Categories
आज का चिंतन

स्वयं सिद्ध ईश्वर को हम अपने ज्ञान नेत्रों से देख सकते हैं

ओ३म्
================
मनुष्य इस संसार में भौतिक स्थूल पदार्थों, जो आकार वाले हैं, उन्हें ही अपनी आंखों से देख पाता है। सूक्ष्म भौतिक पदार्थ वायु, अग्नि, आकाश व गैस अवस्था में जल को भी हम इनके होते हुए भी नहीं देख पाते। अग्नि सभी पदार्थों में निहित व छिपी रहती है। बादलों में भी अग्नि होती है परन्तु जब वह टकराते हैं तब बिजली चमकती है और हम उसे प्रकाश के रूप में देख पाते हैं अन्यथा नहीं देख पाते। मनुष्यों व पशुओं के शरीरों को हम अवश्य देखते हैं परन्तु उनके भीतर जो मूल तत्व जीवात्मा होती है वह हमें व किसी भी मनुष्य व विद्वान को आंखों से दिखाई नहीं देती परन्तु सभी विवेकशील मनुष्य अपने शरीर सहित सभी प्राणियों के शरीर में आत्मा का होना स्वीकार करते हैं।
शरीर में घटने वाली भिन्न भिन्न क्रियायें जिसमें आंखों का खोलना व बन्द करना, श्वास लेना व छोड़ना, अति शीत व उष्णता से व्याकुल होना आदि का अनुभव करने वाली सत्ता को हम आत्मा के रूप में स्वीकार करते हैं। यह एक प्रकार से आत्मा का देखा जाना ही होता है। आत्मा स्थूल पदार्थ नहीं है अतः कोई भी व्यक्ति उसे अपनी आंखों से कदापि नहीं देख सकता। उसके गुणों व क्रियााओं से ही उसके होने का जो अनुभव होता है, वही उस आत्मा को देखना होता है।

हम इस संसार को भी देखते हैं। संसार में सूर्य, चन्द्र, तारे व पृथिवी सहित आकाश में अनेक ग्रह व प्रकाश पुंज को देखकर हमें अपौरुषेय रचनाओं की उपस्थिति का ज्ञान होता है। इन पदार्थों सहित हम पृथिवी व इस पर अग्नि, वायु, जल आदि को भी देखते हैं। बड़े बड़े पर्वत, नदियों व सरोवरों सहित वन व उपवनों को देखते हैं। यह सब पदार्थ व वस्तुयें हमें दिखाई देती हैं परन्तु इन्हें बनाया किसने है व वह रहता कहां है, यह ज्ञात नहीं होता। संसार में यह नियम है कि कोई भी रचना बिना कर्ता व बनाने वाली सत्ता, जो चेतन, ज्ञान व शक्ति से युक्त होती है, उसका अस्तित्व होना आवश्यक होता है। अतः सूर्य, चन्द्र एवं पृथिवी आदि सभी पदार्थों का एक रचयिता होना सिद्ध व ज्ञात होता है। वह रचयिता कौन है और कहां रहता है, इस प्रश्न पर विचार करें तो बिना वेद व वैदिक ज्ञान के यह गुत्थी व पहेली सुलझती नहीं है। वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, सथ्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय एवं आर्य विद्वानों के ग्रन्थों को देखकर ईश्वर से जुड़े सभी प्रश्नों का समाधान हो जाता है। सभी अपौरुषेय पदार्थ पुरुष विशेष ईश्वर ने ही बनाये है। वह ईश्वर कैसा है?, इसका सत्यस्वरूप वेद व वेदानुकूल ग्रन्थों को जिन्हें ईश्वर ने प्रेरणा करके ऋषियों व विद्वानों द्वारा बनाया है, उन ग्रन्थों से ज्ञात होता है।

