गणतंत्र दिवस की महत्ता और गरिमा

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गौर से देखें तो इस बार के गणतंत्र दिवस समारोह का सबसे बड़ा संकट राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसानों के धरने से जुड़ा है। इस मामले में हालात जल्दी सामान्य नहीं बनाए गए तो कुछ ऐसे अप्रिय प्रसंग देखने को मिल सकते हैं, जो गणतंत्र दिवस की गरिमा के अनुरूप नहीं होंगे।

कोविड-19 से उपजी समस्याओं और दुश्चिंताओं के बीच देश 72वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में है, लेकिन समारोह के मुख्य अतिथि ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने हाल में यह कहते हुए क्षमा मांग ली कि अपने देश में महामारी की गंभीर स्थिति को देखते हुए यह भूमिका वे नहीं निभा पाएंगे। ऐसे में शायद यह पहली बार ही होगा कि गणतंत्र दिवस समारोह में कोई विदेशी शासनाध्यक्ष अतिथि के रूप में मौजूद न हो। वैसे भी इस समारोह की पारंपरिक भव्यता इस बार देखने को नहीं मिलेगी। समारोह स्थल पर 25 हजार से ज्यादा दर्शकों की इजाजत न देने का फैसला पहले ही किया जा चुका है। परेड में शामिल फौजी दस्तों और झांकियों की संख्या कम होगी और परेड लाल किले तक जाने के बजाय नैशनल स्टेडियम पर, यानी लगभग आधी दूरी में ही समाप्त कर दी जाएगी।

मगर गणतंत्र दिवस समारोह की अहमियत वहां मौजूद दर्शकों और परेड की भव्यता से ज्यादा उस भाव से जुड़ी है जो हर देशवासी के मन में इस समारोह के प्रति बना रहता है। लिहाजा गौर से देखें तो इस बार के गणतंत्र दिवस समारोह का सबसे बड़ा संकट राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसानों के धरने से जुड़ा है। इस मामले में हालात जल्दी सामान्य नहीं बनाए गए तो कुछ ऐसे अप्रिय प्रसंग देखने को मिल सकते हैं, जो गणतंत्र दिवस की गरिमा के अनुरूप नहीं होंगे। विवादित कृषि कानूनों की वापसी की मांग को लेकर किसान पिछले डेढ़ महीने से राजधानी के आसपास खुले में मौसमों की मार झेल रहे हैं। सात दौर की बातचीत नाकाम होने के बाद उन्होंने बयान जारी किया है कि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में प्रवेश करके वे अपनी ट्रैक्टर परेड निकालेंगे। बेशक सरकार ताकत के बल पर उन्हें राजधानी के संवेदनशील इलाकों में घुसने से रोक सकती है, लेकिन राष्ट्रीय गौरव के इस अवसर पर बल प्रयोग की कोई भी घटना देश का सिर नीचा करेगी। वैसे भी इस आंदोलन को किसी हठधर्मिता के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
यह बात जगजाहिर है कि तीनों कृषि कानूनों की ड्राफ्टिंग से लेकर उन्हें संसद में पारित कराने तक किसानों और जन प्रतिनिधियों से जैसा संवाद होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। कानून आने के तुरंत बाद पंजाब में किसान इसके खिलाफ आंदोलन पर उतर आए लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें भरोसे में लेने की कोई पहल नहीं की जा सकी। आखिर एक दिन वे रेल पटरियों से उठे और हरियाणा तथा केंद्र सरकार के बैरिकेडों को एक तरफ करते हुए दिल्ली बॉर्डर तक आ पहुंचे। तब से अब तक उनका दायरा देशव्यापी हुआ है। सरकार ने उनसे कई दौरों की बातचीत की है लेकिन संवाद का स्तर सुधरने के बजाय बिगड़ा ही है। अविश्वास की एक गहरी खाई सरकार और किसानों के बीच खुद गई है। इसे जल्दी पाटा जाना चाहिए, ताकि दुनिया में हमारी छवि एक अशांत समाज जैसी न बने।
(साभार)

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