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आतंकवाद

कम्युनिस्ट पार्टियों की देश विरोधी राजनीति

भारत के संदर्भ में लेफ्ट-राइट की शातिराना पोजीशनिंग ने सत्ता के साथ रखने के सच के बीच भी खुद को वामपंथी कहा : और जो तपका असल में सर्वहारा समाज के साथ और सत्ता के हमेशा खिलाफ रहा वह राष्ट्रवाद है, जिसे उन्होंने दक्षिणपंथ नाम दिया। शब्द बौद्धिक माओवाद उर्फ़ अर्बन नक्सल चाल का नतीजा क्या हुआ ?

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आपको “दक्षिणपंथ” पता नहीं था, लेकिन उन्होंने कहा तुम दक्षिणपंथी हो, इसलिए आपने मान लिया कि आप दक्षिणपंथी हैं। वो कहने लगे तुम फासिस्ट हो, आप फासीवाद भी नहीं जानते लेकिन आपने मान लिया कि आप फासीवादी हैं। जब पोलैंड पर नाजी हमला कर रहे थे, तब कॉमरेड स्टालिन ही हिटलर के टैंकों में तेल भरवा रहा था। लेकिन जब वो कहने लगे कि तुम नाज़ी गोएबेल्स के उपासक हो तो आपने उनके मित्रों को आपना दोस्त भी मान लिया।

अब उनका मित्र आपके घर आकर तो गुप्तचरों वाले काम ही करेगा न? इसमें आश्चर्य कैसा! सनातन की विचारधारा में गलत क्या होता है और सही क्या होता है ये आपने सचमुच कभी अपने ग्रंथों से खुद पढ़कर नहीं देखा है। अपने घर रखी रामचरितमानस या भगवद्गीता को भी पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक खुद नहीं पढ़ा तो गलती तो आपकी ही हुई। कोई और उसका जो भी अर्थ समझा जाए वो मानने को ही नहीं, उसमें जो नहीं लिखा वो आपको पढ़ा देने की क्षमता तो आपने ही उठा कर उन्हें दी है।

सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तीनों ही सनातनी सिद्धांतों में गुण के रूप में लिखे जाते हैं। रजोगुण होगा तो पैसे, सफलता, मकान जैसी चीज़ों की चाहत होगी। सतोगुण ज्यादा हो जाए तो अपना नुकसान करके भी दूसरों का भला करते रहेंगे। तमोगुण आपको मांसाहार, क्रोध, हिंसा जैसी प्रेरणाएँ देता है। इनमें से कोई भी सौ प्रतिशत प्रतिबंधित कभी नहीं था, न है। ये तीनों गुण हैं और कम ज्यादा मात्रा में हर मनुष्य में होंगे ही। सनातन सिद्धांत आपको सिर्फ अति से रोकते हैं।

किसी की जान बचने के लिए झूठ बोलना पड़े तो तमोगुण इस्तेमाल होगा ही, लेकिन सतोगुण इतना बढ़ जाए कि किसी की रक्षा के लिए भी आप असत्य न कह पायें, तो सतोगुण भी नुकसान ही करेगा। इससे सम्बंधित एक कौशिक नाम के सन्यासी की कहानी महाभारत के कर्ण पर्व में श्री कृष्ण ही सुनाते हुए पाए जाते हैं। तमोगुण इतना बुरा होता तो महाभारत में व्याध गीता भी नहीं होती। रजोगुण की अति में आप पड़ोसी का मकान हड़पने की सोचने लगेंगे। सनातन ऐसी अतियों को प्रतिबंधित करता है।

यहाँ किसी चीज़ को सीधा वर्जित नहीं कहा जाता, अति से रोका जाता है। यहाँ काम प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन उसकी अति करते हुए समलैंगिता पर बढ़ जायेंगे तो हिन्दुओं की रीति से विवाह तो प्रतिबंधित रहेगा। हाँ संपत्ति और दूसरे विवादों के लिए आप मौजूदा कानूनों का सहारा लें तो दूसरे मजहबों या रिलिजन जैसा आपका गला रेता नहीं जाना चाहिए। मांसाहार भी खाने वाले का निजी निर्णय है, लेकिन अति करते हुए कोई कुत्ता या ऐसे जीव खाने लगे तो उसके घर, या उस व्यक्ति के बर्तनों में खाने से मना करने का मेरा अधिकार तो मेरे पास सुरक्षित है।