सत्यार्थप्रकाश का सप्तम व प्रथम समुल्लास पढ़ लिया जाये अथवा आर्याभिविनय और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का ही अध्ययन कर लिया जाये तो भी हम ईश्वर के सत्यस्वरूप को प्राप्त हो सकते हैं। उपनषिदों के अध्ययन से भी ईश्वर के विहंगम स्वरूप के दर्शन होते हैं। ऋषि दयानन्द ने भी ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानने के लिये अपने जीवन में प्रयत्न किये थे। उन्होंने अपनी आयु के 14हवें वर्ष से आरम्भ कर सन 1863 तक 24 वर्ष के तप, त्याग तथा अनुसंधान के बाद ईश्वर के सत्यस्वरूप को जान सका था तथा उस ईश्वर का समाधि अवस्था को प्राप्त कर साक्षात्कार भी कर लिया था। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर व जीवात्मा आदि विषयक जो ज्ञान प्राप्त किया था वह सब वह अपने ग्रन्थों व व्याख्यानों के माध्यम से देशवासियों को दे गये हैं। यदि हम ऋषि दयानन्द जी के ग्रन्थों का अध्ययन कर लेते हैं तो हम ईश्वर व आत्मा के सत्यस्वरूप तथा गुण, कर्म व स्वभाव से परिचित हो सकते हैं। जीवन व आत्मा की उन्नति के लिये ऐसा करना अति आवश्यक है। मनुष्य का आत्मा अनादि तथा नित्य सत्ता है। इसका कभी अन्त नहीं होना है। यह दुःखों से छूटना चाहता और सुख व आनन्द प्राप्त करना चाहता है। यह सुख व आनन्द की प्राप्ति बिना ईश्वर व आत्मा को जाने नहीं कर सकता। मनुष्य आत्मा द्वारा ईश्वर को जाने व उसका साक्षात्कार किये मनुष्य के जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य पूरा नहीं होता। इस लक्ष्य की प्राप्ति में प्रथम मनुष्य को ईश्वर के सत्यस्वरूप तथा गुण, कर्म व स्वभाव को ही जानना होता है। अतः इस लेख के माध्यम से हम ईश्वर के सत्यस्वरूप व गुण, कर्म व स्वभाव का संक्षिप्त परिचय प्राप्त कर लेते हैं।

ईश्वर का परिचय हमें ऋषि दयानन्द जी के बनाये आर्यसमाज के दूसरे नियम से मिलता है। ऐसा परिचय विस्तृत धार्मिक साहित्य में शायद ही किसी को कहीं मिले। आर्यसमाज का नियम है ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।’ इस नियम से ईश्वर के सत्यस्वरूप व गुण, कर्म व स्वभाव का सत्य व यथार्थ परिचय मिलता है। ईश्वर में अनन्त गुण, कर्म व स्वभाव हैं। अतः इस नियम में ईश्वर के अनेक अन्य विशेषणों को जोड़ा जा सकता है। इसकी एक झांकी हमें ऋषि दयानन्द ने अपनी पुस्तक आर्याभिविनय में ‘ओ३म् शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा।‘ मन्त्र की व्याख्या में दिखाई है। पाठको को आर्याभिविनय पुस्तक भी अवश्य पढ़नी चाहिये। इससे मनुष्य की नास्तिकता दूर होती है और आस्तिक मनुष्यों के ज्ञान में आशातीत वृद्धि होती है।

