सर्वोच्च न्यायालय ने बढ़ा दी हैं सरकार की धड़कनें और मुश्किलें

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                     प्रभुनाथ शुक्ल

किसान आंदोलन पर सुप्रीमकोर्ट ने सरकार को खरी- खरी सुनाई है। अदालत की यह तल्खी और नाराजगी सरकार की सांसत बढ़ा दिया है। अदालत ने सरकार की नाकामियों को लेकर जिस तरह की लताड़ लगाई सरकार को उसकी उम्मीद नहीँ रही होगी। अदालत ने साफ कर दिया है कि कृषि कानूनों को सरकार होल्ड करे या वह खुद ऐसा कर देगी। सुप्रीमकोर्ट सरकार को अब वक्त नहीँ देना चाहती है। कृषि कानूनों पर सरकार के आडियल रुख को पर अदालत से कड़ी फटकार लगाई है। अदालत का संदेश साफ है सरकार कृषि कानूनों पर रोक नहीँ लगाती है तो कोर्ट खुद रोक लगा सकती है। अदालत के इस नजरिये से मोदी सरकार के लिए  मुश्किलें खड़ी हो सकती है। अभी जिस बिल को वह सियासी जय और विपक्ष की पराजय के रुप में देखती रहीं है उसका यह गुब्बार धड़ाम हो जाएगा। अदालत ने कानून पर रोक लगाई तो सरकार की किरकिरी तय हैं।

अदालत आंदोलन के दौरान किसानों की आत्महत्या और मौत को लेकर भी गम्भीर है। अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सरकार और किसानों के मध्य आम सहमति का रास्ता चाहती है। इसी लिए वह कृषि बिल को होल्ड रखने के लिए सरकार से कह रहीं है। अदालत का कहना है कि जब तक समिति काम करेगी तब तक बिल को निलम्बित रखा जाए। जबकि सरकार किसानों की कुछ मांगों को छोड़ कर बिल को यथावत रखना चाहती है। सरकार किसान आंदोलन को नज़रंदाज़ कर विपक्ष को यह संदेश देना चाहती है कि वह जो चाहेगी वहीँ करेगी। लेकिन सरकार की मुश्किल बढ़ती लगती है।

किसान आंदोलन को लेकर मीडिया की भूमिका बेहद आलोचनात्मक रहीं है। दिल्ली की गाजियाबाद सीमा में जिस तरह किसान डटे हैं उस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। वहाँ उपलब्ध सुविधाओं पर भी तल्ख टिप्पणी हो रहीं है। कहा जा रह है कि यह किसान नहीँ हैं नए कानून से मण्डियां ख़त्म होने आढ़ती आंदोलन कर रहे हैं। किसान इतना कहाँ से संवृद्ध हो गया। टेंटसिटी बसाने के लिए फंडिंग कौन कर रहा है। वाशिंग मशीन, ठंड के कपड़े, कॉफी, पिज्जा और बर्गर समेत अत्याधुनिक ओडी कारें जैसी सुविधाएँ कहाँ से आ रहीं हैं। इसका क्या मतलब लोग किसान को गरीब ही बनाएं रखना चाहते हैं। किसान क्या संवृद्ध नहीँ हो सकता। अगर उसे यह सुविधाएँ मुहैया कराई जा रहीं हैं तो क्या गुनाह है। आंदोलन को वामपंथ, काँग्रेस और आढ़तियों के साथ जोड़ कर प्रचारित किया जा रहा है।

सुप्रीमकोर्ट इस गतिरोध को दूर करना चाहता है। सरकार कमेटी गठित कर सरकार और किसान संगठनों से बातचीत के आधार पर रिपोर्ट तैयार करना चाहता है। उसके बाद उसी आधार पर बिल की समीक्षा करना चाहता है। अदालत अब तक सरकार की तरफ़ से उठाए गए क़दम से संतुष्ट नहीँ है। उसने साफ कहाँ है कि वह न कानून को ख़त्म करना चाहती है और न प्रदर्शन को बंद करना चाहती है। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को आंदोलन स्थल से कड़ाके की ठंड देखते हुए हटाना चाहती है। अदालत ने सरकार को साफ चेताया है कि वह कानून को होल्ड करे नहीँ तो वह खुद कर देगी।
सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने साफ कहा कि हम सुनवाई बंद कर रहे हैं। अब आदेश पारित होगा। कब होगा ये नहीं बताया गया। सरकार पर सख्त रुख दिखाते कोर्ट ने कहा है कि सरकार इतने संवेदशील मुद्दे को गम्भीरता से नहीँ सम्भाला। अदालत की तल्खी देखते हुए किसान संगठनों के वकील दुष्यंत दवे ने साफ कर दिया है कि किसान  26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च नहीं करेंगे। सीजेआई ने समय माँगने पर अटॉर्नी जनरल को भी खरी- खरी सुनाई। अब वक्त आ गया जब सरकार को कृषि सुधार कानून पर नए सिरे से सोचना चाहिए।

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