वह उसे देखेे बिना ही आगे बढ़ गया।
जब गोरी की सेना ने देखा कि उसका स्वामी अपने घोड़े पर नही है, तो वह उसे मां भारती के चरणों का दास बना समझकर युद्घ क्षेत्र से भाग खड़ी हुई। इस पर मुस्लिम इतिहासकार तवकात कहता है:-जब मुस्लिम सैनिकों को सुल्तान दिखाई नही पड़ा तो उनमें भगदड़ मच गयी। वे भागकर शत्रु की पहुंच से बाहर निकले। गोरी के सरदारों के एक दल ने अपने सुल्तान को खिलजी युवक के साथ देख लिया जब वह नजदीक आया तो सभी सरदार एकत्र हुए और भालों की पाल की बनाकर सुल्तान को उस पर बैठा कर ले गये। तब कहीं सैनिकों को सांत्वना मिली।
अपनी पुस्तक पूर्व मध्य कालीन भारत के लेखक श्रीनेत्र पाण्डेय ने इस घटना का उल्लेख फरिश्ता के लेखों को आधार बनाकर इस प्रकार किया है :-”मुहम्मद गोरी मूच्र्छित होकर युद्घ के क्षेत्र में अपने घोड़े से गिर पड़ा था। किंतु किसी ने उसे पहचाना नही। जब काफी रात बीत गयी तो उसके कुछ तुर्की गुलाम उसे ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मैदान में आये। सुल्तान ने उन्हें आवाज से पहचान लिया, तब उसने उन्हें बुलाकर शिविर में ले जाने को कहा। वे लोग बारी-बारी से सुल्तान को कंधों पर लाद कर ले गये।”
कुछ इतिहासकारों ने गोरी की इस पराजय पर लिखा है कि उसे पृथ्वीराज चौहान के समक्ष बंदी रूप में प्रस्तुत किया गया। जहां उसने क्षमा याचना की और पृथ्वीराज चौहान ने उसे क्षमा कर बेडिय़ों के बंधन से मुक्त कर दिया। गोरी ने 8000 घोड़े दण्ड स्वरूप देकर पृथ्वीराज चौहान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का नाटक किया और स्वदेश चला गया। कुछ भी हो एक बात तो निश्चित है कि गोरी इस युद्घ से टूट गया और वह बहुत लज्जित हुआ। यदि जयचंद जैसे लोग यहां ना होते तो वह भारत की ओर फिर कभी नही आता, यह भी सत्य है कि चाहे पृथ्वीराज चौहान अपने शत्रु गोरी को बार-बार छोडऩे की गलती कर रहा था तो भी उसने मां भारती के सम्मान और प्रतिष्ठा को कहीं आंच नही आने दी। पृथ्वीराज चौहान द्वारा शत्रु को बार बार छोडऩा हमारी ‘सदगुण विकृति’ थी। जो हमारे लिए कष्टप्रद रही, परंतु इससे पृथ्वीराज चौहान के पराक्रम पर कहीं प्रश्नचिन्ह नही लगाया जा सकता। इसके अगले युद्घों का वर्णन हम अगले अंक में करेंगे।

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