विचारधारा जैसे मामलों में भी यही सनातनी सिद्धांत चलता है। तमोगुण या रजोगुण की अति आपको राक्षस बना देगी। हमारे पास कोई ईसाइयों जैसा अलग से शैतान नहीं होता। क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसी चीज़ों के बढ़ने पर कोई भी राक्षस हो सकता है। हिटलर का एक मजदूर समाजवादी पार्टी बनाना और तथाकथित समाजवादी या साम्यवादी सिद्धांतों के तहत अपने लिए यहूदियों को “वर्गशत्रु” मान लेना ऐसी ही अति थी। उसकी पार्टी का पूरा नाम लेने के बदले उसे सिर्फ “नाज़ी” कहने के पीछे वो स्वयं ही कारण है। हिटलर के दुष्प्रचार तंत्र के कर्ता-धर्ता गोएबेल्स के पुराने मित्रों ने गोएबेल्स से काफी कुछ सीखा।

“नेमकॉल्लिंग” उनमें से एक है। किसी का नामकरण “भक्त” कर देना, किसी को “ट्रोल” कहना, नित नयी गालियाँ इजाद करते जाना ही नेमकॉल्लिंग नहीं है। इसमें असली मकसद को छुपाने के लिए किसी के राजनैतिक दल से “समाजवादी” गायब करके उसे “नाज़ी” कहने लगना भी शामिल होगा। नेमकॉल्लिंग के एक प्रयोग से जहाँ बेइज्जती होती है, दूसरे से भी चरित्र पर आवरण चढ़ जाता है। ऐसा करने के लिए बरसों नकाब में छुपे रहने के गुण चाहिए, लगातार एक ही शब्द दोहराने की, एक ही दिशा से लम्बे समय तक हमला करने की क्षमता भी चाहिए।

बाकी अति प्रतिबंधित है ये ज्यादातर भारतीय लोगों ने पढ़ा ही नहीं, क्योंकि उन्हें पढ़ना नहीं आता था। थोड़ी अलंकृत भाषा में उन्हें हिटलर हो जाने कहिये तो भी क्या? वो आरोप को सम्मान समझ ही लेंगे!

अक्सर जब महाभारत की अनसुनी कहानियों की बात होती है तो कर्ण का जिक्र छिड़ जाता है। कर्ण की कहानी को आधार मानकर “कलयुग” और “राजनीति” जैसी हिन्दी फ़िल्में तो बनी ही हैं, दक्षिणी भारत में भी “थलपति” (दलपति) जैसी फ़िल्में जाने-माने निर्देशकों ने रजनीकांत जैसे कलाकारों को लेकर बनाई हैं। साहित्य में “रश्मिरथी” जैसे काव्य और “मृत्युंजय” जैसी पुस्तकों की रचना भी हुई है इसलिए कर्ण की कहानियों को “अनसुनी” कहानियां कहना बिलकुल भी ठीक नहीं होता। हाँ ये जरूर है कि कर्ण एक बार जरासंध से लड़ा और जीता था, इसकी कहानी बताई जा सकती है। पांडवों के राजसूय यज्ञ के समय जब भीम से कर्ण का सामना हुआ तो वो हार गया था, ये कहानी भी अनसुनी होगी।

इसके अलावा पांडवों के वनवास के समय जब दुर्योधन उन्हें चिढ़ाने के लिए गया था, तब उसका सामना चित्ररथ नाम के एक गंधर्व से हो जाता है। युद्ध में चित्ररथ जीतता है और दुर्योधन को गिरफ्तार कर लेता है। इस युद्ध में कर्ण हारकर, दुर्योधन को छोड़कर भाग गया था। इस घटना की खबर जब युधिष्ठिर को हुई तो भीम और अर्जुन को उन्होंने दुर्योधन के पकड़े जाने पर हंसने के बदले उसे छुड़ाने कहा था। यहीं “वयं पंचाधिक शतम्” कहा गया था। मोटे तौर पर “वयं पंचाधिक शतम्” जिसके जरिये युधिष्ठिर पांडवों को समझाते हैं कि बाहरी आक्रमणों के लिए हम पांच या सौ नहीं, बल्कि एक सौ पांच भाई हैं, उसे बाहरी आक्रमणों के समय अपनों की मदद करने के लिए सुनाया जाता है। इनके अलावा महाभारत के युद्ध के दौरान सात्यकी ने कर्ण को केवल इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि वो अपने गुरु अर्जुन का सम्मान कर रहा था।