चार वेदों के अधिकांश वेदमन्त्रों में ईश्वर के सत्यस्वरूप व गुण, कर्म व स्वभाव का वर्णन मिलता है। इन गुणों से ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना की जाती है। हम यहां सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास से तीन मन्त्रों के अर्थ नमूने के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। एक मन्त्र में परमात्मा कहते हैं कि हे मनुष्य! जो कुछ इस संसार में जगत् है उस सब में व्याप्त होकर जो नियन्ता है वह ईश्वर कहाता है। उस से डर कर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग। दूसरे मन्त्र में ईश्वर सब को उपदेश करता हुआ बताता है कि हे मनुष्यो! मैं ईश्वर सब के पूर्व विद्यमान सब गत् का पति वा स्वामी हूं। मैं सनातन जगत्कारण और सब धनों का विजय करनेवाला और दाता हूं। मुझ ही को सब जीव जैसे पिता को सन्तान पुकारते हैं वैसे पुकारे। मैं सब को सुख देनेहारे जगत् के लिये नाना प्रकार के भोजनों वा अन्न, दुग्ध, वनस्पति, ओषधि, फल आदि के विभाग मनुष्य आदि सभी प्राणियों के पालन के लिये करता हूं। तीसरे मन्त्र में परमात्मा ने बताया है कि मैं परमेश्वर्यवान् सूर्य के सदृश सब गत् का प्रकाशक हूं। कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूं। मैं ही जगत् रूप धन का निर्माता हूं। सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले मुझ ईश्वर ही को जानो। हे जीवो! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझ से मांगों और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत होओ। इन पंक्तियों में हमने वेदों के अनुसार ईश्वर के स्वरूप व गुणों आदि को नमूने के रूप में प्रस्तुत किया है। अतः सभी मनुष्यों को ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों व वेदभाष्य को पढ़कर ईश्वर विषयक अपने ज्ञान को बढ़ाना चाहिये।

ईश्वर का अस्तित्व उतना ही सत्य एवं यथार्थ है जितना की उसकी बनाई इस सृष्टि व इसमें विद्यमान भिन्न भिन्न पदार्थ तथा मनुष्य आदि नाना प्रकार के प्राणी। ईश्वर को हम वेद व वेदानुकूल सत्य ग्रन्थों का स्वाध्याय करके विस्तार से जान सकते हैं। बिना स्वाध्याय किये तथा इस सृष्टि की उत्पत्ति व पालन आदि के विषय में विचार किये ईश्वर को नकारना बुद्धिमानी नहीं अपितु यह मनुष्य की अज्ञता व मूर्खता होती है। मनुष्य यदि ऋषि दयानन्द लिखित ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना के आठ मन्त्रों व उनके अर्थों को भी ध्यान से पढ़ ले तो उसके ईश्वर विषयक सभी भ्रम एवं शंकायें दूर हो सकते हैं। ईश्वर को शुद्ध ज्ञान व निर्मल बुद्धि के द्वारा ही जाना वा देखा जा सकता है। ईश्वर न तो स्थूल है और न ही आकार वाला। वह निराकार है और रंग व रूप से रहित है। अतः उसको आंखों से देखना सम्भव नहीं है। उसका ज्ञान उसकी बनाये रचनायें सृष्टि, पर्वत, जल, वायु व वन्सप्तियों आदि को देखकर होता है। उसका साक्षात अनुभव व ज्ञान आत्मा से ही होता है। योगाभ्यास एवं समाधि द्वारा वह आत्मा में प्रकट होता है जैसा कि समधिाओं के जलने से अग्नि प्रकट व प्रकाशित होती है उसी प्रकार ईश्वर का ध्यान व सामधना से वह आत्मा में प्रकट होता है। आत्मा ही परमात्मा की उपलब्धि होने का स्थान है। हम अनुभव करते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व इस जगत के रूप में स्वयंसिद्ध है। संसार व इसके पदार्थों को देखकर ईश्वर का सत्य व यथार्थ बोध होता है। ज्ञान की आंखों से ही उसे देखा जा सकता है। ऋषि दयानन्द और हमारे प्राचीन सभी ऋषि समाधि अवस्था में ईश्वर का साक्षात्कार किया करते थे और जन्म मरण के चक्र से छूटकर मोक्ष व मुक्ति को प्राप्त होते थे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
winxbet giriş
winxbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
betnano giriş
betpas giriş
betpas giriş
safirbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betasus giriş
betasus giriş
betpark giriş
betpark giriş
hitbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
savoybetting giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
betpark giriş
betpark giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
jojobet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş