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नए नेतृत्व के साथ अमेरिका ने की नई शुरुआत

 

आशीष कुमार

 

ट्रंप अपने कार्यकाल के आखिर तक मास्क का मजाक ही उड़ाते रहे थे। बाइडन ने बतौर राष्ट्रपति अपने पहले भाषण में भी लोगों का आह्वान किया कि वे राजनीति को दरकिनार करके एक राष्ट्र के रूप में इस महामारी का मुकाबला करें।


अमेरिका के नए राष्ट्रपति के रूप में जो बाइडन और उपराष्ट्रपति के रूप में कमला हैरिस का शपथ लेना न केवल अमेरिकियों के लिए बल्कि बाकी दुनिया के लिए भी कितना अहम है, इसका अंदाजा इस बात से होता है कि नए राष्ट्रपति ने अपने कार्यालय में बैठते ही फैसलों की झड़ी लगा दी। पहले तीन फैसलों पर हस्ताक्षर कैमरे के सामने किए गए। इनमें दो घरेलू मामलों से संबंधित थे। एक के जरिये अमेरिका में मास्क पहनना और सोशल डिस्टैंसिंग का पालन करना अनिवार्य बना दिया गया तो दूसरे आदेश में कमजोर तबकों को मदद मुहैया कराने की बात कही गई।

ये दोनों फैसले ट्रंप के स्थापित रुख के उलट जाते हैं। ट्रंप अपने कार्यकाल के आखिर तक मास्क का मजाक ही उड़ाते रहे थे। बाइडन ने बतौर राष्ट्रपति अपने पहले भाषण में भी लोगों का आह्वान किया कि वे राजनीति को दरकिनार करके एक राष्ट्र के रूप में इस महामारी का मुकाबला करें। बहरहाल, कैमरे के सामने जिस तीसरे फैसले पर बाइडन ने हस्ताक्षर किए वह पेरिस जलवायु समझौते में अमेरिका की वापसी का है। जिस इकतरफा अंदाज में ट्रंप ने इस अंतरराष्ट्रीय समझौते से बाहर आने की घोषणा की थी, वह पूरी दुनिया को चकित करने वाला था। बाइडन ने पहले ही दिन उस फैसले को पलटकर यह संदेश दिया है कि ट्रंप से पहले तक अमेरिका जिन मूल्यों और सिद्धांतों की वकालत करता रहा है, आगे भी वह उनपर कायम रहेगा।
पहले दिन लिए गए बाइडन के 17 फैसलों में और भी कई ऐसे हैं जो बताते हैं कि पिछले चार सालों में जो विचलन अमेरिकी नीति में दिखे थे, उन्हें नियम न मानकर अपवाद के ही रूप में देखा जाए। मगर विदेश नीति में निरंतरता के तत्व हमेशा बदलाव से ज्यादा होते हैं इसलिए बाइडन प्रशासन भी ट्रंप के कार्यकाल में हुई घटनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करके इस दायरे में अपनी नीतियां नहीं तय कर सकता। यह बात खास तौर पर चीन के संदर्भ में लागू होती है। भारत से लगी लद्दाख सीमा पर और साउथ चाइना सी के इलाकों में उसने इधर जिस तरह की आक्रामकता दिखाई है, उस पर अमेरिकी रुख में किसी तरह की नरमी के संकेत बाइडन प्रशासन की ओर से नहीं दिए गए हैं।
पूरी संभावना है कि चीन के बरक्स भारत का साथ देने का अमेरिकी रुख आगे भी बरकरार रहेगा। हालांकि ठीक यही बात पाकिस्तान के संदर्भ में नहीं कही जा सकती। नामित रक्षा सचिव लॉयड जे ऑस्टिन के पहले बयान में ऐसे संकेत मौजूद हैं कि अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान का सहयोग सुनिश्चित करने और उसे पूरी तरह चीन की गोद में जाने से रोकने के लिए अमेरिका उसको साथ लेकर चलने की नीति अपना सकता है। साफ है कि भारत को बदलते समीकरणों पर बारीकी से नजर रखते हुए उन्हें अपने अनुकूल बनाने और बदलावों के अनुरूप अपनी पोजिशनिंग दुरुस्त करने के लिए तत्पर रहना होगा।

साभार

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