मगर खैर, महाभारत की अनसुनी कहानियों में कर्ण का जिक्र करने के बदले, हम दूसरी कहानियां ही देखेंगे। अक्सर टीवी देखकर ज्ञानी हो गए, धूप में बाल सफ़ेद कर आये कुछ सज्जन द्रौपदी के दुर्योधन पर हंसने को महाभारत के युद्ध का कारण बताने आ जाते हैं। पहली समस्या तो ये है कि महाभारत में जहाँ दुर्योधन माया से भरे महल को देख रहा होता है, वहां द्रौपदी मौजूद ही नहीं होती। उस समय वो कहीं अंतःपुर में थी और दुर्योधन फिसल कर गिरते समय पांडवों, भीम के साथ था। इसलिए “अंधे का पुत्र अंधा” कोई तथ्य नहीं बल्कि एक फ़िल्मी डायलॉग भर है। महाभारत को पढ़कर देखा जाए तो महाभारत के युद्ध की नींव दुर्योधन की इर्ष्या के कारण, काफी पहले ही पड़ चुकी थी।

बचपन में ही दुर्योधन ने षड्यंत्र रचकर भीम को विष दिया और नदी में फेंक दिया था। उसका विचार था कि इससे भीम की मृत्यु हो जाएगी, लेकिन नागों ने ना केवल भीम का विष दूर कर दिया था, बल्कि उसे और अधिक शक्तिशाली भी बना दिया था। इसके बाद दुर्योधन ने लाक्षागृह में उन्हें जला डालने की कोशिश की थी। यही वो जगह है जहाँ महाभारत के अनसुने पात्रों में से एक कुणिक (या कणिक) का जिक्र आता है। ये धृतराष्ट्र के मंत्रियों में से एक थे और कूटनीति के विशारद माने जाते थे। इनके ही सहयोग से ही दुर्योधन ने लाक्षागृह ने लाक्षागृह की योजना बनाई थी। टीवी पर आमतौर पर ये साजिश रचते हुए शकुनी नजर आते हैं। महाभारत के “क्रिटिकल एडिशन”, या बिबेक देबरॉय के अनुवाद में उनका जिक्र सीधे-सीधे नहीं आता। कृष्ण मोहन गांगुली के अनुवाद में कणिक आसानी से मिल जाते हैं।

कूटनीति के साम, दान, दंड, भेद के बारे में धृतराष्ट्र को सिखाते समय कणिक बताते हैं कि डरने वालों को धमकाया जाए, बहादुरों को सम्मान दिया जाए और धोखे से मारा जाये, लालची को दान-उपहार आदि देकर वश में किया जाए। अगर कोई एक बार आपका शत्रु हो जाए तो चाहे वो आपका पिता हो, बन्धु हो, बेटा या भाई ही क्यों न हो, उसे अवश्य ही मार डालना चाहिए। यहीं कणिक सिखाते हैं कि बहुत क्रोध आ रहा हो फिर भी किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने वाली, बेइज्जती करने वाली बातें बिलकुल नहीं बोलनी चाहिए। अब वापस महाभारत के अनसुने किस्सों पर आयें, तो हमारी अनसुनी कहानी कणिक की सुनाई हुई कहानी ही है। अपनी नीतियों को राजा के लिए सही बताते हुए कणिक एक सियार की कहानी सुनाते हैं।

जंगल में कहीं दूर रहने वाले इस धूर्त सियार को मांसाहार का शौक तो था ही, लेकिन अपनी क्षमता के हिसाब से वो छोटे-मोटे जीवों का शिकार ही कर सकता था। एक दिन उसे एक शेर का मांस खाने की सूझी! अब भला सियार किसी तरह शेर का शिकार तो कर नहीं सकता था इसलिए उसने इस काम में मदद लेने की सोची। जब वो शेर के शिकार के लिए मित्रता बढ़ाने और मित्रों का सहयोग लेने निकला तो उसकी दोस्ती एक नेवले से हुई। नेवला मांसाहारी तो था, लेकिन शेर के शिकार में किसी काम का नहीं था। फिर सियार ने एक चूहे से भी दोस्ती की, लेकिन शेर के शिकार में वो भी किसी काम का नहीं था। अंत में सियार ने एक बाघ से दोस्ती की। बाघ सामर्थ्य में शेर के जैसा था, अच्छा शिकारी भी था, लेकिन आमने-सामने की लड़ाई में शेर जीतेगा या बाघ, ये कुछ पक्का नहीं कहा जा सकता था।

अपने मित्र बाघ की जीत सुनिश्चित करने के लिए सियार ने सलाह दी कि पहले ही चूहा जाकर शेर के पंजे कुतर दे, तो लड़ाई से पहले ही वो कमजोर हो जायेगा। ऐसा ही किया गया और लड़ाई में बाघ ने शेर को मार गिराया। अब सियार ने कहा कि तुम सब नहा आओ, तबतक मैं शिकार की रखवाली करता हूँ। बाघ जैसे ही नहाकर आया तो सियार ने बाघ से कहना शुरू किया, “चूहा कह रहा था कि शेर को उसने घायल किया था। शेर मारने का श्रेय तो असल में उसका है! अब चूहे का शिकार मुझसे तो खाया नहीं जा रहा।” बाघ का अहंकार जागा, उसने सोचा भला एक चूहे का मारा शिकार मैं खाऊं? वो शेर को छोड़कर अपने लिए दूसरा शिकार मारने चला गया।

जब चूहा आया तो उसने कहा “मेरा मित्र नेवला बताता है कि शेर का मांस जहरीला होता है। मैंने कभी पहले किसी को शेर का मांस खाते देखा-सुना भी नहीं। नेवले का विचार है कि पहले चूहे को खिलाकर विष की जांच कर ली जाये!” अब जब चूहे ने ये सुना तो वो ऐसे ही डरकर भाग गया। नेवला बेचारा छोटा सा था, और सियार उससे अकेले ही लड़कर निपट सकता था। जैसे ही नेवला वापस आया, सियार ने नेवले को डरा-धमकाकर भगा दिया। इस तरह पूरा शेर अकेले सियार को खाने को मिल गया। इस साम, दान, दंड, भेद वाली कहानी के जरिये कणिक अपने तौर-तरीकों को पुराने दौर में सही ठहराते हैं, लेकिन आज भी इसके उदाहरण मिल जाना आसन ही है।

एक नजर अगर आज की राजनीति की ओर देखेंगे तो आप पायेंगे कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के केजरीवाल ने जिन लोगों के साथ मिलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की थी, उनमें से अधिकतर को कुछ भी नहीं मिला। सबके सब सियार के मित्रों की तरह किनारे कर दिए गए। ऐसे ही अगर भाजपा के अकाली दल या रामविलास पासवान की पार्टी से सम्बन्ध देखेंगे तो भी नजर आ जायेगा। जबतक जरूरत रही, साथ रहा, जैसे ही काम निपटा, ऐसे कई छोटे क्षेत्रीय दल निपटा दिए गए हैं। अनसुनी कहानियों को अगर आज के दौर में ना सुना जाये, तो अक्सर ऐसा लगता है कि ये तो पहली बार हो रहा है! जबकि सच्चाई ये है कि ये सभी घटनाएँ, ये सभी तौर तरीके, पूर्व में भी राजनीतिज्ञों द्वारा अजमाए जाते रहे हैं।

महाभारत में दूसरे पक्ष में यानी पांडवों के समर्थक भी कोई भोले-भाले सज्जन नहीं थे। इस सारी योजना का विदुर को अच्छी तरह पता था, और वो भी इससे निपटने और पांडवों को तैयारी करने का समय देने के लिए ऐसी ही योजना अपनाते हैं। विदुर पहले तो युधिष्ठिर को इशारों में ही दुर्योधन की योजना समझा देते हैं। फिर उनका दूत और सुरंग खोदने में माहिर खनक पांडवों की मदद के लिए पहुँच जाता है। पुरोचन जिसपर पांडवों को जलाकर मारने का जिम्मा था, उसे बिना कोई मोह-माया दिखाए जिन्दा जलाकर पांडव वहां से निकल जाते हैं। शत्रु सोया हुआ है, या जिन्दा जलाएं या नहीं जैसे पचड़ों में खुद धर्मराज युधिष्ठिर भी नहीं पड़ते! जैसा करने की वो योजना बना रहे थे, बिना नैतिकता के मचान पर चढ़े, शत्रुओं के साथ वही किया जाता है।

बाकी यहाँ गौर कीजिये तो शेर के अलावा बाघ का जिक्र नजर आता है। बाघ हमेशा से भारत में नहीं होता था। असम की ओर से बाघ बाद में भारत में आया था और जैसे जैसे इसने क्षेत्रों पर कब्ज़ा करना शुरू किया, वैसे वैसे शेर भी भारत के पूर्व से पश्चिम की ओर सिमटने लगे। कणिक की कहानी कहीं ना कहीं बाघों के शेरों से बेहतर शिकारी होने की कहानी भी कह देती है। वन्यजीवों (खासकर कम होते बाघों) के बारे में सीखना है, या कहानी से सिर्फ राजनीति के बारे में समझना है, ये फैसला आपका ही रहेगा।
✍🏻आनन्द कुमार

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